
समयरेखा
968 तिथिबद्ध घटनाएँ, युग-दर-युग। युद्ध, धर्म, विज्ञान, प्रतिरोध या पुनर्निर्माण से छाँटें।
01 · वैदिक ऋषि और इतिहाससत्य, त्रेता और द्वापर युग, 3102 ई.पू. तक (पारम्परिक गणना)
- 2026 ई. से 1,97,29,49,127 वर्ष पूर्व (पौराणिक गणना)
वर्तमान श्वेतवाराह कल्प का आरम्भधर्म
सूर्य सिद्धान्त और पुराणों की गणना से ब्रह्मा जी का वर्तमान दिन इतने वर्ष पहले आरम्भ हुआ। अभी उसका सातवाँ, वैवस्वत मन्वन्तर और अट्ठाईसवाँ महायुग चल रहा है।
- 24वें महायुग का त्रेता युग (पौराणिक गणना)
अयोध्या में श्रीराम का राज्यधर्म
वायु पुराण श्रीराम को चौबीसवें महायुग के त्रेता युग में रखता है। महर्षि वाल्मीकि की रामायण उनका जीवन इतिहास के रूप में कहती है, अयोध्या से लंका और फिर लौटने तक।
- द्वापर युग का अन्त (पारम्परिक)
महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में बाँटाधर्म
कृष्ण द्वैपायन ने एक वेद को ऋक्, यजुः, साम और अथर्व में बाँटा और प्रत्येक एक शिष्य को सौंपा: पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु। इसी कारण वे वेदव्यास कहलाए।
- 3138 ई.पू. (पारम्परिक गणना)
कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्धयुद्ध
पारम्परिक गणना से कलियुग से 36 वर्ष पहले कुरुओं के क्षेत्र में अठारह दिन युद्ध चला। उसके पहले दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया।
- 3138 ई.पू. (पारम्परिक गणना)
हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का राज्याभिषेकराजनीति
युद्ध के बाद युधिष्ठिर कुरुओं के सिंहासन पर बैठे और अश्वमेध यज्ञ किया, जैसा आश्वमेधिक पर्व में वर्णित है। उन्होंने 36 वर्ष राज्य किया।
- 3102 ई.पू. (पारम्परिक गणना)
समुद्र ने द्वारका को लील लियाधर्म
मौसल पर्व कहता है कि श्रीकृष्ण के जाते ही समुद्र ने द्वारका को ढक लिया। अर्जुन बचे हुए लोगों को इन्द्रप्रस्थ ले गए।
- 3102 ई.पू. (पारम्परिक गणना)
परीक्षित कुरु सिंहासन परराजनीति
पाण्डव महाप्रस्थान पर निकले तो अर्जुन के पौत्र परीक्षित का अभिषेक हुआ। गंगा तट पर शुकदेव जी ने उन्हें पहली बार भागवत पुराण सुनाया।
- 18 फ़रवरी 3102 ई.पू. (पारम्परिक गणना)
श्रीकृष्ण का प्रस्थान, कलियुग का आरम्भधर्म
श्रीकृष्ण के प्रस्थान के साथ कलियुग आरम्भ हुआ। आर्यभट की गणना, कि 499 ई. में कलि के 3,600 वर्ष बीत चुके थे, इसका आरम्भ 3102 ई.पू. में रखती है, और हर पंचांग आज भी इसी से गिनता है।
- 3076 ई.पू. (कश्मीरी गणना)
कश्मीर में सप्तर्षि संवत् का आरम्भसंस्कृति
कश्मीर लौकिक या सप्तर्षि संवत् में वर्ष गिनता था, जो कलि के 25 वर्ष बाद आरम्भ हुआ। कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी इसी संवत् में दिनांकित की।
02 · सिन्धु–सरस्वती सभ्यतालगभग 7000–1300 ई.पू.
- लगभग 10,000 ई.पू. और उससे पहले
भीमबेटका के शैलाश्रयों में चित्रकारसंस्कृति
भोपाल के दक्षिण की पहाड़ियों में लोगों ने 400 से अधिक शैलाश्रयों पर शिकार, नृत्य और पशु चित्रित किए। सबसे पुरानी परतें हिमयुग के अन्त से भी पहले की हैं।
- लगभग 7000 ई.पू.
मेहरगढ़ में किसान बसेसंस्कृति
बोलन दर्रे की तलहटी में ग्रामीणों ने जौ और गेहूँ उगाए और कच्ची ईंटों के घरों में रहकर गाय, भेड़ और बकरियाँ पालीं। यह दक्षिण एशिया के सबसे पुराने कृषक गाँवों में है।
- लगभग 7000–5500 ई.पू.
मेहरगढ़ में दाँतों की ड्रिलिंगविज्ञान
मेहरगढ़ की कब्रों से मिले ग्यारह दाढ़ों में साफ़ छेद हैं, जो जीवित लोगों पर चकमक के धनुष-बरमे से किए गए। 2006 में नेचर पत्रिका में छपी यह खोज ज्ञात सबसे पुरानी दन्त-चिकित्सा है।
- लगभग 3300 ई.पू.
सिन्धु और सरस्वती के किनारे आरम्भिक नगरसंस्कृति
कोट दीजी, कालीबंगा और हड़प्पा की पहली परतों जैसे परकोटे वाले नगर उभरते हैं, एक जैसे मृद्भाण्ड और वे पहले चिह्न लिए जो आगे चलकर सिन्धु लिपि बने।
- लगभग 3000 ई.पू.
कश्मीर के बुर्जहोम में गर्त-निवासीसंस्कृति
डल घाटी के ऊपर नवपाषाण परिवार लोएस मिट्टी में खोदे गड्ढों में रहते थे, हड्डी के औज़ार बरतते थे और अपने मृतकों के साथ कुत्तों को दफ़नाते थे।
- लगभग 2800 ई.पू.
कालीबंगा का जुता हुआ खेतविज्ञान
राजस्थान में घग्गर के सूखे पाट पर खुदाई करने वालों को आड़ी-तिरछी जाली में बने कूँड़ मिले, अब तक खोदा गया सबसे पुराना जुता खेत। वहाँ के किसान आज भी इसी ढंग से दो फ़सलें बोते हैं।
- लगभग 2600 ई.पू.
महान नगरों का उदयराजनीति
हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी, गनवेरीवाला और धोलावीरा पक्की ईंटों के नियोजित नगर बन जाते हैं, जिनमें सीधी गलियाँ, ढकी नालियाँ और एक मानक के बाट हैं।
- लगभग 2500 ई.पू.
मोहनजोदड़ो का महास्नानागारधर्म
12 मीटर लम्बा कुण्ड, जिसे जिप्सम के गारे और डामर से जलरोधी बनाया गया, दोनों सिरों पर सीढ़ियाँ। पवित्र कुण्ड में स्नान की रीति आज भी हर तीर्थ पर है।
- लगभग 2500–2400 ई.पू.
मोहनजोदड़ो की योगी मुद्राधर्म
सेलखड़ी की एक मुद्रा पर सींगधारी आकृति योगासन में बैठी है, चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा। बहुत से लोग इसमें पशुपति, प्राणियों के स्वामी को देखते हैं; उस पर लिखी लिपि अभी पढ़ी नहीं गई।
- लगभग 2500 ई.पू.
धोलावीरा ने पानी सहेजाविज्ञान
कच्छ के रण में खडीर द्वीप पर इस नगर ने सूखी धरती में जीने के लिए पत्थर काटकर जलाशय बनाए और दो बरसाती नालों पर बाँध बाँधे। इसके उत्तरी द्वार के पास दस बड़े चिह्नों वाला एक नामपट गिरा मिला।
- लगभग 2500 ई.पू.
कालीबंगा और लोथल की अग्निवेदियाँधर्म
कालीबंगा में ऊँचे चबूतरे पर राख और बीच में खड़े स्तम्भ वाली मिट्टी-लिपी अग्निवेदियों की पंक्तियाँ मिलीं, और लोथल में भी ऐसी ही वेदियाँ। अग्नि से उपासना आज के हवन तक अटूट चली आती है।
- लगभग 2500 ई.पू.
राखीगढ़ी में दफ़नाई गई एक स्त्रीविज्ञान
2019 में पढ़े और प्रकाशित उसके जीनोम में स्टेपी वंश का कोई अंश नहीं है। यह नगरों के लोगों को दक्षिण एशिया की बाद की आबादी से जोड़ता है।
- लगभग 2400 ई.पू.
लोथल का ईंटों का बेसिनविज्ञान
साबरमती के मुहाने के पास ईंटों की दीवारों वाला लम्बा बेसिन, जिसे एस. आर. राव ने गोदी माना, मनका-निर्माताओं और व्यापारियों के नगर की सेवा करता था।
- लगभग 2300 ई.पू.
मेलुहा के जहाज़ अक्कड़ पहुँचेसंस्कृति
अक्कड़ के सारगोन ने गर्व से लिखवाया कि मेलुहा के जहाज़ उसकी राजधानी पर लंगर डालते हैं। सिन्धु मुद्राएँ, कार्नेलियन मनके और बाट पूरे मेसोपोटामिया और खाड़ी में मिलते हैं।
- लगभग 2200–1900 ई.पू.
सरस्वती क्षीण, नगर उजड़ने लगेसंस्कृति
लम्बे सूखे और नदियों के मार्ग बदलने से घग्गर-हकरा, ऋग्वेद की सरस्वती, सूख गई। बड़े नगर खाली हुए और लोग पूर्व में गंगा की ओर तथा दक्षिण में गुजरात की ओर बढ़ गए।
- लगभग 2000–1800 ई.पू.
सनौली में रथ-समाधियाँयुद्ध
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागपत के पास 2018 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को ठोस पहियों वाले रथ, ताँबे की तलवारें, ढालें और शिरस्त्राण लिए दफ़नाए योद्धा मिले।
- लगभग 1800–1500 ई.पू.
गंगा घाटी में लोहा गलाया गयाविज्ञान
चन्दौली के पास मल्हार और राजा नल का टीला से मिली भट्टियाँ, धातुमल और लोहे के औज़ार दिखाते हैं कि भारत में लोहे का काम पहले माने गए समय से बहुत पहले होता था।
- लगभग 1900–1300 ई.पू.
उत्तर हड़प्पा गाँवों में जीवन चलता रहासंस्कृति
मुद्राएँ और बड़े नगर लुप्त होते हैं, पर हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गुजरात के गाँव पुराने शिल्प, बाट और घरों की बनावट सँभाले रहते हैं।
03 · जनपद और मगध का उदयलगभग 1300–321 ई.पू.
- लगभग 1200–600 ई.पू.
कुरु प्रदेश की चित्रित धूसर मृद्भाण्ड बस्तियाँसंस्कृति
हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, मथुरा और कुरुक्षेत्र में काले रंग से चित्रित महीन धूसर मृद्भाण्ड मिलते हैं। इनका फैलाव उन्हीं भूभागों से मेल खाता है जिनके नाम महाभारत में हैं।
- लगभग 1000 ई.पू. से आगे
दक्कन और दक्षिण के महापाषाण निर्मातासंस्कृति
लोहे के हथियारों और काले-लाल मृद्भाण्डों के साथ पत्थर के घेरे, शिला-पेटिकाएँ और कलश-समाधियाँ विदर्भ से तमिलनाडु और केरल तक फैलती हैं।
- 877–777 ई.पू. (जैन परम्परा)
तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथधर्म
काशी के राजकुमार के रूप में जन्मे पार्श्वनाथ ने चातुर्याम धर्म सिखाया और झारखण्ड के सम्मेद शिखर पर निर्वाण पाया, जिस पर जैन आज भी नंगे पाँव चढ़ते हैं।
- लगभग 800 ई.पू.
गंगा की बाढ़ ने हस्तिनापुर को डुबोयाराजनीति
पुराण कहते हैं कि राजा निचक्षु के समय गंगा हस्तिनापुर को बहा ले गई और वे कौशाम्बी चले गए। 1950–52 में बी. बी. लाल की खुदाई में बाढ़ की एक मोटी परत मिली जिस पर वह नगर समाप्त होता है।
- लगभग 800–500 ई.पू. (आधुनिक अनुमान)
बौधायन ने कर्ण का नियम बतायाविज्ञान
ठीक आकार की यज्ञवेदियाँ बनाने के लिए बौधायन शुल्बसूत्र नियम देता है कि आयत के कर्ण पर बना वर्ग उसकी दोनों भुजाओं पर बने वर्गों के योग के बराबर है, और दो के वर्गमूल का निकट मान भी।
- लगभग 600 ई.पू.
सोलह महाजनपदराजनीति
अंगुत्तर निकाय सोलह महाजनपदों की सूची देता है, गान्धार और कम्बोज से अंग और मगध तक, बीच में काशी, कोसल, वत्स और अवन्ति।
- लगभग 6ठी शताब्दी ई.पू.
वैशाली का लिच्छवि गणराज्यराजनीति
वज्जि संघ का शासन कुल-प्रमुखों की सभा करती थी जो वैशाली के संथागार में मिलती थी। बुद्ध ने बार-बार और मेल से मिलने के लिए इसकी प्रशंसा की।
- लगभग 6ठी शताब्दी ई.पू.
आहत चाँदी के सिक्केसंस्कृति
सूर्य, पर्वत और पशुओं के ठप्पे वाले चाँदी के कार्षापण जनपदों में चलने लगे, भारत के पहले सिक्के।
- 6ठी शताब्दी ई.पू. तक
तक्षशिला में दूर-दूर से छात्रसंस्कृति
पालि ग्रन्थ बताते हैं कि वैद्य जीवक ने तक्षशिला में सात वर्ष शिक्षा पाई। राजकुमार और ब्राह्मण बालक वहाँ वेद, धनुर्विद्या और आयुर्वेद सीखने आते थे।
- तिथि विवादित; प्रायः लगभग 600 ई.पू.
काशी में सुश्रुत का शल्य-शिक्षणविज्ञान
दिवोदास धन्वन्तरि द्वारा सुश्रुत को पढ़ाई गई सुश्रुत संहिता सौ से अधिक यन्त्रों का और गाल की त्वचा से कटी नाक को फिर से बनाने का वर्णन करती है।
- 599 ई.पू. (जैन परम्परा)
वैशाली के पास वर्धमान महावीर का जन्मधर्म
चौबीसवें तीर्थंकर का जन्म कुण्डग्राम में सिद्धार्थ और त्रिशला के घर हुआ। तीस वर्ष की आयु में उन्होंने बारह वर्ष के तप के लिए घर छोड़ दिया।
- लगभग 6ठी शताब्दी ई.पू.
वैगई तट पर कीलड़ी का ईंटों का नगरसंस्कृति
मदुरै के पास 2015 से हुई खुदाइयों में ईंटों के घर, रंगाई के कुण्ड और तमिल-ब्राह्मी में खुरचे नामों वाले ठीकरे मिले। कार्बन तिथियाँ लगभग 580 ई.पू. तक जाती हैं।
- लगभग 563 ई.पू. (प्रचलित गणना)
लुम्बिनी में सिद्धार्थ गौतम का जन्मधर्म
शाक्य प्रमुख शुद्धोदन और मायादेवी के घर लुम्बिनी के उपवन में जन्मे सिद्धार्थ कपिलवस्तु में बड़े हुए।
- लगभग 544 ई.पू.
बिम्बिसार मगध के सिंहासन परराजनीति
40 किलोमीटर से लम्बी पत्थर की दीवार से घिरे राजगृह से बिम्बिसार ने अंग को जीता और मगध को पूर्व की उभरती शक्ति बनाया।
- लगभग 528 ई.पू. (प्रचलित गणना)
बोधगया में बोधि, सारनाथ में पहला उपदेशधर्म
निरंजना के तट पर पीपल के नीचे बुद्ध को बोधि मिली, फिर सारनाथ के मृगदाव में पाँच साथियों के सामने उन्होंने धर्मचक्र प्रवर्तित किया।
- 527 ई.पू. (जैन परम्परा)
पावापुरी में महावीर का निर्वाणधर्म
महावीर ने पावापुरी में उस रात देह त्यागी जिसे जैन दीपावली के रूप में मनाते हैं। वीर निर्वाण संवत् इसी वर्ष से गिना जाता है।
- लगभग 518 ई.पू.
फ़ारस ने गान्धार और सिन्धु प्रदेश लियायुद्ध
हख़ामनी दारा प्रथम ने अपने अभिलेखों में गान्धार और फिर निचली सिन्धु के हिन्दुश को अपने क्षत्रपों में गिनाया। हेरोडोटस कहता है कि हिन्दुश सबसे बड़ा कर, सोने की धूल में, देता था।
- लगभग 492 ई.पू.
अजातशत्रु मगध का शासकराजनीति
अजातशत्रु ने कोसल से युद्ध किया और लम्बे संघर्ष के बाद वज्जि संघ को तोड़ा। इसके लिए उसने गंगा तट पर पाटलिग्राम गाँव को दुर्ग बनाया।
- लगभग 483 ई.पू. (प्रचलित गणना)
कुशीनगर में बुद्ध का परिनिर्वाणधर्म
अस्सी वर्ष की आयु में बुद्ध ने कुशीनगर में दो साल वृक्षों के बीच देह त्यागी। उनके अवशेष आठ दावेदारों में बँटे और स्तूपों में रखे गए।
- लगभग 483 ई.पू.
राजगृह में प्रथम बौद्ध संगीतिधर्म
अजातशत्रु के संरक्षण में पाँच सौ भिक्षु सप्तपर्णी गुफा में मिले। आनन्द ने सुत्त और उपालि ने विनय का पाठ किया।
- लगभग 460 ई.पू.
पाटलिपुत्र राजधानी बनाराजनीति
अजातशत्रु के पुत्र उदयिन ने मगध की राजधानी सोन-गंगा संगम पर पाटलिपुत्र में बसाई। यह आठ शताब्दियों तक साम्राज्य की गद्दी रहा।
- लगभग 413 ई.पू.
शिशुनाग ने अवन्ति की शक्ति समाप्त कीराजनीति
शिशुनाग वंश ने हर्यंकों का स्थान लिया। शिशुनाग ने अवन्ति के प्रद्योत राजाओं को तोड़कर मालवा को मगध में मिला लिया।
- लगभग 5वीं–4थी शताब्दी ई.पू.
पाणिनि ने अष्टाध्यायी रचीसंस्कृति
अटक के पास शालातुर के पाणिनि ने लगभग 4,000 सूत्रों में संस्कृत व्याकरण बाँधा, उन 14 माहेश्वर सूत्रों पर जो परम्परा के अनुसार महादेव के डमरू से निकले।
- लगभग 383 ई.पू.
वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीतिधर्म
परिनिर्वाण के सौ वर्ष बाद भिक्षु राजा कालाशोक के समय वैशाली में मिले और विनय के दस विवादित नियमों का निपटारा किया।
- लगभग 345 ई.पू.
महापद्म नन्द ने पहला बड़ा साम्राज्य बनायाराजनीति
पुराण उसे सर्वक्षत्रान्तक कहते हैं। उसने कलिंग जीता, और यूनानी लेखकों ने सुना कि उसकी सेना में 2,00,000 पैदल और 3,000 हाथी थे।
- 327 ई.पू.
अश्वकों ने मस्सगा में सिकन्दर को रोकाप्रतिरोध
स्वात घाटी में अश्वकों ने कई दिन मस्सगा की रक्षा की; सिकन्दर घायल हुआ। सरदार के मरने पर उसकी माँ क्लियोफिस ने सन्धि होने तक मोर्चा सँभाला।
- 326 ई.पू.
झेलम पर पोरस का सिकन्दर से युद्धयुद्ध
पौरव ने वर्षा में हाथियों और रथों के साथ हाइडस्पीज़ (झेलम) पर मकदूनियाई सेना का सामना किया। वह मैदान हारा, पर सिकन्दर ने उसका राज्य लौटाया और बढ़ाया भी।
- 326 ई.पू.
सिकन्दर की सेना ने व्यास पार करने से मना कियाप्रतिरोध
गंगा पार नन्द सेना की बात सुनकर मकदूनियाई सैनिकों ने हाइफ़ेसिस (व्यास) से आगे जाने से मना कर दिया। सिकन्दर को लौटना पड़ा।
- 325 ई.पू.
मालवों ने सिकन्दर को घायल कियाप्रतिरोध
निचली रावी पर मालवों के एक नगर पर धावा करते हुए सिकन्दर की छाती में तीर लगा और वह मरते-मरते बचा। उसी वर्ष वह मकरान तट से भारत से निकल गया।
04 · मौर्य साम्राज्य321–185 ई.पू.
- लगभग 321 ई.पू.
चन्द्रगुप्त मौर्य ने नन्दों को उखाड़ाराजनीति
चाणक्य के मार्गदर्शन में युवा चन्द्रगुप्त ने पाटलिपुत्र लिया और पंजाब से यूनानी चौकियाँ हटाकर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
- लगभग 4थी शताब्दी ई.पू.
कौटिल्य का अर्थशास्त्रसंस्कृति
पन्द्रह अधिकरणों में राजनीति का ग्रन्थ: कर, गुप्तचर, दुर्ग, न्यायालय, खानें, युद्ध और सन्धि। सदियों से लुप्त यह ग्रन्थ 1905 में मैसूर में मिला।
- लगभग 305–303 ई.पू.
सेल्यूकस ने पश्चिमी प्रान्त सौंपेयुद्ध
चन्द्रगुप्त से युद्ध के बाद सेल्यूकस निकेटर ने अराकोसिया, गेड्रोसिया और पैरोपैनिसडी छोड़ दिए और 500 युद्ध-हाथी पाए। एक विवाह-सम्बन्ध से सन्धि पक्की हुई।
- लगभग 302 ई.पू.
पाटलिपुत्र में मेगस्थनीज़विश्व
सेल्यूकस के दूत ने 570 बुर्जों वाली लकड़ी की प्राचीर के पीछे 15 किलोमीटर लम्बे नगर का और ऐसे देश का वर्णन किया जहाँ, उसके अनुसार, अकाल नहीं पड़ता था।
- लगभग 300 ई.पू.
गिरनार की सुदर्शन झीलविज्ञान
चन्द्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त ने गिरनार के नीचे एक धारा बाँधकर सुदर्शन झील बनाई; अशोक के अधिकारी तुषास्फ ने नहरें जोड़ीं। 150 ई. का रुद्रदामन का अभिलेख दोनों बातें दर्ज करता है।
- लगभग 297 ई.पू. (जैन परम्परा)
श्रवणबेलगोला में चन्द्रगुप्त का देहत्यागधर्म
जैन परम्परा कहती है कि चन्द्रगुप्त ने राज छोड़ा, बारह वर्ष के अकाल में आचार्य भद्रबाहु के साथ दक्षिण गए और चन्द्रगिरि पहाड़ी पर सल्लेखना से देह त्यागी।
- लगभग 297 ई.पू.
बिन्दुसार उत्तराधिकारीराजनीति
यूनानी उसे अमित्रोकेटीज़ कहते थे, अमित्रघात यानी शत्रुओं का संहारक। उसने साम्राज्य को दक्कन तक थामे रखा और एन्टियोकस का दूत डाइमेकस उसके दरबार आया।
- लगभग 268 ई.पू.
अशोक का राज्याभिषेकराजनीति
विवादित उत्तराधिकार के बाद अशोक, जो अपने अभिलेखों में स्वयं को देवानंपिय पियदसि कहता है, पाटलिपुत्र में विधिवत अभिषिक्त हुआ।
- लगभग 261 ई.पू.
कलिंग युद्धयुद्ध
अशोक का तेरहवाँ शिलालेख कहता है कि कलिंग से 1,50,000 लोग बन्दी बनाकर ले जाए गए और 1,00,000 मारे गए। कलिंग के इस प्रतिरोध ने सम्राट को धम्म की ओर मोड़ा।
- लगभग 258 ई.पू. से
पूरे भारत में अशोक के अभिलेखराजनीति
कन्धार से कर्नाटक तक ब्राह्मी, खरोष्ठी, यूनानी और अरामाई में शिला और स्तम्भ लेख माता-पिता, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति आदर और पशुओं पर दया का आग्रह करते हैं।
- लगभग 257 ई.पू.
दूसरे शिलालेख में तमिल राज्यों के नामराजनीति
अशोक चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्र और केरलपुत्र को स्वतन्त्र पड़ोसी बताता है, जहाँ उसने मनुष्यों और पशुओं की चिकित्सा का प्रबन्ध कराया।
- लगभग 257–250 ई.पू.
बराबर गुफाएँ आजीविकों को दानधर्म
अपने राज्य के बारहवें और उन्नीसवें वर्ष में अशोक ने ग्रेनाइट में कटी, दर्पण-सी चमकाई गुफाएँ दान कीं। उनके पास की लोमस ऋषि गुफा का नक्काशीदार द्वार लकड़ी की कुटिया की नकल है।
- लगभग 250 ई.पू.
पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीतिधर्म
अशोक के समय मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में संगीति हुई जिसमें कथावत्थु संकलित हुआ। फिर धर्मदूत गान्धार, हिमालय, सुवर्णभूमि और लंका भेजे गए।
- लगभग 250 ई.पू.
महेन्द्र और संघमित्रा लंका गएधर्म
अशोक के पुत्र और पुत्री राजा देवानंपिय तिस्स के पास धम्म लेकर गए; संघमित्रा बोधिवृक्ष की वह शाखा ले गईं जो आज भी अनुराधापुर में हरी है।
- लगभग 250 ई.पू.
सारनाथ का सिंह-शीर्षसंस्कृति
सारनाथ के अशोक स्तम्भ के शीर्ष पर धर्मचक्रों वाले ढोल पर पीठ से पीठ सटाए चार सिंह थे। 1950 से यह भारत का राजचिह्न है।
- लगभग 3री शताब्दी ई.पू.
साँची का पहला स्तूपधर्म
अशोक ने विदिशा के पास साँची की पहाड़ी पर ईंटों का स्तूप और चमकदार स्तम्भ खड़ा किया, जहाँ उसकी रानी देवी का घर था।
- लगभग 249 ई.पू.
अशोक लुम्बिनी पहुँचाधर्म
रुम्मिनदेई स्तम्भ कहता है कि अपने बीसवें वर्ष में राजा स्वयं आया, यहाँ पूजा की क्योंकि बुद्ध यहीं जन्मे थे, और गाँव को कर से छूट दी।
- लगभग 232 ई.पू.
अशोक की मृत्यु, साम्राज्य का बँटवाराराजनीति
अशोक के बाद मौर्य राज्य उत्तराधिकारियों में बँट गया; दशरथ ने नागार्जुनी गुफाएँ आजीविकों को दीं, और प्रान्त हाथ से निकलने लगे।
05 · शुंग, सातवाहन, खारवेल और संगम राज्य185 ई.पू. – 320 ई.
- लगभग 185 ई.पू.
पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश समाप्त कियाराजनीति
सेनापति पुष्यमित्र ने सेना के निरीक्षण के समय अन्तिम मौर्य बृहद्रथ को मार गिराया और पाटलिपुत्र का सिंहासन लिया।
- लगभग 2री शताब्दी ई.पू.
पुष्यमित्र के दो अश्वमेधधर्म
अयोध्या में उसके वंशज धनदेव का अभिलेख पुष्यमित्र को दो अश्वमेध करने वाला कहता है, सदियों बाद किसी राजा के बड़े वैदिक यज्ञ।
- लगभग 150 ई.पू.
पतंजलि ने महाभाष्य लिखासंस्कृति
पाणिनि पर उनके महाभाष्य में पुष्यमित्र के यज्ञ का उल्लेख है, और हाल की घटना के व्याकरणिक उदाहरण के रूप में ‘अरुणद् यवनः साकेतम्’, यवन ने साकेत को घेरा।
- लगभग 150 ई.पू.
मिलिन्द ने नागसेन से प्रश्न पूछेधर्म
सागल (सियालकोट) के हिन्द-यवन राजा मिनान्डर ने भिक्षु नागसेन से शास्त्रार्थ किया; यह संवाद मिलिन्दपञ्ह के रूप में बचा है।
- लगभग 150–100 ई.पू.
भरहुत की नक्काशीदार वेदिकासंस्कृति
शुंगों के समय दानदाताओं ने भरहुत स्तूप की वेदिका पर जातक दृश्य, यक्ष और यक्षी उकेरे, हर फलक पर ब्राह्मी में नाम।
- लगभग 2री शताब्दी ई.पू.
अजन्ता की पहली गुफाएँसंस्कृति
भिक्षुओं ने वाघोरा के ऊपर घोड़े की नाल जैसी चट्टान में पहले चैत्य, गुफा 9 और 10, काटे। गुफा 10 में इस काल के चित्र आज भी हैं।
- लगभग 2री–1ली शताब्दी ई.पू.
गुडिमल्लम का शिवलिंगधर्म
आन्ध्र में रेणिगुण्टा के पास चमकाए पत्थर का एक लिंग, जिसके मुख पर खड़े शिव उकेरे हैं, इसी काल से पूजित है, आज भी पूजित सबसे पुराने लिंगों में एक।
- लगभग 110 ई.पू.
हेलियोडोरस ने वासुदेव के लिए गरुड़ध्वज खड़ा कियाधर्म
राजा अन्तिआलकिडस के यूनानी दूत ने, जो स्वयं को भागवत कहता है, विदिशा में देवदेव वासुदेव के लिए गरुड़ध्वज खड़ा किया। यह आज भी खड़ा है, लोग इसे खम्बा बाबा कहते हैं।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.पू.
घोसुण्डी: संकर्षण-वासुदेव का पूजा-प्राकारधर्म
चित्तौड़गढ़ के पास संस्कृत अभिलेख भगवान संकर्षण और वासुदेव के पूजा-स्थल के चारों ओर पत्थर की दीवार बनाने का उल्लेख करता है, सबसे पुराने वैष्णव साक्ष्यों में एक।
- लगभग 2री–1ली शताब्दी ई.पू.
कलिंग के खारवेल ने मगध को झुकायाप्रतिरोध
उदयगिरि का उसका हाथीगुम्फा अभिलेख कहता है कि उसने मगध के राजा को हराया और वह कलिंग-जिन प्रतिमा वापस लाया जिसे एक नन्द राजा ले गया था।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.पू.
नानेघाट में रानी नागनिका का अभिलेखधर्म
एक व्यापारिक घाट के सिरे की गुफा में सातवाहन रानी सातकर्णि प्रथम के यज्ञों, दो अश्वमेध और एक राजसूय, की गायों और मुद्राओं में दी दक्षिणा सहित सूची देती है। इसके अंक भारत के सबसे पुराने अंकों में हैं।
- लगभग 73 ई.पू.
कण्वों ने शुंगों का स्थान लियाराजनीति
अन्तिम शुंग राजा देवभूति के मन्त्री वासुदेव कण्व ने पाटलिपुत्र में सत्ता ली। उसका वंश लगभग 45 वर्ष चला।
- 57 ई.पू.
विक्रम संवत् का आरम्भसंस्कृति
परम्परा इस संवत् को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य और शकों पर उनकी विजय से जोड़ती है। पुराने अभिलेख इसे कृत और फिर मालव संवत् कहते हैं; उत्तर भारत के अधिकांश पर्व आज भी इसी से गिने जाते हैं।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.पू.
साँची के तोरणसंस्कृति
महास्तूप के चारों ओर पत्थर के चार तोरण खड़े हुए। दक्षिणी तोरण का अभिलेख बताता है कि एक सातकर्णि राजा के समय विदिशा के हाथीदाँत-शिल्पियों ने एक फलक उकेरा।
- 31 ई.पू. (तमिल परम्परा)
तिरुक्कुरळ के कवि तिरुवल्लुवरसंस्कृति
तमिलनाडु सरकार का तिरुवल्लुवर संवत् 31 ई.पू. से गिना जाता है। धर्म, अर्थ और काम पर उनके 1,330 दोहे आज भी तमिल घरों में पढ़े जाते हैं।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.पू.–1ली शताब्दी ई.
अरिकमेडु और मुज़िरिस में रोमन जहाज़संस्कृति
मानसूनी हवाओं के सहारे मिस्र से जहाज़ काली मिर्च, मोती और मलमल के लिए तमिल तट पहुँचते थे। पुदुच्चेरी के पास अरिकमेडु की मिट्टी में रोमन मटके और सिक्के मिलते हैं।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.
कार्ले का महान चैत्यसंस्कृति
लोनावला के पास पहाड़ी में कटा कार्ले का चैत्य लगभग 45 मीटर गहरा है, और उसकी मेहराबदार छत की सागौन की असली कड़ियाँ दो हज़ार वर्षों से टिकी हैं।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.
पेरिप्लस में भारत के बन्दरगाहविश्व
एक यूनानी नाविक-पुस्तिका बैरीगाज़ा (भरूच), मुज़िरिस, नेलकिण्डा और गंगा के मुहाने के नाम देती है और बताती है कि हर बन्दरगाह क्या ख़रीदता-बेचता था।
- 78 ई.
शक संवत् का आरम्भसंस्कृति
जिस संवत् को आगे शालिवाहन शक कहा गया, वह इसी वर्ष आरम्भ होता है। आर्यभट, वराहमिहिर और अनगिनत ताम्रपत्र इसी से तिथि देते हैं, और भारत का राष्ट्रीय पंचांग आज इसी से गिनता है।
- लगभग 1ली शताब्दी ई.
विम कडफ़िसेस के सिक्कों पर शिवधर्म
कुषाण राजा के सोने के सिक्कों पर त्रिशूल और नन्दी के साथ शिव हैं, और उस पर उसकी उपाधि माहेश्वर, महादेव का भक्त, लिखी है।
- लगभग 125 ई.
गौतमीपुत्र सातकर्णि ने नहपान को कुचलाप्रतिरोध
सातवाहन राजा ने क्षहरात शकों को नष्ट किया और जोगलथम्बी में उनकी चाँदी पर फिर से ठप्पा लगाया। उसकी माता का नासिक अभिलेख उसे शक, यवन और पह्लवों का उन्मूलक कहता है।
- लगभग 127 ई.
कनिष्क का शासन आरम्भराजनीति
1993 में अफ़ग़ानिस्तान में मिला रबातक अभिलेख कहता है कि कनिष्क का राज्य साकेत, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र और चम्पा तक था। बौद्ध परम्परा उसके समय कश्मीर में एक संगीति बताती है।
- लगभग 2री शताब्दी ई.
चरक संहिताविज्ञान
चरक, एक परम्परा के अनुसार कनिष्क के दरबार के वैद्य, ने अग्निवेश तन्त्र का संस्कार कर चरक संहिता बनाई, जो आयुर्वेदीय कायचिकित्सा का आधार-ग्रन्थ है।
- लगभग 2री शताब्दी ई.
करिकाल ने कावेरी पर कल्लणै बनायाविज्ञान
चोल राजा ने तिरुच्चिराप्पल्ली के पास कावेरी पर बिना गढ़े पत्थरों का बाँध बाँधा। मरम्मत और ऊँचाई पाकर यह कल्लणै आज भी डेल्टा को सींचता है।
- 150 ई.
जूनागढ़ में रुद्रदामन का अभिलेखसंस्कृति
अशोक के शिलालेखों वाली चट्टान पर ही खुदा यह अभिलेख बताता है कि तूफ़ान में सुदर्शन का बाँध टूटा और तिगुना मज़बूत बनाया गया। यह शास्त्रीय संस्कृत का पहला लम्बा अभिलेख है।
- लगभग 2री शताब्दी ई.
अमरावती का संगमरमर स्तूपसंस्कृति
आन्ध्र में कृष्णा तट पर सातवाहनों के समय महास्तूप को नक्काशीदार चूना-पत्थर के फलकों से मढ़ा गया। इनमें से बहुत से अब चेन्नई और ब्रिटिश संग्रहालय में हैं।
- लगभग 2री शताब्दी ई.
नागार्जुन का माध्यमक दर्शनधर्म
आन्ध्र के इस भिक्षु ने मूलमध्यमककारिका लिखी, महायान के माध्यमक सम्प्रदाय की जड़। परम्परा उन्हें कृष्णा तट के श्रीपर्वत से जोड़ती है।
- लगभग 2री शताब्दी ई.
सेंगुट्टुवन ने कण्णगी की प्रतिष्ठा कीधर्म
शिलप्पदिकारम् बताता है कि चेर राजा हिमालय से पत्थर लाया और कण्णगी की प्रतिमा गढ़ी, लंका के गजबाहु की उपस्थिति में। गजबाहु के शासन से इसकी तिथि मिलती है।
- लगभग 2री शताब्दी ई.पू.–2री शताब्दी ई.
भरत मुनि का नाट्यशास्त्रसंस्कृति
36 अध्यायों में भरत मुनि नाटक, नृत्य, संगीत, रंगमंच और रस का सिद्धान्त रखते हैं। भारत का हर शास्त्रीय नृत्य आज भी इसी का प्रमाण देता है।
- लगभग 2री–4थी शताब्दी ई.
यौधेय गणराज्य के सिक्केप्रतिरोध
सतलुज–यमुना के बीच का योद्धा गणराज्य, जिसे एक बार रुद्रदामन ने हराया था, कुषाणों के विरुद्ध फिर उठा। इनके सिक्कों पर ‘यौधेय गणस्य जयः’ लिखा है और कार्तिकेय अंकित हैं।
- लगभग 3री शताब्दी ई.
काशी में भारशिवों के दस अश्वमेधपुनर्निर्माण
वाकाटक ताम्रपत्र भारशिव नागों की प्रशंसा करते हैं, जो शिवलिंग को कन्धों पर धारण करते थे, पराक्रम से पाए भागीरथी जल से अभिषिक्त हुए और दस अश्वमेध किए।
- लगभग 3री शताब्दी ई.
नागार्जुनकोण्डा में इक्ष्वाकुधर्म
कृष्णा घाटी में राजा चान्तमूल ने अश्वमेध किया और राजपरिवार की स्त्रियों ने बौद्ध विहारों को दान दिया। यह स्थल अब नागार्जुन सागर जलाशय के नीचे है।
- लगभग 250 ई.
विन्ध्यशक्ति ने वाकाटक वंश की नींव रखीराजनीति
विदर्भ से वाकाटक दक्कन के शासक बने; विन्ध्यशक्ति के पुत्र प्रवरसेन प्रथम ने चार अश्वमेध किए और सम्राट की उपाधि ली।
- लगभग 3री–4थी शताब्दी ई. (सबसे पुराने पत्र, रेडियोकार्बन)
बख़्शाली पाण्डुलिपि में शून्य बिन्दु के रूप मेंविज्ञान
1881 में पेशावर के पास मिले भोजपत्र के पन्नों में गणना शून्य के लिए बिन्दु से की गई है। 2017 में बोडलियन के रेडियोकार्बन परीक्षण ने कुछ पत्रों को 3री–4थी शताब्दी का बताया।
06 · गुप्त युग320–550 ई.
- 319–320 ई.
चन्द्रगुप्त प्रथम से गुप्त संवत्राजनीति
लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह करने वाले चन्द्रगुप्त प्रथम ने, जिनके सिक्कों पर रानी का नाम भी है, महाराजाधिराज की उपाधि ली। गुप्त संवत् 319–320 से गिना जाता है।
- लगभग 335–375 ई.
समुद्रगुप्त के अभियानयुद्ध
उसने आर्यावर्त के राजाओं का उन्मूलन किया और दक्षिण में काँची तक गया, दक्षिणी राजाओं को हराकर छोड़ दिया। उसके अश्वमेध सिक्कों पर यूप के सामने यज्ञ का घोड़ा है।
- लगभग 345 ई.
मयूरशर्मा ने कदम्ब राज्य स्थापित कियाराजनीति
तालगुण्ड अभिलेख कहता है कि काँची में एक पल्लव सैनिक से अपमानित ब्राह्मण विद्यार्थी ने तलवार उठाई और बनवासी में राज्य बनाया।
- लगभग 350 ई.
प्रयाग स्तम्भ पर हरिषेण की प्रशस्तिसंस्कृति
अशोक के एक स्तम्भ पर दरबारी कवि हरिषेण ने समुद्रगुप्त की विजयें राजा-दर-राजा उकेरीं, उत्तर और दक्षिण के बीस से अधिक शासकों के नाम सहित।
- लगभग 380 ई.
चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्यराजनीति
उसने अपनी पुत्री प्रभावतीगुप्ता का विवाह वाकाटक राजा से कर दक्कन को सुरक्षित किया; वह आगे चलकर वाकाटक राज्य की संरक्षिका शासिका रही।
- 401 ई.
उदयगिरि का वराह फलकधर्म
विदिशा के पास गुप्त संवत् 82 के अभिलेख वाली गुफा के बगल में चट्टान पर विशाल भगवान वराह भूदेवी को जल से उठा रहे हैं, और ऋषियों तथा देवों की पंक्तियाँ देख रही हैं।
- लगभग 402–411 ई.
फ़ाहियान की भारत यात्राविश्व
चीनी भिक्षु विनय ग्रन्थों की प्रतिलिपि करते हुए गान्धार से पाटलिपुत्र और ताम्रलिप्ति तक पैदल गया। उसने मध्यदेश को शान्त पाया, जहाँ निःशुल्क चिकित्सालय थे और कर हल्के।
- लगभग 400 ई.
राजा चन्द्र का लौह स्तम्भविज्ञान
छह टन से अधिक पिटवाँ लोहे का यह स्तम्भ विष्णुध्वज के रूप में खड़ा किया गया और सोलह सदियों से बिना गम्भीर जंग के खड़ा है। अब यह दिल्ली के महरौली में है।
- लगभग 409 ई.
पश्चिमी क्षत्रप गुप्तों के हाथों समाप्तयुद्ध
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने मालवा, गुजरात और सौराष्ट्र में तीन सदियों के शक शासन को समाप्त किया और उन्हीं के ढंग पर चाँदी के सिक्के चलाए।
- लगभग 5वीं शताब्दी ई.
कालिदास ने शाकुन्तल और मेघदूत रचेसंस्कृति
परम्परा कालिदास को उज्जैन के विक्रमादित्य के नवरत्नों में गिनती है। उनके रघुवंश, कुमारसम्भव और अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृत काव्य के आदर्श बने।
- 415 ई.
कुमारगुप्त प्रथम सिंहासन परराजनीति
उसका चालीस वर्ष का शासन गुप्त शान्ति का चरम था; उसने भी अश्वमेध सिक्के चलाए और कुछ सिक्कों पर वह मोर को दाना देता है, पीछे की ओर कार्तिकेय मोर पर सवार हैं।
- लगभग 427 ई.
नालन्दा महाविहार की स्थापनासंस्कृति
ह्वेनसांग राजा शक्रादित्य को, जिन्हें कुमारगुप्त प्रथम माना जाता है, नालन्दा का पहला संरक्षक बताता है। यह हज़ारों भिक्षुओं और आचार्यों का आवासीय विश्वविद्यालय बना।
- 436 ई., मरम्मत 473 ई.
मन्दसौर में रेशम-बुनकरों का सूर्य मन्दिरधर्म
लाट से आकर बसे रेशम-बुनकरों की श्रेणी ने दशपुर में सूर्य का मन्दिर बनवाया; वत्सभट्टि नामक कवि ने उसका अभिलेख लिखा, जो एक पीढ़ी बाद हुई मरम्मत भी दर्ज करता है।
- 453 या 466 ई. (जैन परम्परा)
वलभी में जैन वाचनाधर्म
देवर्द्धिगणि क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में श्वेताम्बर आगम, जो तब तक स्मृति में चलते थे, सौराष्ट्र के वलभी में लिपिबद्ध हुए।
- लगभग 455 ई.
स्कन्दगुप्त ने हूणों को पीछे धकेलाप्रतिरोध
उसका भितरी स्तम्भ कहता है कि जब वह हूणों से युद्ध में भिड़ा तो धरती काँप उठी। गुप्त सीमा एक और पीढ़ी तक टिकी रही।
- 455–457 ई.
सुदर्शन झील का फिर पुनर्निर्माणपुनर्निर्माण
जब बाँध फिर टूटा तो स्कन्दगुप्त के राज्यपाल पर्णदत्त और उसके पुत्र चक्रपालित ने उसे फिर बनवाया, जैसा जूनागढ़ शिला का तीसरा अभिलेख बताता है।
- लगभग 460–480 ई.
हरिषेण के समय अजन्ता का दूसरा उत्कर्षसंस्कृति
वाकाटक राजा हरिषेण के मन्त्रियों और सामन्तों ने अजन्ता की अधिकांश गुफाएँ कटवाईं और उन्हें जातक कथाओं और बोधिसत्त्व पद्मपाणि से चित्रित कराया।
- लगभग 475 ई.
मैत्रकों ने वलभी बसाईराजनीति
गुप्त सेनापति भटार्क ने सौराष्ट्र में वंश स्थापित किया। वलभी विद्या का केन्द्र बनी जिसे यात्री इत्सिंग ने नालन्दा के बराबर रखा।
- 499 ई.
आर्यभट ने आर्यभटीय लिखाविज्ञान
23 वर्ष की आयु में कुसुमपुर में आर्यभट ने पाई का मान 3.1416, ज्या-सारणी और पृथ्वी का दैनिक घूर्णन दिया, और ग्रहणों को पृथ्वी तथा चन्द्रमा की छाया से समझाया।
- लगभग 500 ई.
देवगढ़ का दशावतार मन्दिरधर्म
ललितपुर में बेतवा तट पर ऊँची जगती वाला पत्थर का मन्दिर शेषशायी विष्णु, गजेन्द्र मोक्ष और नर-नारायण के फलक लिए है, उत्तर भारत के सबसे पुराने मन्दिरों में।
- लगभग 5वीं शताब्दी ई.
भीतरगाँव का ईंटों का मन्दिरधर्म
कानपुर के पास भारत का सबसे पुराना बचा हुआ ऊँचे शिखर वाला ईंटों का मन्दिर खड़ा है, जिसकी दीवारों में देवताओं के मृण्मय फलक जड़े हैं।
- लगभग 500 ई.
हूण तोरमाण एरण तकयुद्ध
सागर ज़िले के एरण में विशाल वराह प्रतिमा पर तोरमाण के पहले वर्ष का अभिलेख है। हूण मध्य भारत तक घुस आए थे।
- 505 ई.
वराहमिहिर की पंचसिद्धान्तिकाविज्ञान
उज्जैन में 505 ई. के आरम्भ-बिन्दु से कार्य करते हुए उन्होंने पाँच ज्योतिष सिद्धान्तों का सार दिया; उनकी बृहत्संहिता वर्षा, रत्न, मन्दिर-निर्माण और कूप-खनन तक को समेटती है।
- लगभग 515 ई.
मिहिरकुल के आक्रमणयुद्ध
सागल से हूण राजा ने पंजाब और कश्मीर पर आक्रमण किए। ह्वेनसांग और कल्हण दोनों उसे विहार जलाने और क्रूरता के लिए याद करते हैं।
- लगभग 528 ई.
यशोधर्मन ने मिहिरकुल को हरायाप्रतिरोध
मन्दसौर के औलिकर राजा ने सोंधनी में विजय स्तम्भ खड़े किए जिन पर लिखा है कि मिहिरकुल ने उसके चरणों में सिर झुकाया। ह्वेनसांग हूण की एक और हार का श्रेय नरसिंहगुप्त बालादित्य को देता है।
- लगभग 550 ई.
गुप्त शक्ति का अवसानराजनीति
हूण युद्धों से थका साम्राज्य कन्नौज के मौखरियों, मगध के उत्तर गुप्तों, मैत्रकों और अन्य में बँट गया।
07 · महान राज्यों का युगलगभग 550–1000 ई.
- 543 ई.
पुलकेशी प्रथम ने वातापी को दुर्ग बनायाराजनीति
बादामी की चट्टान पर शक 465 का अभिलेख चालुक्य वंश के संस्थापक द्वारा बनाए दुर्ग को दर्ज करता है, जिसने अश्वमेध भी किया।
- लगभग 570 ई.
पंचतन्त्र फ़ारस पहुँचाविश्व
वैद्य बुर्ज़ोए विष्णुशर्मा की पशु-कथाएँ ख़ुसरो प्रथम के सासानी दरबार में ले गया। कलीला व दिमना के रूप में ये अरबी और फिर यूरोप तक पहुँचीं।
- लगभग 575–590 ई.
पल्लवों और पाण्ड्यों ने कलभ्र काल समाप्त कियापुनर्निर्माण
सिंहविष्णु ने काँची के पल्लवों के लिए कावेरी प्रदेश लिया और कडुंगोन ने मदुरै में पाण्ड्य शासन फिर जमाया, जिससे तमिल भूमि में तीन सदियों का मन्दिर-निर्माण आरम्भ हुआ।
- 578 ई.
बादामी में मंगलेश की विष्णु गुफाधर्म
शक 500 की गुफा 3 में लाल बलुआ पत्थर में कटे शेष पर आसीन विष्णु, त्रिविक्रम और नरसिंह हैं, और छत पर मूल चित्रकारी के अंश बचे हैं।
- लगभग 600–630 ई.
महेन्द्रवर्मन प्रथम ने चट्टानों में मन्दिर काटेधर्म
मण्डगपट्टु में पल्लव राजा गर्व से लिखता है कि उसने ब्रह्मा, ईश्वर और विष्णु का मन्दिर बिना ईंट, लकड़ी, धातु और गारे के बनाया। उसने मत्तविलास प्रहसन भी रचा।
- 606 ई.
हर्ष थानेसर के सिंहासन परराजनीति
भाई की हत्या के बाद सोलह वर्ष के हर्षवर्धन राजा बने और आगे कन्नौज से शासन किया। हर्ष संवत् इसी वर्ष से गिना जाता है।
- लगभग 610 ई.
पुलकेशी द्वितीय दक्कन का स्वामीराजनीति
चाचा मंगलेश से गृहयुद्ध के बाद पुलकेशी द्वितीय चालुक्य सिंहासन पर बैठा और शीघ्र नर्मदा से कावेरी तक की भूमि का स्वामी बना।
- लगभग 618–619 ई.
नर्मदा पर हर्ष को रोका गयायुद्ध
ऐहोल अभिलेख कहता है कि पुलकेशी द्वितीय से युद्ध में जब हर्ष के हाथी गिरे तो उसका हर्ष पिघल गया। नर्मदा ही सीमा बनी रही।
- लगभग 7वीं शताब्दी ई.
बाणभट्ट ने हर्षचरित लिखासंस्कृति
हर्ष के दरबारी कवि ने अलंकृत संस्कृत गद्य में अपने राजा का चरित और कादम्बरी लिखी, जिसे उनके निधन के बाद पुत्र भूषणभट्ट ने पूरा किया।
- 628 ई.
ब्रह्मगुप्त ने शून्य के नियम दिएविज्ञान
राजस्थान के भिल्लमाल में उनके ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त ने शून्य और ऋण संख्याओं के साथ गणित के नियम रखे और द्विघात समीकरण हल किए।
- 629 ई.
भास्कर प्रथम की आर्यभटीय टीकाविज्ञान
उनकी टीका में पूरे समय दशमलव स्थानमान अंकन है, और उनकी महाभास्करीय एक सरल भिन्न देती है जो ज्या का आश्चर्यजनक रूप से सटीक मान निकालती है।
- लगभग 630–643 ई.
ह्वेनसांग नालन्दा मेंविश्व
चीनी यात्री ने लगभग पाँच वर्ष नालन्दा में आचार्य शीलभद्र के पास बिताए और पूरे देश की यात्रा की, सातवीं शताब्दी के भारत का सबसे पूरा वर्णन छोड़ा।
- 634 ई.
ऐहोल अभिलेख ने भारत युद्ध से वर्ष गिनेसंस्कृति
मेगुटी मन्दिर पर रविकीर्ति के श्लोक तिथि दो बार देते हैं: भारत युद्ध के 3,735 वर्ष बाद, और शक 556। वह कालिदास और भारवि को यशस्वी कवि कहता है।
- 642 ई.
नरसिंहवर्मन प्रथम ने वातापी जीतीयुद्ध
पुलकेशी द्वितीय के काँची-घेरे का बदला लेते हुए पल्लव राजा ने चालुक्य राजधानी पर धावा किया; पुलकेशी युद्ध में मारा गया। नरसिंहवर्मन ने वातापीकोण्ड की उपाधि ली।
- 643 ई.
कन्नौज और प्रयाग में हर्ष की सभाएँधर्म
ह्वेनसांग ने देखा कि हर्ष ने कन्नौज में बड़ा शास्त्रार्थ कराया और फिर प्रयाग संगम पर अपना कोष भिक्षुओं, ब्राह्मणों और निर्धनों में दान कर दिया, जैसा वह हर पाँच वर्ष करता था।
- लगभग 643 ई.
कामरूप के भास्करवर्मन ने ह्वेनसांग का आतिथ्य कियाराजनीति
हर्ष के मित्र, असम के राजा ने यात्री को प्राग्ज्योतिषपुर बुलाया और गंगा में बड़े नौ-बेड़े के साथ उसे हर्ष की सभा तक पहुँचाया।
- 647 ई.
हर्ष का निःसन्तान देहान्तराजनीति
उसका साम्राज्य तुरन्त बिखर गया। तांग दूत वांग ह्वेनत्से सिंहासन पर एक हड़पने वाले को पाकर तिब्बत और नेपाल से सेना जुटा लाया।
- लगभग 7वीं शताब्दी ई.
अप्पर और सम्बन्दर ने तेवारम गायाधर्म
नायनार मन्दिर-मन्दिर जाकर शिव के पद गाते रहे। पेरिय पुराणम् कहता है कि अप्पर ने राजा महेन्द्रवर्मन को जैन पथ से शिव की ओर लौटाया।
- लगभग 630–668 ई.
मामल्लपुरम के रथ और शिल्पसंस्कृति
नरसिंहवर्मन मामल्ल के नाम वाले बन्दरगाह में शिल्पियों ने एक-एक शिला से पंच रथ काटे और गंगावतरण का विशाल उभरा शिल्प उकेरा।
- 673–685 ई.
इत्सिंग नालन्दा मेंविश्व
श्रीविजय और ताम्रलिप्ति होते हुए समुद्री मार्ग से आए चीनी भिक्षु ने नालन्दा में लगभग दस वर्ष बिताए और वहाँ की दिनचर्या और शिक्षण लिखा।
- लगभग 700 ई.
राजसिंह ने तट मन्दिर और कैलासनाथ बनाएधर्म
नरसिंहवर्मन द्वितीय ने गढ़े पत्थर से निर्माण किया: मामल्लपुरम में समुद्र की ओर मुख वाला तट मन्दिर और काँची में छोटे देवालयों से घिरा कैलासनाथ।
- लगभग 724 ई.
ललितादित्य मुक्तापीड कश्मीर के शासकराजनीति
कल्हण इस कार्कोट राजा को दिग्विजयी बताता है; अधिक निश्चित यह है कि उसने कन्नौज के यशोवर्मन को हराया और परिहासपुर नगर बसाया।
- लगभग 8वीं शताब्दी ई.
भवभूति ने उत्तररामचरित लिखासंस्कृति
कन्नौज में यशोवर्मन के दरबार में भवभूति ने श्रीराम के उत्तर जीवन और सीता के वनवास पर नाटक लिखा, जो करुण रस के लिए प्रसिद्ध है।
- लगभग 740 ई.
पट्टदकल में रानी लोकमहादेवी का विरूपाक्षधर्म
अपने पति विक्रमादित्य द्वितीय की काँची में पल्लवों पर विजय की स्मृति में रानी ने शिव का लोकेश्वर मन्दिर बनवाया, जो अब विरूपाक्ष कहलाता है और पट्टदकल का सबसे भव्य मन्दिर है।
- लगभग 8वीं शताब्दी ई.
मार्तण्ड सूर्य मन्दिरधर्म
अनन्तनाग के ऊपर पठार पर ललितादित्य ने 84 नालीदार स्तम्भों की स्तम्भावली से घिरे प्रांगण के भीतर सूर्य का चूना-पत्थर का मन्दिर बनवाया।
- लगभग 750 ई.
बंगाल ने गोपाल को राजा चुनाराजनीति
खालिमपुर ताम्रपत्र कहता है कि मत्स्य-न्याय, जहाँ बड़ी मछली छोटी को निगलती है, समाप्त करने के लिए प्रजा ने गोपाल को राजा बनाया। यहीं से पाल वंश आरम्भ हुआ।
- लगभग 753 ई.
दन्तिदुर्ग ने राष्ट्रकूट साम्राज्य स्थापित कियाराजनीति
चालुक्यों के सामन्त दन्तिदुर्ग ने कीर्तिवर्मन द्वितीय को हराकर दक्कन लिया। उसके सामनगढ़ ताम्रपत्र इसे दर्ज करते हैं।
- लगभग 756–773 ई.
एलोरा का कैलास पहाड़ी से तराशा गयाधर्म
कृष्ण प्रथम के समय कारीगरों ने बेसाल्ट में ऊपर से नीचे काटते हुए शिव का पूरा रथाकार मन्दिर निकाला, जिसकी पीठ के चारों ओर आदमकद हाथी हैं।
- लगभग 8वीं शताब्दी ई.
काँची का वैकुण्ठ पेरुमालधर्म
नन्दिवर्मन द्वितीय पल्लवमल्ल ने तीन तलों वाला विष्णु मन्दिर बनवाया, जिसके प्राकार की दीवारों पर पल्लव राजाओं का इतिहास फलक-दर-फलक, नामों सहित, उकेरा है।
- आम्नाय मठ: 509–477 ई.पू. · प्रचलित गणना: 788–820 ई.
आदि शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किएधर्म
केरल के कालडी में जन्मे शंकर ने उपनिषद, गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे और भारत के चारों कोनों पर शृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिर्मठ में मठ स्थापित किए।
- लगभग 786–793 ई.
कन्नौज के लिए तीन साम्राज्यों का संघर्षयुद्ध
राष्ट्रकूट ध्रुव ने उत्तर की ओर कूच किया और गंगा–यमुना दोआब में प्रतिहार वत्सराज और पाल धर्मपाल दोनों को हराया। कन्नौज के लिए यह होड़ एक शताब्दी चली।
- लगभग 800 ई.
धर्मपाल ने विक्रमशिला और सोमपुर स्थापित किएसंस्कृति
पाल राजा ने भागलपुर में गंगा तट पर विक्रमशिला और पहाड़पुर में विशाल सोमपुर विहार बनवाए, विद्या के ऐसे केन्द्र जिनसे तिब्बत ने अपना बौद्ध धर्म सीखा।
- 814–878 ई.
मान्यखेट से अमोघवर्ष प्रथम का शासनराजनीति
चौंसठ वर्ष तक राष्ट्रकूट राजा ने शान्ति रखी, जैन आचार्यों और कन्नड़ साहित्य को संरक्षण दिया और मान्यखेट को राजधानी बनाया।
- लगभग 816 ई.
नागभट द्वितीय ने कन्नौज को प्रतिहार राजधानी बनायाराजनीति
उसने पालों के बिठाए चक्रायुध को निकाला और मुंगेर के पास धर्मपाल को हराया। कन्नौज दो शताब्दियों तक प्रतिहारों की राजधानी रहा।
- 825 ई.
केरल में कोल्लम संवत् का आरम्भसंस्कृति
मलयाली आज भी कोल्लम या मलयालम संवत् से तिथि देते हैं, जो इसी वर्ष से गिना जाता है; इसका नववर्ष चिंगम मास में पड़ता है।
- लगभग 836–885 ई.
मिहिर भोज, आदिवराहप्रतिरोध
प्रतिहार सम्राट के सिक्के उसे आदिवराह कहते हैं, पृथ्वी को उठाने वाले आदि वराह। उसने आधी शताब्दी तक सिन्ध के अरबों के विरुद्ध मोर्चा थामे रखा।
- 849 ई.
क्विलोन के तरिसापल्ली ताम्रपत्रसंस्कृति
चेर राजा स्थाणु रवि के शासन में वेणाड के राज्यपाल ने कोल्लम के एक गिरजाघर को भूमि और अधिकार दिए, जिस पर कई लिपियों में साक्षी हैं।
- लगभग 850 ई.
महावीराचार्य का गणितसारसंग्रहविज्ञान
अमोघवर्ष के दरबार में जैन गणितज्ञ ने अंकगणित, भिन्न, श्रेढ़ी और ज्यामिति की पूरी पाठ्यपुस्तक लिखी, जो सदियों तक दक्षिण में पढ़ाई गई।
- लगभग 850 ई.
कविराजमार्ग, कन्नड़ का पहला ग्रन्थसंस्कृति
अमोघवर्ष के दरबार से निकला यह काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ कन्नड़ प्रदेश को कावेरी से गोदावरी तक फैला बताता है।
- 851 ई.
व्यापारी सुलेमान का भारत-वर्णनविश्व
अरब व्यापारी ने बल्हरा, यानी राष्ट्रकूट राजा, को संसार के चार बड़े राजाओं में गिना, और जुज़्र के राजा, प्रतिहार, को मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु और सबसे अच्छी घुड़सेना वाला बताया।
- 855–883 ई.
अवन्तिवर्मन और सुय्य ने वितस्ता को साधाविज्ञान
कल्हण बताता है कि अभियन्ता सुय्य ने झेलम से चट्टानें हटाईं, दलदल सुखाए और नई नहरें काटीं, जिससे कश्मीर में धान का भाव बहुत गिर गया।
- लगभग 9वीं शताब्दी ई. का मध्य
सुमात्रा के राजा ने नालन्दा में विहार बनवायासंस्कृति
देवपाल का नालन्दा ताम्रपत्र दर्ज करता है कि सुवर्णद्वीप के शैलेन्द्र राजा बालपुत्रदेव ने वहाँ विहार बनवाया और पाल राजा ने उसके लिए पाँच गाँव दिए।
- 876 ई.
ग्वालियर में पत्थर पर शून्यविज्ञान
ग्वालियर दुर्ग के छोटे चतुर्भुज मन्दिर में विक्रम 933 का अभिलेख 270 हस्त की वाटिका और 50 मालाओं के दान का उल्लेख करता है, जिसमें शून्य छोटे वृत्त के रूप में लिखा है।
- लगभग 915–916 ई.
अल-मसूदी पश्चिमी भारत मेंविश्व
बग़दाद का इतिहासकार मुल्तान, मंसूरा और खम्भात से गुज़रा। उसने लिखा कि कन्नौज का प्रतिहार राजा चारों दिशाओं के लिए चार सेनाएँ रखता था, और सबसे मज़बूत अरबों के सामने थी।
- लगभग 916 ई.
इन्द्र तृतीय ने कन्नौज लूटायुद्ध
राष्ट्रकूट राजा ने यमुना पार कर प्रतिहार राजधानी ली और महीपाल को भगाया, यद्यपि प्रतिहार शीघ्र लौट आए।
- 941 ई.
आदिकवि पम्प ने दो महाकाव्य पूरे किएसंस्कृति
वेमुलवाड के एक सामन्त के दरबार में पम्प ने प्रथम तीर्थंकर पर आदिपुराण और कन्नड़ महाभारत विक्रमार्जुन विजय लिखे।
- 942 ई.
मूलराज ने गुजरात का चौलुक्य राज्य स्थापित कियाराजनीति
अणहिलपाटक (पाटन) से मूलराज ने सोलंकी वंश आरम्भ किया, जिसने आगे मोढेरा और रानी की वाव बनवाई।
- 954 ई.
खजुराहो का लक्ष्मण मन्दिरधर्म
चन्देल यशोवर्मन ने वैकुण्ठ विष्णु का मन्दिर बनवाया, जिसके अभिलेख में विक्रम 1011 है, खजुराहो के बड़े बलुआ पत्थर मन्दिरों में पहला।
- लगभग 10वीं शताब्दी ई.
भुवनेश्वर का मुक्तेश्वरधर्म
सोमवंशियों के समय बना नक्काशीदार तोरण वाला छोटा शिव मन्दिर परिपक्व कलिंग शैली का आरम्भ है।
- लगभग 950–1020 ई.
कश्मीर के अभिनवगुप्तधर्म
इस शैव आचार्य ने काश्मीर शैव दर्शन पर तन्त्रालोक और नाट्यशास्त्र पर अभिनवभारती लिखी, जिसने रस पर आगे के सारे चिन्तन को दिशा दी।
- 980–1003 ई.
रानी दिद्दा का कश्मीर पर शासनराजनीति
क्षेमगुप्त की विधवा, पुत्र और पौत्रों की संरक्षिका दिद्दा अन्त में अपने नाम से शासन करने लगी। कल्हण उसे लँगड़ी, चतुर और कठोर बताता है।
- लगभग 995 ई.
परमार मुंज तैलप का बन्दी होकर मारा गयायुद्ध
प्रबन्धचिन्तामणि कहता है कि मालवा के कवि-राजा ने चालुक्य तैलप को कई बार हराया; अन्तिम अभियान में गोदावरी पार करने पर वह पकड़ा गया और मारा गया।
08 · चोल और दक्षिण के समुद्रलगभग 850–1310 ई.
- लगभग 850 ई.
विजयालय ने तंजावूर लियाराजनीति
एक चोल सरदार ने मुत्तरैयरों से तंजावूर लिया और निशुम्भसूदिनी का मन्दिर बनवाया। साम्राज्यवादी चोल वंश यहीं से आरम्भ होता है।
- लगभग 879–885 ई.
श्रीपुरम्बियम का युद्धयुद्ध
कुम्भकोणम के पास पल्लव अपराजित ने गंग राजा और चोल आदित्य के साथ पाण्ड्य वरगुण द्वितीय को तोड़ा। इस जीत से चोलों का मार्ग खुला।
- लगभग 897 ई.
आदित्य प्रथम ने पल्लव शासन समाप्त कियाराजनीति
चोल राजा ने अपने पूर्व मित्र अपराजित पर आक्रमण किया और, चोल अभिलेखों के अनुसार, उसे हाथी पर ही मार गिराया और तोण्डैमण्डलम् ले लिया। चोल राज्य अब कावेरी से काँची तक था।
- लगभग 9वीं–10वीं शताब्दी ई. (श्रीवैष्णव परम्परा: 824–924)
नाथमुनि ने दिव्य प्रबन्धम् संकलित कियाधर्म
कुम्भकोणम में नम्मालवार के दस पद सुनकर नाथमुनि आलवार तिरुनगरी गए और आलवारों के चार हज़ार पद फिर से प्राप्त कर उन्हें संगीत में बाँधा।
- लगभग 910 ई.
परान्तक प्रथम ने मदुरै लीयुद्ध
चोल राजा ने पाण्ड्य और उसके लंकाई मित्रों को हराकर मदुरैकोण्ड की उपाधि ली। उसने चिदम्बरम् में नटराज के सभागार को सोने से मढ़ा।
- 919 और 921 ई.
उत्तरमेरूर ने चुनाव-नियम पत्थर पर लिखेराजनीति
परान्तक प्रथम के अभिलेख बताते हैं कि ग्राम-सभा कुडवोलै से चुनी जाती थी, नाम घड़े में डालकर एक बालक से निकलवाए जाते थे, और कौन खड़ा हो सकता था: विद्वान भूस्वामी, सत्तर से कम आयु, साफ़ हिसाब वाले।
- 949 ई.
तक्कोलम का युद्धयुद्ध
अरक्कोणम के पास राष्ट्रकूट कृष्ण तृतीय और गंग बुतुग द्वितीय ने चोलों को हराया; चोल युवराज राजादित्य हाथी पर ही मारा गया। चोलों ने एक पीढ़ी तक तोण्डैमण्डलम् खो दिया।
- 973 ई.
तैलप द्वितीय ने चालुक्य सत्ता लौटाईराजनीति
एक चालुक्य सामन्त ने अन्तिम राष्ट्रकूट कर्क द्वितीय को हटाकर कल्याणी के चालुक्यों की नींव रखी।
- 985 ई.
राजराज चोल प्रथम का राज्याभिषेकराजनीति
अरुलमोऴिवर्मन राजराज प्रथम के रूप में सिंहासन पर बैठे। उनके अभिलेख मेय्क्कीर्ति, यानी विजयों की सूची वाली निश्चित प्रस्तावना, से आरम्भ होते हैं, जिसे आगे के चोल राजाओं ने भी अपनाया।
- लगभग 993 ई.
राजराज के बेड़े ने उत्तरी लंका लीयुद्ध
चोल सेनाओं ने जलडमरूमध्य पार कर अनुराधापुर लिया और पोलोन्नरुवा को प्रान्तीय राजधानी बनाकर उसका नाम जननाथमंगलम् रखा।
- 1010 ई.
तंजावूर का बृहदीश्वर पूर्णधर्म
अपने शासन के पच्चीसवें वर्ष में राजराज प्रथम ने राजराजेश्वरम् के 66 मीटर ऊँचे विमान के लिए सोने से मढ़ा कलश दिया। इसकी दीवारें राजा के दान और सैकड़ों मन्दिर-सेवकों के नाम गिनाती हैं।
- 1014 ई.
राजेन्द्र चोल प्रथम सिंहासन परराजनीति
पहले से सह-शासक राजेन्द्र पिता के उत्तराधिकारी बने और चोल सेनाओं को लंका, गंगा और समुद्र-पार तक ले गए।
- लगभग 1017 ई.
पूरी लंका चोलों के अधीनयुद्ध
राजेन्द्र की सेना ने द्वीप का दक्षिण भी लिया और राजा महिन्द पंचम को लंका के राजमुकुट-रत्नों सहित बन्दी बनाकर चोल देश ले आई।
- 1017 ई. (श्रीवैष्णव परम्परा)
श्रीपेरुम्बुदूर में रामानुजाचार्य का जन्मधर्म
विशिष्टाद्वैत के आचार्य का जन्म काँची के पास हुआ। परम्परा उन्हें 120 वर्ष की आयु देती है, जिसका बड़ा भाग श्रीरंगम में बीता।
- लगभग 1019–1022 ई.
चोल सेना गंगा तक पहुँचीयुद्ध
राजेन्द्र के सेनापति कलिंग से होते हुए गए, बंगाल के महीपाल को हराया और घड़ों में गंगाजल दक्षिण लाए। राजा ने गंगैकोण्ड, गंगा को जीतने वाला, नाम लिया।
- लगभग 1025 ई.
राजेन्द्र के बेड़े का श्रीविजय पर प्रहारयुद्ध
चोल जहाज़ बंगाल की खाड़ी पार कर गए और श्रीविजय राजा के कडारम (केडाह) और अन्य बन्दरगाह ले लिए, राजा बन्दी हुआ, जैसा राजेन्द्र का तंजावूर अभिलेख बन्दरगाह-दर-बन्दरगाह गिनाता है।
- लगभग 1035 ई.
गंगैकोण्ड चोलपुरम्, नई राजधानीधर्म
राजेन्द्र ने नई राजधानी और तंजावूर की होड़ का विशाल शिव मन्दिर बनवाया, साथ में चोलगंगम सरोवर, जिसे ताम्रपत्र जल का विजय-स्तम्भ कहते हैं।
- लगभग 1050 का दशक ई.
नन्नय ने तेलुगु महाभारत आरम्भ कियासंस्कृति
राजमहेन्द्री में पूर्वी चालुक्य राजराज नरेन्द्र के दरबार में नन्नय ने आदि और सभा पर्व तथा अरण्य पर्व का कुछ अंश रचा, तेलुगु साहित्य का आरम्भ।
- 1054 ई.
कोप्पम का युद्धयुद्ध
तुंगभद्रा तट पर चोल राजाधिराज चालुक्य सोमेश्वर प्रथम से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। उसके भाई ने रणभूमि पर ही राजेन्द्र द्वितीय के रूप में मुकुट धारण किया और युद्ध जीता।
- 11वीं शताब्दी ई.
भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिरधर्म
भुवनेश्वर का सबसे ऊँचा मन्दिर बिन्दु सरोवर के पास उठा, जिसके देवता हरिहर, शिव और विष्णु एक रूप में, पूजे जाते हैं।
- 1070 ई.
कुलोत्तुंग प्रथम ने दो मुकुट जोड़ेराजनीति
चोल रक्त वाले पूर्वी चालुक्य राजकुमार ने चोल सिंहासन लिया और वेंगी तथा चोल देश को जोड़ा। उसके अभिलेख चुंगी समाप्त करने के लिए उसकी प्रशंसा करते हैं।
- 1076 ई.
विक्रमादित्य षष्ठ ने चालुक्य-विक्रम संवत् चलायाराजनीति
कल्याणी के चालुक्य राजा ने राज्यारोहण पर अपना संवत् चलाया। उसके कश्मीरी कवि बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित में उसका जीवन लिखा।
- 1077 ई.
72 सदस्यों का चोल दूतमण्डल चीन पहुँचाविश्व
सोंग दरबार के अभिलेख कुलोत्तुंग के चोल देश के दूतों का उल्लेख करते हैं जो काँच के पात्र, कपूर, हाथीदाँत और गैंडे का सींग लाए और बदले में ताँबे के सिक्के पाए।
- 11वीं शताब्दी का अन्त–12वीं का आरम्भ
विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा लिखीसंस्कृति
कल्याणी में याज्ञवल्क्य स्मृति पर उनकी टीका ने पारिवारिक सम्पत्ति और उत्तराधिकार के नियम रखे। भारत के अधिकांश भागों की अदालतें 20वीं शताब्दी तक इसे लागू करती रहीं।
- लगभग 1100 ई. (श्रीवैष्णव परम्परा)
मेलुकोटे में रामानुजधर्म
एक चोल राजा के विरोध के समय श्रीरंगम छोड़कर रामानुज लगभग बारह वर्ष होयसल देश में रहे, जहाँ राजा बिट्टिदेव विष्णुवर्धन बने और मेलुकोटे के चेलुवनारायण की पुनः प्रतिष्ठा हुई।
- 1117 ई.
बेलूर का चेन्नकेशवधर्म
तलकाड में चोलों को हराने के बाद विष्णुवर्धन ने बेलूर में सेलखड़ी का तारकाकार मन्दिर बनवाया, जिसकी नर्तकियों वाली मदनिकाएँ बारीकी से तराशी हैं।
- लगभग 1121 ई.
हलेबीडु का होयसलेश्वरधर्म
होयसल राजधानी द्वारसमुद्र में शिव का जुड़वाँ मन्दिर आरम्भ हुआ, जिसके चारों ओर पट्टिकाएँ हैं: हाथी, सिंह, घुड़सवार, फिर रामायण और महाभारत के दृश्य।
- 1129 ई.
सोमेश्वर तृतीय का मानसोल्लाससंस्कृति
चालुक्य राजा ने सौ अध्यायों में राजत्व का विश्वकोश संकलित किया, राजनीति और घोड़ों से लेकर पाकशास्त्र, संगीत, चित्रकला और खेलों तक।
- 12वीं शताब्दी ई.
पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का आरम्भधर्म
पूर्वी गंग राजा अनन्तवर्मन चोडगंग ने जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का वर्तमान मन्दिर आरम्भ किया; आगे अनंगभीम तृतीय ने राज्य को जगन्नाथ का घोषित किया।
- लगभग 1140 ई.
सेक्किऴार का पेरिय पुराणम्धर्म
कुलोत्तुंग द्वितीय के मन्त्री ने 63 नायनारों का जीवन तमिल पद्य में कहा; परम्परा कहती है कि इसका पहला गायन चिदम्बरम् के सभागार में हुआ।
- 1150 ई.
भास्कराचार्य का सिद्धान्त शिरोमणिविज्ञान
36 वर्ष की आयु में भास्कर द्वितीय ने अपना महान ग्रन्थ पूरा किया; इसका पहला भाग लीलावती अंकगणित को पद्य-पहेलियों में रखता है, और बीजगणित भाग चक्रवाल विधि सिखाता है।
- लगभग 1160 का दशक ई.
कल्याण में बसव का अनुभव मण्टपधर्म
परम्परा कहती है कि कलचुरि बिज्जल के मन्त्री बसवण्णा ने हर पृष्ठभूमि के शिवभक्तों को आध्यात्मिक चर्चा के मण्डप में जोड़ा; उनके वचन कन्नड़ गद्य-काव्य हैं जो आज भी गाए जाते हैं।
- 1163 ई.
हनमकोण्डा का सहस्र स्तम्भ मन्दिरधर्म
काकतीय रुद्रदेव ने शिव, विष्णु और सूर्य का तीन गर्भगृहों वाला मन्दिर बनवाया, स्तम्भयुक्त मण्डप और एकाश्म नन्दी सहित।
- लगभग 1160 का दशक ई.
दारासुरम का ऐरावतेश्वरधर्म
राजराज द्वितीय ने घोड़ों से खींचे जाते रथ के आकार का मन्दिर बनवाया, जिसकी सीढ़ियाँ संगीत के स्वर देती हैं और दीवारों पर नायनारों के जीवन उकेरे हैं।
- 12वीं शताब्दी ई. (प्रचलित गणना)
कम्बन का रामावतारम्धर्म
कम्बन ने वाल्मीकि रामायण को तमिल पद्य में कहा; परम्परा कहती है कि इसका पहला पाठ श्रीरंगम में भगवान रंगनाथ के सामने हुआ।
- 1187 ई.
भिल्लम पंचम ने देवगिरि बसायाराजनीति
सेउण यादव राजा ने देवगिरि, देवताओं की पहाड़ी, को राजधानी बनाया; चट्टान काटकर बनी इसकी रक्षा-व्यवस्था ने इसे दक्कन का सबसे मज़बूत दुर्ग बना दिया।
09 · लम्बा प्रतिरोध: सिन्ध से तराइन तक636–1206 ई.
- 636–637 ई.
तट पर पहला अरब धावा, ठाणे मेंयुद्ध
अल-बलाधुरी लिखता है कि ख़लीफ़ा उमर के समय ओमान से एक बेड़ा ठाणे पर भेजा गया, फिर भरूच और देबल पर धावे हुए। ख़लीफ़ा ने अपने सैनिकों के जोखिम को नापसन्द किया।
- 644 ई.
मकरान में रासिल का युद्धयुद्ध
एक अरब सेना ने मकरान तट के पास सिन्ध के राजा रासिल की सेना को हराया। ख़लीफ़ा उमर ने उन्हें सिन्धु पार आगे बढ़ने से रोक दिया।
- 662–670 के दशक ई.
किकान के पहाड़ी लोगों ने अरबों को खदेड़ाप्रतिरोध
अल-बलाधुरी लिखता है कि अल-क़ीक़ान, यानी बोलन दर्रे के प्रदेश, पर हमला करते हुए अरब सेनापति एक के बाद एक मारे गए; यह प्रदेश दशकों तक टिका रहा।
- 711–712 ई.
सिन्ध की रक्षा में राजा दाहिर का बलिदानप्रतिरोध
मुहम्मद बिन क़ासिम ने देबल बन्दरगाह लिया और सिन्धु पार की। दाहिर अपने युद्ध-हाथी पर राओर के पास उससे भिड़े और वीरगति पाई; उनके बाद अरोड़ और ब्राह्मणाबाद गिरे।
- 712 ई.
राओर दुर्ग में जौहरप्रतिरोध
चचनामा कहता है कि दाहिर की रानी और दुर्ग की स्त्रियों ने बन्दी बनने के बजाय आग जलाकर स्वयं को भस्म कर दिया। यह अभिलिखित सबसे पुराना जौहर है।
- लगभग 734 ई. (मेवाड़ परम्परा)
बप्पा रावल ने चित्तौड़ लियाराजनीति
एकलिंगजी में हारीत ऋषि के शिष्य गुहिल राजकुमार ने मोरी शासकों से चित्तौड़ जीता। मेवाड़ के राजा तब से एकलिंगजी, स्वयं शिव, के दीवान बनकर राज करते रहे।
- लगभग 725–738 ई.
राजस्थान और गुजरात में अरब सेनाएँ टूटींप्रतिरोध
सिन्ध से अरब धावे उज्जैन और भरूच तक पहुँचे। प्रतिहार नागभट प्रथम ने उन्हें मालवा से खदेड़ा और पश्चिम के राजपूत कुल डटे रहे। अगली तीन शताब्दियों तक अरब शासन सिन्ध और मुल्तान में ही सिमटा रहा।
- 739 ई.
नवसारी: चालुक्य राजकुमार ने ताजिकों को हरायाप्रतिरोध
अवनिजनाश्रय पुलकेशी के नवसारी ताम्रपत्र कहते हैं कि ताजिकों ने सिन्ध, कच्छ, सौराष्ट्र और गुर्जरों को रौंद दिया था, तब उसने उन्हें हराया; चालुक्य राजा ने उसे दक्षिणापथ-साधार की उपाधि दी।
- लगभग 986–991 ई.
लमग़ान में जयपाल का सुबुक्तगीन से युद्धप्रतिरोध
हिन्दूशाही राजा ने ग़ज़नी के विरुद्ध बड़ी सेना उतारी; फ़िरिश्ता कहता है कि दिल्ली, अजमेर, कालिंजर और कन्नौज के राजाओं ने सैनिक भेजे। वह हारा और सिन्धु के पश्चिम की भूमि खो बैठा।
- 27 नवम्बर 1001 ई.
पेशावर के पास महमूद से जयपाल की हारप्रतिरोध
अल-उत्बी लिखता है कि हिन्दूशाही राजा हारा और पुत्रों सहित बन्दी हुआ। छूटने पर उसने सिंहासन आनन्दपाल को सौंपा और स्वयं को चिता की अग्नि को अर्पित कर दिया।
- 1008 ई.
वैहिन्द में आनन्दपाल का मोर्चाप्रतिरोध
आनन्दपाल ने सिन्धु के पास महमूद के विरुद्ध मित्र राजाओं को जुटाया; फ़िरिश्ता बताता है कि खोखर योद्धा ग़ज़नवी शिविर में घुस गए थे, फिर शाही हाथी के बिदकने से दिन हाथ से निकल गया।
- 1009 ई.
नगरकोट मन्दिर की लूटयुद्ध
महमूद ने काँगड़ा दुर्ग लिया और मन्दिर से सदियों से चढ़ाए गए धन को उतार लिया, जिसकी सूची अल-उत्बी आश्चर्य से देता है।
- लगभग 1010–1055 ई.
धारा से राजा भोज का मालवा पर शासनसंस्कृति
परमार राजा ने समरांगण सूत्रधार में वास्तु पर लिखा, धार में सरस्वती सदन स्थापित किया और भोजपुर का विशाल, अधूरा शिव मन्दिर आरम्भ किया।
- 1014 ई.
थानेसर लूटा गया, चक्रस्वामी ले जाए गएयुद्ध
महमूद ने थानेसर पर धावा किया। अल-बिरूनी लिखता है कि चक्रस्वामी कहलाने वाली विष्णु की काँस्य प्रतिमा ग़ज़नी ले जाकर घुड़दौड़ के मैदान में फेंक दी गई।
- 1015 और 1021 ई.
लोहकोट अडिग, कश्मीर में महमूद विफलप्रतिरोध
महमूद ने कश्मीर के मार्ग पर लोहकोट के पहाड़ी दुर्ग को दो बार घेरा और दो बार लौटा, बर्फ़ और रक्षकों से हारकर। कश्मीर उससे बचा रहा।
- 1018 ई.
मथुरा के मन्दिर ध्वस्तयुद्ध
अल-उत्बी लिखता है कि महमूद ने माना कि मथुरा का महान मन्दिर 200 वर्षों में भी फिर नहीं बन सकता, फिर नगर के मन्दिर जलवाए और मूर्तियाँ तुड़वाईं या उठवा लीं।
- दिसम्बर 1018 ई.
कन्नौज बिना युद्ध गिरायुद्ध
प्रतिहार राज्यपाल राजधानी छोड़कर भाग गया और महमूद ने उसके सात दुर्ग ले लिए। इसी कारण चन्देल विद्याधर ने राज्यपाल का पीछा करवाकर उसे मरवा दिया।
- 1019–1022 ई.
विद्याधर ने महमूद का सामना कियाप्रतिरोध
महमूद दो बार चन्देल राजा के विरुद्ध आया। 1019 में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हुईं और विद्याधर रात में हट गया; 1022 में महमूद ने कालिंजर घेरा और सन्धि करके लौट गया।
- जनवरी 1026 ई.
महमूद ने सोमनाथ लूटायुद्ध
थार पार करके महमूद ने सोमनाथ पर धावा किया। इब्न अल-असीर लिखता है कि लगभग 50,000 रक्षक मारे गए; ज्योतिर्लिंग तोड़ा गया और उसके टुकड़े ग़ज़नी ले जाए गए।
- 1026 ई. के बाद
भीम प्रथम ने सोमनाथ फिर बनवायापुनर्निर्माण
महमूद के आगे हटे गुजरात के चौलुक्य राजा ने लौटकर मन्दिर को फिर पत्थर से खड़ा किया; पूजा फिर आरम्भ हुई।
- 1026 ई.
हिन्दूशाही वंश का अन्तप्रतिरोध
भीमपाल की मृत्यु के साथ वह वंश समाप्त हुआ जिसने दो शताब्दियों तक उत्तर-पश्चिमी द्वार की रक्षा की थी। अल-बिरूनी ने उनके उदात्त आचरण की प्रशंसा की।
- 1026–27 ई.
मोढेरा का सूर्य मन्दिरधर्म
भीम प्रथम के शासन में मोढेरा का सूर्य मन्दिर बना, विक्रम 1083 का, साथ में 108 छोटे देवालयों वाला सीढ़ीदार सूर्यकुण्ड।
- लगभग 1030 ई.
अल-बिरूनी ने भारत पर ग्रन्थ लिखाविश्व
महमूद के साथ पूर्व आए इस विद्वान ने संस्कृत सीखी और हिन्दू ज्योतिष, दर्शन और पर्वों का ध्यान से वर्णन किया। उसने साफ़ लिखा कि महमूद ने देश की समृद्धि नष्ट कर दी।
- लगभग 1030 ई.
खजुराहो का कन्दरिया महादेवधर्म
विद्याधर से जोड़ा जाने वाला खजुराहो का सबसे ऊँचा मन्दिर कैलास की चोटियों जैसे गुच्छेदार शिखरों में उठता है, जिसमें 800 से अधिक उकेरी आकृतियाँ हैं।
- 1031 ई.
आबू पर विमल वसहीधर्म
भीम प्रथम के मन्त्री विमलशाह ने आदिनाथ को समर्पित दिलवाड़ा का पहला जैन मन्दिर बनवाया, जिसके संगमरमर के गुम्बद इतने बारीक तराशे हैं कि चमकते हैं।
- 1033 ई. (मिरात-ए-मसूदी के अनुसार)
बहराइच में सुहेलदेव ने सालार मसूद को हरायाप्रतिरोध
17वीं शताब्दी का एक फ़ारसी वृत्तान्त बताता है कि महमूद का सम्बन्धी सालार मसूद बहराइच में सुहेलदेव के नेतृत्व वाले स्थानीय राजाओं के संघ के हाथों सेना सहित मारा गया।
- 1043 ई.
दिल्ली के राजा ने हाँसी, थानेसर और नगरकोट वापस लिएपुनर्निर्माण
फ़िरिश्ता लिखता है कि दिल्ली के राजा ने अन्य राजाओं के साथ हाँसी, थानेसर और नगरकोट से ग़ज़नवी चौकियाँ निकाल दीं और नगरकोट मन्दिर में नई प्रतिमा प्रतिष्ठित की।
- लगभग 1063 ई. से
पाटन में रानी उदयमती की बावड़ीसंस्कृति
भीम प्रथम की स्मृति में उनकी रानी ने रानी की वाव बनवाई, सात तल नीचे जल तक, दीवारों पर विष्णु के अवतार। सरस्वती की गाद में दबी इस बावड़ी को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में निकाला।
- लगभग 1090 ई.
चन्द्रदेव ने तीर्थों की रक्षा कीप्रतिरोध
गहड़वाल वंश के संस्थापक ने कन्नौज लिया; उसके ताम्रपत्र कहते हैं कि उसने काशी, कुशिक, उत्तर कोसल और इन्द्रस्थान के तीर्थों की रक्षा की। उसके वंश के दानपत्रों में तुरुष्कदण्ड नामक कर का भी उल्लेख है।
- 1094–1143 ई.
सिद्धराज जयसिंह का गुजरात पर शासनराजनीति
चौलुक्य राजा ने मालवा लिया, पाटन में सहस्रलिंग सरोवर और सिद्धपुर में रुद्रमहालय बनवाया, और हेमचन्द्र को अपने दरबार में रखा।
- लगभग 1135 ई.
अर्णोराज ने तुर्कों को हराकर आनासागर बनवायाप्रतिरोध
पृथ्वीराज विजय कहता है कि चाहमान राजा ने अजमेर के सामने तुर्क सेना को हराया और उनके रक्त से सनी भूमि को धोने के लिए आनासागर झील खुदवाई।
- लगभग 1140 ई.
हेमचन्द्र का व्याकरण हाथी परसंस्कृति
सिद्धराज के लिए जैन विद्वान ने सिद्ध-हेम शब्दानुशासन लिखा; प्रबन्ध ग्रन्थ कहते हैं कि राजा ने उसे हाथी पर रखकर पाटन में घुमाया।
- 1143 ई.
कुमारपाल गुजरात के सिंहासन परराजनीति
हेमचन्द्र के मार्गदर्शन में चौलुक्य राजा ने अपने राज्य में पशुवध रोका, साथ ही शिव मन्दिरों को संरक्षण देता रहा।
- 1148–49 ई.
कल्हण ने राजतरंगिणी लिखीसंस्कृति
कश्मीरी कवि ने लगभग 8,000 श्लोकों में कश्मीर के राजाओं का इतिहास कहा, पहले उनके अभिलेख, दानपत्र और पुराने वृत्त पढ़कर।
- 1164 ई.
दिल्ली–टोपरा स्तम्भ पर विग्रहराज चतुर्थ का अभिलेखप्रतिरोध
तोमरों से दिल्ली लेने के बाद चाहमान राजा ने अशोक के लेख के नीचे अपना अभिलेख जोड़ा: उसने हिमालय से विन्ध्य तक भूमि को म्लेच्छों से मुक्त कर आर्यावर्त को फिर से सार्थक किया।
- 1169 ई.
कुमारपाल ने सोमनाथ का पुनर्निर्माण कियापुनर्निर्माण
प्रभास पाटन का भाव बृहस्पति अभिलेख दर्ज करता है कि पाशुपत आचार्य भाव बृहस्पति के आग्रह पर कुमारपाल ने मन्दिर फिर से खड़ा किया।
- 1175 ई.
ग़ोर के मुहम्मद ने मुल्तान लियायुद्ध
ग़ोर के मुइज़्ज़ुद्दीन ने सिन्धु पर मुल्तान और उच्छ लेकर अपने भारतीय अभियान आरम्भ किए।
- 1177 ई.
पृथ्वीराज चौहान अजमेर के राजा बनेराजनीति
बालक राजा पिता सोमेश्वर के उत्तराधिकारी बने, माता कर्पूरदेवी संरक्षिका थीं; कुछ वर्षों में वे अजमेर और दिल्ली से स्वयं शासन करने लगे।
- 1178 ई.
कासह्रद में नायकी देवी ने ग़ोरी को हरायाप्रतिरोध
आबू पर्वत की तलहटी में राजमाता नायकी देवी ने अपने बालक पुत्र मूलराज द्वितीय की ओर से चौलुक्य सेना का नेतृत्व कर ग़ोर के मुहम्मद को हराया, जो रेगिस्तान पार भाग गया।
- 1182 ई.
पृथ्वीराज का चन्देल प्रदेश पर धावायुद्ध
मदनपुर के अभिलेख दर्ज करते हैं कि पृथ्वीराज ने चन्देल परमर्दी के राज्य जेजाकभुक्ति को उजाड़ा, जिसके सेनापति आल्हा और ऊदल आल्ह-खण्ड में आज भी जीवित हैं।
- 12वीं शताब्दी ई.
जयदेव का गीतगोविन्दधर्म
जयदेव के राधा-कृष्ण के गीत, हर एक किसी राग में बँधा, पुरी में भगवान जगन्नाथ के सामने प्रतिदिन रात्रि में गाए जाते हैं।
- 1186 ई.
ग़ोरी ने लाहौर लियायुद्ध
अन्तिम ग़ज़नवी ख़ुसरो मलिक ने लाहौर सौंप दिया। ग़ोरी अब चाहमान प्रदेश की सीमा पर खड़ा था।
- 1191 ई.
तराइन का पहला युद्ध: ग़ोरी पराजितप्रतिरोध
थानेसर के पास पृथ्वीराज की सेना ने ग़ोरी सेना के पंख तोड़ दिए; दिल्ली के गोविन्दराज ने ग़ोर के मुहम्मद को घायल किया, जिसे मैदान से उठाकर ले जाना पड़ा।
- 1192 ई.
तराइन का दूसरा युद्ध: पृथ्वीराज का पतनयुद्ध
ग़ोरी घुड़सवार तीरन्दाज़ों के साथ लौटा, जिन्होंने झूठे पीछे हटने की चालों से राजपूत पंक्ति को थका दिया। पृथ्वीराज बन्दी बनाए गए और मार दिए गए; गोविन्दराज रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।
- 1193 ई. से
दिल्ली हाथ से गई, 27 मन्दिरों से मस्जिदयुद्ध
क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली ली। क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के पूर्वी द्वार पर अभिलेख कहता है कि यह 27 मन्दिरों की सामग्री से बनी; उनके नक्काशीदार स्तम्भ आज भी भीतर खड़े हैं।
- लगभग 1193–1203 ई.
ओदन्तपुरी, नालन्दा और विक्रमशिला उजाड़े गएयुद्ध
मिनहाज-उस-सिराज बताता है कि बख़्तियार ख़लजी ने बिहार में एक परकोटे वाले ‘दुर्ग’ पर धावा किया, उसके मुण्डित-सिर निवासियों को मारा और फिर पाया कि वह ग्रन्थों से भरा विद्यालय था। मगध के महाविहार फिर नहीं उबरे।
- 1194 ई.
चन्दावर में जयचन्द्र का पतनयुद्ध
कन्नौज और काशी के गहड़वाल राजा को इटावा के पास हाथी पर ही तीर लगा और वे मारे गए, और उनकी सेना बिखर गई।
- 1194 ई.
काशी के मन्दिर ध्वस्तयुद्ध
हसन निज़ामी का ताज-उल-मआसिर लिखता है कि बनारस में लगभग एक हज़ार मन्दिर तोड़े गए और उनकी नींवों पर मस्जिदें उठाई गईं। अगले दशकों में काशी ने अपने देवालय फिर बनाए।
- लगभग 1194–95 ई.
अजमेर में हरिराज का अन्तिम मोर्चाप्रतिरोध
पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने ग़ोरी शासन के विरुद्ध विद्रोह किया और कठपुतली शासक को निकाल दिया। ऐबक से हारकर उन्होंने परिवार सहित समर्पण के बजाय अग्नि में प्रवेश किया।
- 1196 ई.
लम्बे घेरे के बाद ग्वालियर का समर्पणप्रतिरोध
परिहार शासक सल्लक्षणपाल ने ग़ोरी और ऐबक से सन्धि होने तक ग्वालियर दुर्ग को थामे रखा।
- 1197 ई.
अणहिलपाटक की लूटयुद्ध
ऐबक ने कासह्रद का बदला लेते हुए आबू के पास चौलुक्य सेना को हराया और गुजरात की राजधानी लूटी; चौलुक्यों ने कुछ ही वर्षों में उसे वापस ले लिया।
- 1199 ई.
अजमेर का संस्कृत महाविद्यालय मस्जिद बनायुद्ध
जिस भवन में विग्रहराज चतुर्थ ने अपना हरकेलि नाटक शिलाफलकों पर खुदवाया था, वह अढ़ाई दिन का झोंपड़ा बना; वे शिलाफलक बाद में इसकी दीवारों में मिले।
- 1202 ई.
परमर्दी के बाद कालिंजर का पतनप्रतिरोध
ऐबक के घेरे के बीच चन्देल परमर्दी का निधन हुआ; उसका मन्त्री अजयदेव दुर्ग का पानी सूखने तक लड़ता रहा।
- लगभग 1203–1205 ई.
बख़्तियार का नदिया पर अचानक धावायुद्ध
घोड़ों के व्यापारी बनकर कुछ घुड़सवारों के साथ सेना से आगे निकलकर बख़्तियार लक्ष्मणसेन के महल में घुस आया। वृद्ध राजा पूर्वी बंगाल निकल गए, जहाँ उनके पुत्र राज करते रहे।
- 1204–05 ई.
पंजाब में खोखरों का विद्रोहप्रतिरोध
मध्य एशिया में ग़ोरी के हारने की ख़बर सुनकर नमक पर्वतमाला के खोखर कुलों ने लाहौर का मार्ग काट दिया। ग़ोरी को उन्हें दबाने स्वयं लौटना पड़ा।
- चैत्र, शक 1127 (1206 ई.)
कामरूप ने बख़्तियार की सेना नष्ट कीप्रतिरोध
बख़्तियार कामरूप होते हुए तिब्बत की ओर बढ़ा। गुवाहाटी के पास कानाई बरशी का शिलालेख दर्ज करता है कि आए हुए तुर्क नष्ट हो गए; मिनहाज कहता है कि उसके दस हज़ार घुड़सवारों में से मुश्किल से सौ लौटे।
- 15 मार्च 1206 ई.
धमियक में ग़ोर का मुहम्मद मारा गयाप्रतिरोध
खोखर अभियान से लौटते हुए झेलम तट पर उसके तम्बू में उसे छुरा मारा गया; अधिकांश वृत्तान्त खोखरों को, कुछ इस्माइली हत्यारों को दोष देते हैं।
10 · सल्तनतें, विजयनगर और वे राज्य जो खड़े रहे1206–1526 ई.
- 1206 ई.
कामरूप ने बख़्तियार ख़िलजी की सेना नष्ट कीप्रतिरोध
बख़्तियार ख़िलजी कामरूप होकर तिब्बत की ओर बढ़ा; लौटते समय उसकी सेना कट गई और कुछ सौ सैनिक ही देवकोट पहुँच सके। गुवाहाटी के पास कानाई-बरशी-बोवा का शिलालेख कहता है कि शक 1127 में कामरूप आए तुरुष्क नष्ट हो गए।
- 15 मार्च 1206
धमियक में मुहम्मद गोरी मारा गयायुद्ध
नमक पर्वतमाला के खोखरों पर चढ़ाई से लौटते हुए गोरी सुल्तान झेलम के किनारे धमियक के अपने डेरे में मारा गया; फ़ारसी इतिहासकार इसका दोष खोखर योद्धाओं या इस्माइली हत्यारों पर डालते हैं। उसके दास-सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने लाहौर में सत्ता सँभाली।
- 1210 ई.
ऐबक की मृत्यु, इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तानराजनीति
चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर कुतुबुद्दीन ऐबक की लाहौर में मृत्यु हुई। उसके दामाद और बदायूँ के सूबेदार इल्तुतमिश ने दिल्ली का तख़्त ले लिया।
- 1213 ई.
पालमपेट में रामप्पा मंदिर की प्रतिष्ठासंस्कृति
काकतीय राजा गणपतिदेव के सेनापति रेचर्ल रुद्र ने वारंगल के पास पालमपेट में रुद्रेश्वर मंदिर की प्रतिष्ठा की। लोग आज भी इसे इसके शिल्पी के नाम पर रामप्पा कहते हैं; इसकी पानी पर तैरने वाली ईंटें और नृत्य करती मूर्तियाँ प्रसिद्ध हैं।
- 1228 ई.
सुकाफा ने अहोम राज्य की नींव रखीराजनीति
सुकाफा अपने अनुयायियों के साथ शान प्रदेश से पटकाई पहाड़ियाँ पार कर ब्रह्मपुत्र घाटी में आया। उसका स्थापित राज्य छह शताब्दियों तक असम पर राज करेगा और अपने इतिहास-ग्रन्थ, बुरंजी, स्वयं लिखेगा।
- 1230 ई.
आबू पर्वत के दिलवाड़ा में लूण वसहीसंस्कृति
गुजरात के मंत्री भाई वस्तुपाल और तेजपाल ने दिलवाड़ा में नेमिनाथ का लूण वसही जैन मंदिर बनवाया। इसकी संगमरमर की छतें इतनी महीन तराशी गई हैं कि उनसे प्रकाश छनकर आता है।
- 1234–35 ई.
इल्तुतमिश ने उज्जैन और महाकाल मंदिर को लूटायुद्ध
इल्तुतमिश ने मालवा पर चढ़ाई कर विदिशा और उज्जैन ले लिए। मिनहाज-उस-सिराज की तबक़ात-ए-नासिरी लिखती है कि उज्जैन का महाकाल मंदिर तोड़ा गया और उसकी मूर्तियाँ दिल्ली ले जाई गईं।
- 1238 ई. (प्रचलित गणना)
उडुपी के पास पाजक में मध्वाचार्य का जन्मधर्म
उडुपी के पास पाजक गाँव में वासुदेव का जन्म हुआ, जो आगे मध्वाचार्य कहलाए। उन्होंने द्वैत वेदान्त का उपदेश दिया और उडुपी में बालकृष्ण की मूर्ति स्थापित की।
- 1244 ई.
नरसिंहदेव प्रथम ने युद्ध बंगाल तक पहुँचायाप्रतिरोध
ओडिशा के पूर्वी गंग राजा ने कटासिन में तुग़रल तुग़ान ख़ाँ को पीछे धकेला और फिर बंगाल में सल्तनत की राजधानी लखनौती को घेर लिया। वहाँ मौजूद मिनहाज-उस-सिराज ने ओड़िया सेना की इस बढ़त को लिखा है।
- लगभग 1250 ई.
नरसिंहदेव प्रथम ने कोणार्क सूर्य मंदिर बनवायासंस्कृति
कोणार्क के तट पर पूर्वी गंग राजा ने सूर्यदेव का मंदिर एक पत्थर के रथ के रूप में बनवाया, जिसमें चौबीस नक़्क़ाशीदार पहिए और सात घोड़े हैं। इसके पहिए आज भी धूपघड़ी का काम करते हैं।
- लगभग 1262 ई.
रुद्रमा देवी काकतीय सिंहासन परराजनीति
गणपतिदेव की पुत्री रुद्रमा देवी ने वारंगल में काकतीय सिंहासन सँभाला और अपने नाम से राज किया। उन्होंने सेउण यादवों को पीछे धकेला और लगभग पच्चीस वर्ष राज्य को एक रखा।
- 1268 ई.
सोमनाथपुर के चेन्नकेशव मंदिर की प्रतिष्ठासंस्कृति
होयसल राजा नरसिंह तृतीय के सेनापति सोमनाथ ने कावेरी के पास सोमनाथपुर में तारे के आकार वाले केशव मंदिर की प्रतिष्ठा की। यह आज खड़ा सबसे पूर्ण होयसल मंदिर है।
- 1270 ई. (परम्परागत)
नरसी में संत नामदेव का जन्मधर्म
वारकरी परम्परा के संत नामदेव का जन्म मराठवाड़ा के नरसी गाँव में हुआ। पंढरपुर के विट्ठल पर उनके अभंग महाराष्ट्र में गाए जाते हैं और उनके इकसठ पद गुरु ग्रन्थ साहिब में हैं।
- 1289 ई.
रुद्रमा देवी का निधन, प्रतापरुद्र उत्तराधिकारीराजनीति
चंदुपटला शिलालेख 1289 में रुद्रमा देवी के निधन का उल्लेख करता है, सम्भवतः विद्रोही सामन्त अम्बदेव से युद्ध में। उनके दौहित्र प्रतापरुद्र अंतिम महान काकतीय राजा बने।
- 1290 ई.
नेवासा में ज्ञानेश्वरी पूर्णधर्म
प्रवरा तट के नेवासा में युवा ज्ञानेश्वर ने शक 1212 में भगवद्गीता पर अपनी मराठी टीका पूरी की। ज्ञानेश्वरी ने गीता को हर मराठी घर तक पहुँचा दिया।
- 1296 ई.
आलंदी में ज्ञानेश्वर की संजीवन समाधिधर्म
इक्कीस वर्ष की आयु में संत ज्ञानेश्वर ने इन्द्रायणी तट के आलंदी में संजीवन समाधि ली। हर वर्ष पंढरपुर की वारकरी पालकी उनकी समाधि से ही निकलती है।
- 1296 ई.
अलाउद्दीन ख़िलजी का देवगिरि पर धावायुद्ध
कड़ा के सूबेदार अलाउद्दीन ने सेउण यादव राजा रामचन्द्र की राजधानी देवगिरि पर अचानक धावा बोला और भारी धन वसूला। इसी धन से उसने उसी वर्ष दिल्ली का तख़्त हथियाया।
- 1299 ई.
अलाउद्दीन के सेनापतियों ने सोमनाथ लूटायुद्ध
उलुग़ ख़ाँ और नुसरत ख़ाँ ने गुजरात रौंदा; वाघेला राजा कर्ण भाग गया और सोमनाथ मंदिर लूटा गया, उसका लिंग दिल्ली ले जाया गया। अमीर ख़ुसरो ने ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह में इसका वर्णन किया है।
- 1301 ई.
रणथम्भौर का पतन, हम्मीर देव वीरगति को प्राप्तप्रतिरोध
लम्बे घेरे के बाद रणथम्भौर अलाउद्दीन ख़िलजी के हाथ आया। शरण में आए मंगोलों को सौंपने से इनकार करने वाले हम्मीर देव चौहान तलवार हाथ में लिए वीरगति को प्राप्त हुए और दुर्ग की स्त्रियों ने जौहर किया। नयचन्द्र सूरि का हम्मीर महाकाव्य उनकी कथा कहता है।
- 26 अगस्त 1303
चित्तौड़गढ़ अलाउद्दीन ख़िलजी के हाथप्रतिरोध
लगभग आठ महीने के घेरे के बाद चित्तौड़ गिरा। सुल्तान के डेरे में मौजूद अमीर ख़ुसरो तिथि देता है और लिखता है कि लगभग 30,000 लोग मारे गए; रावल रतन सिंह खेत रहे और जायसी का पद्मावत (1540) रानी पद्मिनी के जौहर की स्मृति सँजोता है।
- 1310 ई.
मलिक काफ़ूर का वारंगल पर घेरायुद्ध
अलाउद्दीन के सेनापति मलिक काफ़ूर ने काकतीय राजधानी को घेरा। प्रतापरुद्र ने हाथी, घोड़े और ख़ज़ाना देकर और दिल्ली को वार्षिक कर देने का वचन देकर अपना राज्य बचाया।
- 1311 ई.
मलिक काफ़ूर का द्वारसमुद्र और मदुरै पर धावायुद्ध
काफ़ूर ने द्वारसमुद्र में होयसल राजा बल्लाल तृतीय को झुकाया और पाण्ड्य प्रदेश में मदुरै तक घुस आया। अमीर ख़ुसरो ‘ब्रमस्तपुरी’ के एक स्वर्ण मंदिर की लूट लिखता है, जिसे प्रायः चिदम्बरम माना जाता है।
- 1311 ई.
जालोर का पतन, कान्हड़देव वीरगति को प्राप्तप्रतिरोध
सोमनाथ से लौटती सेना को सताने वाले जालोर के चौहान राजा कान्हड़देव घेरे गए और अपने पुत्र वीरमदे के साथ मारे गए। पद्मनाभ का कान्हड़दे प्रबन्ध (1455) उनके संघर्ष की कथा कहता है।
- 1318 ई.
देवगिरि का विलय, अंतिम सेउण यादव मारा गयायुद्ध
दिल्ली के विरुद्ध उठे हरपालदेव को मुबारक शाह ख़िलजी ने हराकर मरवा दिया। देवगिरि का सेउण यादव राज्य समाप्त हुआ।
- लगभग 1320 ई.
कश्मीर की शैव संत-कवयित्री लल्लेश्वरीधर्म
श्रीनगर के पास लल्लेश्वरी, लल द्यद, का जन्म हुआ। शिव पर उनके कश्मीरी वाख आज भी हर पंथ के कश्मीरियों की ज़ुबान पर हैं।
- 1323 ई.
वारंगल का पतन, काकतीय राज्य का अंतयुद्ध
भावी मुहम्मद बिन तुग़लक़, उलुग़ ख़ाँ ने दूसरे प्रयास में वारंगल लिया और उसका नाम सुल्तानपुर रखा। प्रतापरुद्र को बंदी बनाकर दिल्ली ले जाया गया; तेलुगु अभिलेख कहते हैं कि उन्होंने नर्मदा के तट पर प्राण त्याग दिए।
- लगभग 1323 ई.
श्रीरंगम के नम्पेरुमाल को सुरक्षित ले जाया गयाप्रतिरोध
दिल्ली की सेना के श्रीरंगम पहुँचने पर पिल्लै लोकाचार्य रंगनाथ की उत्सव-मूर्ति को मंदिर से निकाल ले गए; मूर्ति लगभग पचास वर्ष भटकती रही। मंदिर का इतिवृत्त कोयिल ओलुगु कहता है कि लगभग 12,000 श्रीवैष्णवों ने मंदिर की रक्षा में प्राण दिए।
- लगभग 1326 ई.
राणा हम्मीर ने चित्तौड़ वापस लियाप्रतिरोध
सिसोदिया शाखा के हम्मीर ने दिल्ली के छोड़े सूबेदारों से चित्तौड़गढ़ वापस लिया और राणा की उपाधि धारण की। मेवाड़ के बाद के सभी महाराणा उन्हीं के वंशज हैं।
- 1327 ई.
मुहम्मद बिन तुग़लक़ की राजधानी दौलताबादराजनीति
दक्षिण पर राज करने के लिए सुल्तान ने दिल्ली के लोगों को देवगिरि, जिसका नाम दौलताबाद रखा गया, जाने का आदेश दिया। इस कूच में बहुत लोग मरे और कुछ वर्षों में दरबार उत्तर लौट आया।
- लगभग 1336 ई.
मुसुनूरी नायकों ने वारंगल मुक्त करायाप्रतिरोध
मुसुनूरी कुल के कापय नायक ने तेलुगु सामन्तों के संघ के साथ तुग़लक़ सूबेदार को वारंगल से निकाल दिया। अनितल्ली का कलुवचेरु दानपत्र देश को फिर से बसाने के लिए नायकों की प्रशंसा करता है।
- 18 अप्रैल 1336
तुंगभद्रा तट पर विजयनगर की स्थापनाराजनीति
संगम के पुत्र हरिहर और बुक्क ने शृंगेरी के विद्यारण्य के आशीर्वाद से तुंगभद्रा के दक्षिणी तट पर विजयनगर बसाया। परम्परा 18 अप्रैल 1336 की तिथि देती है; यह साम्राज्य दो सौ वर्ष से अधिक दक्षिण का रक्षक रहा।
- 1339 ई.
कोटा रानी का अंत, शाह मीर ने कश्मीर लियाराजनीति
कश्मीर की अंतिम हिन्दू शासिका कोटा रानी को उनके मंत्री शाह मीर ने अपदस्थ कर सल्तनत स्थापित की। जोनराज की राजतरंगिणी उनके अंत का वर्णन करती है।
- लगभग 1340–1425 ई.
संगमग्राम के माधव, केरल गणित परम्परा के प्रवर्तकविज्ञान
इरिंजालकुडा के पास संगमग्राम के माधव ने ज्या, कोटिज्या और पाई के लिए अनन्त श्रेणियाँ निकालीं। उनकी शिष्य-परम्परा ने केरल की गणित-ज्योतिष परम्परा को दो सौ वर्ष तक आगे बढ़ाया।
- 1343 ई.
तिरुचिरापल्ली के पास होयसल बल्लाल तृतीय मारे गएयुद्ध
मदुरै सल्तनत से जूझते अपने अंतिम वर्ष बिताने वाले वृद्ध होयसल राजा तिरुचिरापल्ली के पास युद्ध के बाद पकड़े और मारे गए। उनके प्रदेश शीघ्र विजयनगर में मिल गए।
- 1347 ई.
गुलबर्गा में बहमनी सल्तनत की स्थापनाराजनीति
दक्कन के विद्रोही सरदारों ने मुहम्मद बिन तुग़लक़ से अलग होकर हसन गंगू को अलाउद्दीन बहमन शाह बनाया। 180 वर्ष तक बहमनी और विजयनगर रायचूर दोआब के लिए लड़ते रहे।
- 1350 ई.
पंढरपुर में नामदेव की समाधिधर्म
संत नामदेव ने पंढरपुर में देह त्यागी। परम्परा के अनुसार उनकी समाधि विट्ठल मंदिर की पहली सीढ़ी पर है, ताकि हर भक्त के चरण उसे छुएँ।
- 1360 ई.
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ का पुरी पर धावायुद्ध
फ़िरोज़ शाह ने ओडिशा में घुसकर पुरी के जगन्नाथ मंदिर पर हमला किया। सीरत-ए-फ़िरोज़शाही डींग मारती है कि मूर्तियाँ तोड़कर समुद्र में फेंकी गईं; पूजा चलती रही और गजपतियों ने उसे फिर सँवारा।
- लगभग 1371 ई.
कुमार कम्पण ने मदुरै सल्तनत समाप्त कीप्रतिरोध
बुक्क प्रथम के पुत्र कुमार कम्पण ने दक्षिण की ओर कूच कर मदुरै के सुल्तान को हराया। उनकी रानी गंगादेवी ने अपने संस्कृत काव्य मधुराविजयम् में यह अभियान लिखा और मीनाक्षी मंदिर में पूजा फिर शुरू हुई।
- 1371 ई.
नम्पेरुमाल श्रीरंगम लौटेपुनर्निर्माण
लगभग पचास वर्ष दूर रहने के बाद विजयनगर के सेनानायक गोपण्ण रंगनाथ की उत्सव-मूर्ति श्रीरंगम वापस लाए। मंदिर की दीवार पर उकेरे संस्कृत श्लोक इस वापसी का उल्लेख करते हैं।
- 1398 ई. (परम्परागत)
काशी में संत कबीर का जन्मधर्म
काशी के जुलाहे कवि कबीर का जन्म हुआ; कबीर पंथ यह वर्ष 1398 मानता है। राम और भीतर के मार्ग पर उनके दोहे गुरु ग्रन्थ साहिब और हर हिंदी पाठ्यपुस्तक तक पहुँचे।
- 17 दिसंबर 1398
तैमूर ने दिल्ली की सेना हराई, दिल्ली लूटीयुद्ध
तैमूर ने दिल्ली के बाहर सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तुग़लक़ को हराया। अगले दिनों उसकी सेना ने नगर लूटा; उसके अपने संस्मरण हज़ारों बंदियों के क़त्ल की बात कहते हैं।
- जनवरी 1399
तैमूर का हरिद्वार में तीर्थयात्रियों पर हमलायुद्ध
भारत से लौटते हुए तैमूर ने हरिद्वार में गंगा के पहाड़ों से निकलने वाली घाटी, कुपिला, में जुटे हिन्दुओं पर हमला किया। शरफ़ुद्दीन अली यज़्दी का ज़फ़रनामा इस नरसंहार को दर्ज करता है।
- सिकन्दर का शासन, 1389–1413
कश्मीर में मार्तण्ड सूर्य मंदिर का विध्वंसयुद्ध
कश्मीर के सुल्तान सिकन्दर, जिसे बुतशिकन कहा गया, के समय ललितादित्य का मार्तण्ड सूर्य मंदिर और अनेक मंदिर गिराए गए। जोनराज की राजतरंगिणी यह विध्वंस दर्ज करती है; खंडहर आज भी मट्टन के ऊपर पठार पर खड़े हैं।
- 1408 ई.
ताल्लपाका में अन्नमाचार्य का जन्मधर्म
तेलुगु कीर्तनों के पहले महान रचनाकार अन्नमाचार्य का जन्म ताल्लपाका में हुआ। परम्परा उन्हें तिरुमला के वेंकटेश्वर पर 32,000 गीतों का श्रेय देती है, जिनमें बहुत से ताम्रपत्रों पर सुरक्षित हैं।
- लगभग 1414 ई.
तलाजा में नरसिंह मेहता का जन्मधर्म
गुजराती के आदि कवि नरसिंह मेहता का जन्म हुआ। उनका भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ गांधीजी का प्रिय भजन बना।
- 1420 का दशक
ज़ैनुल आबिदीन ने पंडितों को कश्मीर लौटायापुनर्निर्माण
बडशाह कहे जाने वाले सुल्तान ज़ैनुल आबिदीन ने पिता के समय का उत्पीड़न रोका, पंडितों को वापस बुलाया और मंदिरों की मरम्मत होने दी। जोनराज और श्रीवर ने उसका शासन लिखा।
- 1434 ई.
कपिलेन्द्र देव ने गजपति वंश स्थापित कियाराजनीति
कपिलेन्द्र देव ने ओडिशा का सिंहासन लेकर सूर्यवंशी गजपति वंश की नींव रखी, जो अपने शिखर पर गंगा से कावेरी तक फैला। गजपति स्वयं को जगन्नाथ का सेवक मानकर राज करते थे।
- 1437 ई.
राणा कुम्भा ने सारंगपुर में महमूद ख़िलजी को हरायाप्रतिरोध
मेवाड़ के महाराणा कुम्भा ने सारंगपुर में मालवा के सुल्तान को हराया और मेवाड़ के वृत्तान्त के अनुसार उसे चित्तौड़ में बंदी रखकर फिर छोड़ा।
- 1443 ई.
अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने विजयनगर का वर्णन कियासंस्कृति
फ़ारसी दूत अब्दुर रज़्ज़ाक़ देवराय द्वितीय के दरबार में आया और लिखा कि सात परकोटों वाले विजयनगर जैसा नगर आँख ने कभी नहीं देखा।
- 1443–58 ई.
राणा कुम्भा ने कुम्भलगढ़ बनवायासंस्कृति
अरावली में शिल्पी मंडन की योजना पर कुम्भलगढ़ का निर्माण आरम्भ हुआ। इसकी दीवार पहाड़ियों पर लगभग 36 किमी चलती है और महाराणा प्रताप का जन्म इसी दुर्ग में हुआ।
- 14 जून 1444
केरल में नीलकण्ठ सोमयाजी का जन्मविज्ञान
केरल सम्प्रदाय के खगोलविद् का जन्म; उन्होंने स्वयं अपना जन्म कलि-दिन 16,60,181 बताया है। 1500 का उनका तन्त्रसंग्रह आर्यभट से चली आ रही ग्रह-गति की पद्धति को संशोधित करता है।
- 1448 ई.
चित्तौड़गढ़ में विजय स्तम्भ पूर्णसंस्कृति
मालवा और गुजरात पर विजय की स्मृति में राणा कुम्भा ने चित्तौड़ में नौ मंज़िला विजय स्तम्भ पूरा किया। इसकी दीवारों पर नीचे से ऊपर तक विष्णु, शिव और देवी की मूर्तियाँ हैं।
- 1449 ई.
असम में श्रीमंत शंकरदेव का जन्मधर्म
नगाँव में बरदोवा के पास आलिपुखुरी में शंकरदेव का जन्म हुआ। उनके एकशरण नाम धर्म, नामघरों और अंकीया नाट ने असमिया जीवन को आकार दिया।
- 15 अप्रैल 1469
तलवंडी में गुरु नानक का जन्मधर्म
राय भोई दी तलवंडी, आज के ननकाना साहिब, में गुरु नानक देव का जन्म हुआ। 15 अप्रैल 1469 की तिथि आरम्भिक जनमसाखियों से आती है; सिख पंथ उनका प्रकाश पर्व कार्तिक पूर्णिमा को मनाता है।
- 1473 ई.
महमूद बेगड़ा ने द्वारका लूटीयुद्ध
गिरनार में रा मांडलिक को हराने के बाद गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने द्वारका पर धावा बोलकर मंदिर तोड़े। मिरात-ए-सिकन्दरी इस धावे को दर्ज करती है; पूजा लौटी और द्वारकाधीश मंदिर फिर बना खड़ा है।
- लगभग 1478 ई.
ब्रज के प्रज्ञाचक्षु कवि सूरदासधर्म
दिल्ली के पास सूरदास का जन्म हुआ; अधिकांश वृत्तान्त 1478 बताते हैं। वल्लभाचार्य के शिष्य के रूप में उन्होंने ब्रजभाषा में बालकृष्ण की लीला का सूरसागर गाया।
- 1479 ई.
चम्पारण्य में वल्लभाचार्य का जन्मधर्म
शुद्धाद्वैत और पुष्टिमार्ग के आचार्य वल्लभाचार्य का जन्म रायपुर के पास चम्पारण्य में तीर्थयात्रा पर निकले एक तेलुगु परिवार में हुआ। श्रीनाथजी की सेवा उन्हीं के नियमों से चलती है।
- 1484 ई.
पुरंदर दास का जन्मधर्म
धनी व्यापारी श्रीनिवास नायक, जो आगे पुरंदर दास बने, तीर्थहल्ली के पास जन्मे। कर्नाटक संगीत का हर विद्यार्थी आज भी उन्हीं के बनाए क्रमिक पाठों से आरम्भ करता है।
- 18 फ़रवरी 1486
नवद्वीप में चैतन्य महाप्रभु का जन्मधर्म
विश्वम्भर मिश्र, आगे चैतन्य महाप्रभु, का जन्म नवद्वीप में फाल्गुन पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण के समय हुआ। हरिनाम का उनका संकीर्तन बंगाल से ओडिशा और वृन्दावन तक फैला।
- लगभग 1498 ई.
मारवाड़ के कुड़की में मीराबाई का जन्मधर्म
मेड़ता के राठौड़ कुल की पुत्री मीरा का जन्म कुड़की में हुआ। गिरधर गोपाल पर उनके पद पूरे भारत में गाए जाते हैं।
- 20 मई 1498
वास्को द गामा कालीकट के पास उतराराजनीति
वास्को द गामा का पुर्तगाली बेड़ा ज़ामोरिन के बंदरगाह कालीकट के पास कप्पाड़ में लंगर डालता है। हिन्द महासागर में यूरोपीय समुद्री शक्ति यहीं से आरम्भ हुई।
- लगभग 1500 (शासन 1489–1517)
सिकन्दर लोदी ने मथुरा के मंदिर तोड़ेयुद्ध
सुल्तान सिकन्दर लोदी ने मथुरा के मंदिर तुड़वाए और हिन्दुओं को वहाँ के घाटों पर स्नान और मुंडन से रोका, जैसा अब्दुल्ला की तारीख़-ए-दाऊदी लिखती है।
- 1500–01 ई.
नीलकण्ठ सोमयाजी का तन्त्रसंग्रह पूर्णविज्ञान
त्रिक्कण्टियूर के नीलकण्ठ सोमयाजी ने तन्त्रसंग्रह पूरा किया, जो माधव की केरल परम्परा के ग्रह-गणित को संशोधित करने वाला ज्योतिष ग्रन्थ है।
- 1509 ई.
विजयनगर में कृष्णदेवराय का राज्याभिषेकराजनीति
तुळुव वंश के कृष्णदेवराय सिंहासन पर बैठे। बीस वर्षों में उन्होंने रायचूर वापस लिया, गजपतियों को झुकाया और आण्डाल पर तेलुगु काव्य आमुक्तमाल्यदा रचा।
- 1509 ई.
बाड़ा में कनकदास का जन्मधर्म
कुरुब सरदार से हरिदास कवि बने कनकदास का जन्म हावेरी के बाड़ा में हुआ। उडुपी में वह खिड़की, जिससे कहा जाता है कृष्ण ने मुड़कर उन्हें दर्शन दिए, आज भी कनकन किंडी कहलाती है।
- 1510 ई.
चैतन्य संन्यास लेकर पुरी मेंधर्म
कटवा में संन्यास लेकर चैतन्य पुरी गए और शेष जीवन का अधिकांश जगन्नाथ के सामने बिताया। गजपति प्रतापरुद्र उनके भक्त बने।
- 25 नवंबर 1510
पुर्तगालियों ने बीजापुर से गोवा छीनाराजनीति
अफ़ोंसो द अल्बुकर्क ने दूसरे प्रयास में गोवा ले लिया। यह पुर्तगाली एशिया की राजधानी बना और 451 वर्ष लिस्बन के अधीन रहा।
- 1516 ई.
सिंहाचलम में कृष्णदेवराय का विजय स्तम्भयुद्ध
गजपतियों के विरुद्ध कलिंग अभियान में कृष्णदेवराय सिंहाचलम पहुँचे और वहाँ अपनी विजय अंकित कराई। गजपति राजकुमारी से विवाह के साथ संधि हुई।
- 1517–18 ई.
राणा सांगा ने खातोली में इब्राहिम लोदी को हरायाप्रतिरोध
मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह ने कोटा के पास खातोली में दिल्ली सुल्तान की सेना को खदेड़ा; इस युद्ध में उनका एक हाथ कट गया। मेवाड़ अब उत्तर की सबसे प्रबल शक्ति था।
- 1520 ई.
रायचूर का युद्ध, कृष्णदेवराय विजयीयुद्ध
कृष्णदेवराय ने बीजापुर के इस्माइल आदिल शाह को हराकर रायचूर दुर्ग लिया। पुर्तगाली इतिहासकार फ़र्नाओ नूनिज़ ने इस युद्ध का विस्तृत वर्णन किया है।
- 21 अप्रैल 1526
पानीपत का पहला युद्ध, बाबर ने दिल्ली लीयुद्ध
पानीपत में बाबर की तोपों और घुड़सवारों ने इब्राहिम लोदी को कुचल दिया; सुल्तान रणभूमि में मारा गया। दिल्ली सल्तनत समाप्त हुई और मुग़ल शासन आरम्भ हुआ।
11 · मुग़ल काल और प्रतिरोध1526–1707 ई.
- 16 मार्च 1527
खानवा का युद्ध: राणा सांगा और बाबरप्रतिरोध
राणा सांगा ने फ़तेहपुर सीकरी के पास खानवा में बाबर के विरुद्ध राजपूतों के विशाल संघ का नेतृत्व किया। बाबर की तोपों और पार्श्व से हमले ने राजपूत पंक्तियाँ तोड़ दीं; घायल राणा को रणभूमि से बाहर ले जाया गया।
- जनवरी 1528
चंदेरी का पतन, मेदिनी राय का अंतिम संघर्षप्रतिरोध
बाबर ने राणा सांगा के सहयोगी मेदिनी राय के चंदेरी दुर्ग पर धावा बोला। सैनिक अंत तक लड़े और स्त्रियों ने जौहर किया, जैसा बाबर ने स्वयं बाबरनामा में लिखा है।
- 1528 ई.
अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मस्जिदयुद्ध
बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मस्जिद बनवाई; उसके शिलालेखों में बाबर का नाम था। 2003 की ASI खुदाई में, जिसे 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकारा, उसके नीचे एक बड़ा ग़ैर-इस्लामी ढाँचा मिला।
- 30 जनवरी 1528
कालपी में राणा सांगा का निधनप्रतिरोध
बाबर से फिर लड़ने की तैयारी करते हुए राणा सांगा का कालपी के डेरे में निधन हुआ; मेवाड़ की परम्परा कहती है कि युद्ध न चाहने वाले सरदारों ने उन्हें विष दिया। उनके शरीर पर अस्सी घाव थे और युद्धों में एक आँख और एक हाथ जा चुका था।
- 26 दिसंबर 1530
बाबर की मृत्यु, हुमायूँ उत्तराधिकारीराजनीति
पानीपत के चार वर्ष बाद आगरा में बाबर की मृत्यु हुई। उसका पुत्र हुमायूँ दस वर्ष के भीतर शेरशाह सूरी के हाथ साम्राज्य खो बैठेगा।
- 1532 ई. (प्रचलित गणना)
राजापुर में गोस्वामी तुलसीदास का जन्मधर्म
यमुना तट के राजापुर में तुलसीदास का जन्म हुआ, अधिकांश वृत्तान्त यही वर्ष देते हैं। निर्धनता में पले तुलसी रामचरितमानस के कवि बने।
- 1535 ई.
चित्तौड़ का दूसरा साका, रानी कर्णावती का जौहरप्रतिरोध
गुजरात के बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर धावा बोला। राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती ने शिशु उदय सिंह को सुरक्षित भेजा और जौहर की अगुवाई की, जबकि पुरुष अंतिम युद्ध को निकले।
- 8 मार्च 1535
चित्तौड़ का पतन; रानी कर्णावती का जौहरयुद्ध
लम्बे घेरे के बाद गुजरात के बहादुर शाह ने चित्तौड़ लिया। राणा साँगा की विधवा और अपने छोटे पुत्र की संरक्षिका रानी कर्णावती ने दुर्ग की स्त्रियों के साथ अग्नि में प्रवेश किया, और पुरुष अन्तिम साँस तक लड़ने निकल पड़े।
- 1540 ई.
जायसी का पद्मावत पूर्णसंस्कृति
जायस के मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी काव्य पद्मावत रचा, जिसमें चित्तौड़ की रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन ख़िलजी के घेरे की कथा है।
- 9 मई 1540
कुम्भलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्मप्रतिरोध
उदय सिंह द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र प्रताप सिंह का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ। मेवाड़ प्रताप जयंती हिन्दू पंचांग से ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को मनाता है।
- लगभग 1555 ई.
उल्लाल में रानी अब्बक्का ने पुर्तगालियों को खदेड़ाप्रतिरोध
मंगलुरु के पास उल्लाल की जैन रानी अब्बक्का चौटा ने पुर्तगालियों को कर देने से मना किया और उनका बेड़ा भगा दिया। वर्षों तक उन्होंने बंट और मप्पिला साथियों तथा ज़ामोरिन की सहायता से उनसे युद्ध किया।
- 27 जनवरी 1556
दिल्ली में गिरकर हुमायूँ की मृत्युराजनीति
हुमायूँ अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसले और तीन दिन बाद चल बसे; पीछे तेरह वर्ष के अकबर रह गए। इसी उथल-पुथल ने उसी वर्ष हेमू के दिल्ली अभियान का रास्ता खोला।
- 7 अक्टूबर 1556
दिल्ली में हेमू का विक्रमादित्य के रूप में राज्याभिषेकप्रतिरोध
बाईस युद्ध जीत चुके सूर सेनापति हेमू ने मुग़ल सूबेदार तर्दी बेग ख़ाँ को हराकर दिल्ली ली और पुराना क़िला में विक्रमादित्य की उपाधि से उनका राज्याभिषेक हुआ।
- 5 नवंबर 1556
पानीपत का दूसरा युद्ध, हेमू का पतनयुद्ध
पानीपत में हेमू जीत रहे थे कि एक तीर उनकी आँख में लगा; उनकी सेना बिखर गई, वे पकड़े गए और उनका सिर काट दिया गया। तेरह वर्षीय अकबर का राज बच गया।
- 1560 ई.
गोवा में इन्क्विज़िशन की स्थापनाधर्म
गोवा में पुर्तगाली इन्क्विज़िशन ने काम शुरू किया। अगली दो शताब्दियों में इसने पुर्तगाली क्षेत्र में हिन्दू संस्कारों पर रोक लगाई और हज़ारों पर मुक़दमे चलाए; बहुत से परिवार अपने कुलदेवताओं को सीमा पार पोंडा ले गए।
- 24 जून 1564
नर्रई में रानी दुर्गावती का बलिदानप्रतिरोध
गढ़ा-कटंगा की गोंड रानी अकबर के सेनापति आसफ़ ख़ाँ से जबलपुर के पास युद्ध में तीरों से घायल हुईं और बंदी बनने के बजाय आत्मबलिदान दिया। यह दिन उनका बलिदान दिवस है।
- जनवरी 1565
तालीकोटा: विजयनगर का पतन, हम्पी लूटा गयायुद्ध
दक्कन की चार सल्तनतों ने मिलकर तालीकोटा के पास विजयनगर को हराया; अलिय राम राय पकड़कर मारे गए। लगभग पाँच महीने नगर लूटा गया और मंदिर तोड़े गए; हम्पी के खंडहर आज भी वह घाव दिखाते हैं।
- 1565 ई.
कोच राजा नरनारायण ने कामाख्या का पुनर्निर्माण कियापुनर्निर्माण
कूचबिहार के नरनारायण और उनके भाई चिलाराय ने नीलाचल पर्वत पर ध्वस्त कामाख्या मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। मंदिर का एक शिलालेख शक 1487 में इस कार्य को दर्ज करता है।
- 1568 ई.
कूचबिहार में श्रीमंत शंकरदेव का देहावसानधर्म
परम्परागत गणना से लगभग 119 वर्ष के शंकरदेव ने कूचबिहार के भेलाडोंगा में देह त्यागी। उनके शिष्य माधवदेव ने एकशरण आन्दोलन आगे बढ़ाया।
- 23 फ़रवरी 1568
चित्तौड़ का तीसरा साका, जयमल और पत्ताप्रतिरोध
चार महीने के घेरे के बाद अकबर ने चित्तौड़ लिया। जयमल राठौड़ और पत्ता चूंडावत रक्षा करते हुए मारे गए, स्त्रियों ने जौहर किया और अकबर ने दुर्ग के लगभग 30,000 लोगों के क़त्ल का आदेश दिया।
- 1572 ई.
गोगुंदा में प्रताप महाराणा बनेप्रतिरोध
उदय सिंह की मृत्यु पर मेवाड़ के सरदारों ने उनके चुने उत्तराधिकारी को हटाकर गोगुंदा में प्रताप को गद्दी पर बैठाया। उन्होंने अकबर के आगे कभी न झुकने का प्रण लिया।
- 1574 ई.
तुलसीदास ने रामचरितमानस आरम्भ कियाधर्म
संवत 1631 की रामनवमी को अयोध्या में तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस आरम्भ किया, जैसा वे बालकाण्ड में कहते हैं। इसे उन्होंने काशी में पूरा किया।
- 18 जून 1576
हल्दीघाटी का युद्धप्रतिरोध
हल्दीघाटी के दर्रे में महाराणा प्रताप का सामना राजा मानसिंह की मुग़ल सेना से हुआ। हकीम ख़ाँ सूर और राणा पूंजा के भील धनुर्धर उनके साथ लड़े; घायल चेतक महाराणा को सुरक्षित ले गया और मेवाड़ पहाड़ों से लड़ता रहा।
- 1577 ई.
गुरु रामदास ने रामदासपुर, आज का अमृतसर, बसायाधर्म
चौथे सिख गुरु ने सरोवर की खुदाई आरम्भ की, जिसके चारों ओर रामदासपुर नगर बसा। यही आज का अमृतसर है।
- 1582 ई.
दिवेर में प्रताप की विजय, अधिकांश मेवाड़ मुक्तप्रतिरोध
महाराणा प्रताप और उनके पुत्र अमर सिंह ने दिवेर की मुग़ल चौकी पर धावा बोलकर उसे जीत लिया। अगले वर्षों में उन्होंने चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़ लगभग पूरा मेवाड़ वापस ले लिया।
- 1590 ई.
वृन्दावन में गोविन्ददेव मंदिरपुनर्निर्माण
आमेर के राजा मानसिंह ने वृन्दावन में लाल बलुआ पत्थर का गोविन्ददेव मंदिर बनवाया, जो उस समय उत्तर के सबसे ऊँचे मंदिरों में था। इसकी ऊपरी मंज़िलें बाद में औरंगज़ेब के समय गिराई गईं और मूर्ति जयपुर ले जाई गई।
- 19 जनवरी 1597
चावंड में महाराणा प्रताप का देहावसानप्रतिरोध
अकबर के आगे कभी न झुके महाराणा प्रताप का देहावसान उनकी पहाड़ी राजधानी चावंड में हुआ। उनकी छतरी पास के बांडोली में है।
- 1599 ई.
पैठण में संत एकनाथ की जल समाधिधर्म
एकनाथी भागवत के रचयिता और ज्ञानेश्वरी के पाठ को शुद्ध करने वाले संत एकनाथ ने पैठण में गोदावरी में समाधि ली।
- 31 दिसंबर 1600
लंदन में ईस्ट इंडिया कम्पनी को चार्टरराजनीति
महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने पूर्वी द्वीपों से व्यापार करने वाले लंदन के व्यापारियों की कम्पनी को चार्टर दिया। यह व्यापारी कम्पनी दो शताब्दियों में भारत पर राज करने लगी।
- 1604 ई.
हरमंदिर साहिब में आदि ग्रन्थ का प्रकाशधर्म
गुरु अर्जन देव ने गुरुओं तथा कबीर, नामदेव, रविदास आदि भक्तों की वाणी से आदि ग्रन्थ का संकलन कर उसे अमृतसर के हरमंदिर साहिब में प्रकाशित किया।
- 30 मई 1606
लाहौर में गुरु अर्जन देव की शहादतधर्म
जहाँगीर के आदेश पर, जो उसके अपने संस्मरण में दर्ज है, पाँचवें सिख गुरु को लाहौर में यातना देकर मार दिया गया। उनकी शहादत ने सिख पंथ को शस्त्र के मार्ग पर डाल दिया।
- 1610 ई.
राजा वोडेयर ने श्रीरंगपट्टण लिया, मैसूर दशहरा आरम्भराजनीति
राजा वोडेयर प्रथम ने विजयनगर के प्रतिनिधि से श्रीरंगपट्टण लिया और विजयनगर राजाओं का नवरात्रि उत्सव जारी रखा। मैसूर दशहरा तब से निरन्तर होता आया है।
- 1615 ई.
मेवाड़ की जहाँगीर से संधिराजनीति
वर्षों के युद्ध से थककर महाराणा अमर सिंह प्रथम ने शहज़ादा ख़ुर्रम से संधि की। मेवाड़ ने अपना राज्य रखा और महाराणा को मुग़ल दरबार में स्वयं उपस्थित होने से छूट मिली।
- 1 अप्रैल 1621
अमृतसर में गुरु तेग बहादुर का जन्मधर्म
गुरु हरगोबिन्द के सबसे छोटे पुत्र त्याग मल का जन्म अमृतसर में हुआ। करतारपुर के युद्ध में वीरता के कारण तेग बहादुर कहलाए और नौवें गुरु बने।
- 19 फ़रवरी 1630
शिवनेरी में शिवाजी का जन्मप्रतिरोध
शहाजी भोंसले और जीजाबाई के पुत्र शिवाजी का जन्म जुन्नर के पास शिवनेरी दुर्ग में हुआ। महाराष्ट्र सरकार 19 फ़रवरी 1630 को जन्मतिथि मानती है; बहुत से लोग जयंती तिथि से, फाल्गुन वद्य तृतीया को मनाते हैं।
- 1632 ई.
शाहजहाँ का नए मंदिर गिराने का आदेशयुद्ध
शाहजहाँ ने आदेश दिया कि उसके पिता के समय आरम्भ हुए मंदिर गिराए जाएँ। अब्दुल हमीद लाहौरी का बादशाहनामा लिखता है कि अकेले बनारस ज़िले में 76 मंदिर तोड़े गए।
- 22 अगस्त 1639
कम्पनी को मद्रास की पट्टी मिलीराजनीति
ईस्ट इंडिया कम्पनी के फ्रांसिस डे ने विजयनगर राजा के अधीन वहाँ के नायक से तट की एक पट्टी ली। वहाँ फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज बना और चेन्नई यह तिथि मद्रास दिवस के रूप में मनाता है।
- 1646 ई.
शिवाजी ने तोरणा लिया, स्वराज्य का पहला दुर्गप्रतिरोध
सोलह वर्ष की आयु में शिवाजी ने बीजापुर से तोरणा दुर्ग लिया। वहाँ मिले धन से उनकी पहली राजधानी राजगढ़ बनी।
- 1650 ई.
देहू में संत तुकाराम का वैकुण्ठगमनधर्म
जिनके अभंग वारकरी पंढरपुर की राह पर गाते हैं, वे संत तुकाराम फाल्गुन वद्य द्वितीया को देहू से वैकुण्ठ गए। भक्त यह दिन तुकाराम बीज के रूप में मनाते हैं।
- 10 नवंबर 1659
प्रतापगढ़ में शिवाजी ने अफ़ज़ल ख़ाँ को माराप्रतिरोध
बीजापुर ने शिवाजी को कुचलने अफ़ज़ल ख़ाँ को भेजा, जिसने रास्ते में तुळजापुर और पंढरपुर के मंदिर भ्रष्ट किए थे। प्रतापगढ़ के नीचे भेंट में अफ़ज़ल ख़ाँ ने पहले वार किया; शिवाजी ने वाघनख से उसे मारा और उसकी सेना भाग खड़ी हुई।
- 13 जुलाई 1660
बाजी प्रभु ने घोड़खिंड रोकीप्रतिरोध
पन्हाला के घेरे से शिवाजी के विशालगढ़ निकलते समय बाजी प्रभु देशपांडे ने कुछ सौ बांदल सैनिकों के साथ सँकरी घाटी तब तक रोके रखी जब तक विशालगढ़ की तोपों ने राजा के सुरक्षित पहुँचने की सूचना न दे दी। तब से यह घाटी पावनखिंड कहलाती है।
- 5 अप्रैल 1663
शाइस्ता ख़ाँ पर शिवाजी का रात्रि धावाप्रतिरोध
शिवाजी पुणे के लाल महल में घुसे, जहाँ मुग़ल सेनापति शाइस्ता ख़ाँ तीन वर्ष से डेरा डाले था, और रात में उस पर हमला किया। शाइस्ता ख़ाँ उँगलियाँ गँवाकर बचा और शीघ्र वापस बुला लिया गया।
- 11 जून 1665
पुरंदर की संधिराजनीति
मिर्ज़ा राजा जयसिंह के दबाव में शिवाजी ने 23 दुर्ग मुग़लों को सौंपे और औरंगज़ेब के दरबार जाना स्वीकार किया।
- 17 अगस्त 1666
आगरा से शिवाजी का निकल भागनाप्रतिरोध
औरंगज़ेब के दरबार में अपमान के बाद नज़रबंद शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी निकल भागे, प्रचलित वृत्तान्त के अनुसार मिठाई की टोकरियों में छिपकर। कुछ सप्ताह में वे दक्कन लौट आए।
- 22 दिसंबर 1666
पटना में गुरु गोबिन्द सिंह का जन्मधर्म
गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के पुत्र गोबिन्द राय का जन्म पटना में हुआ। उनके जन्मस्थान पर तख़्त श्री पटना साहिब है।
- 9 अप्रैल 1669
औरंगज़ेब का मंदिरों और पाठशालाओं को गिराने का आदेशयुद्ध
साक़ी मुस्तैद ख़ाँ की मआसिर-ए-आलमगीरी लिखती है कि बादशाह ने सभी सूबों के हाकिमों को काफ़िरों की पाठशालाएँ और मंदिर गिराने तथा उनकी शिक्षा और पूजा रोकने का आदेश दिया।
- 2 सितंबर 1669
काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्तयुद्ध
मआसिर-ए-आलमगीरी दर्ज करती है कि बादशाह के आदेश पर काशी का विश्वनाथ मंदिर गिरा दिया गया। उसकी कुर्सी पर ज्ञानवापी मस्जिद बनी और पुराने मंदिर की दीवार आज भी उसके पिछले भाग में खड़ी है।
- जनवरी–फ़रवरी 1670
मथुरा का केशवदेव मंदिर ध्वस्तयुद्ध
मआसिर-ए-आलमगीरी लिखती है कि रमज़ान के महीने में मथुरा में बीर सिंह देव बुंदेला का बनवाया केशवदेव मंदिर तोड़कर वहाँ मस्जिद बनाई गई; उसकी मूर्तियाँ आगरा की जहाँआरा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दबाई गईं।
- 4 फ़रवरी 1670
तानाजी मालुसरे ने कोंढाणा जीता, वीरगति पाईप्रतिरोध
तानाजी मालुसरे ने रात में कोंढाणा की चट्टानें चढ़कर दुर्ग जीता पर उदयभान से द्वन्द्व में वीरगति पाई। कहते हैं शिवाजी ने शोक में कहा, ‘गड आला पण सिंह गेला’; तब से यह सिंहगढ़ है।
- 3 अक्टूबर 1670
शिवाजी का सूरत पर दूसरा धावायुद्ध
लगभग पन्द्रह हज़ार मराठा घुड़सवार मुग़ल बन्दरगाह में घुसे और तीन दिन में उसका ख़ज़ाना ले गए; यूरोपीय कोठियों को छोड़ दिया गया।
- मार्च 1671
ब्रह्मपुत्र पर सराईघाट का युद्धप्रतिरोध
गम्भीर रूप से बीमार लचित बरफुकन ने गुवाहाटी के पास सराईघाट में राजा रामसिंह के मुग़ल बेड़े के विरुद्ध अहोम नावों का नेतृत्व कर विजय पाई। मुग़ल असम कभी नहीं जीत सके।
- 1671 ई.
छत्रसाल ने बुंदेलखंड में मुग़लों के विरुद्ध विद्रोह कियाप्रतिरोध
शिवाजी से भेंट के बाद छत्रसाल बुंदेला ने कुछ घुड़सवारों के साथ बुंदेलखंड का युद्ध आरम्भ किया। आगे उन्होंने पन्ना से आधी शताब्दी राज किया।
- 1672 ई.
नाथद्वारा में श्रीनाथजी की प्रतिष्ठाधर्म
विध्वंस से बचाने के लिए गोवर्धन से निकाले गए श्रीनाथजी के रथ के पहिए मेवाड़ के सिंहाड़ में धँस गए; महाराणा राज सिंह ने शरण दी और वहीं नाथद्वारा की हवेली बनी।
- 25 अप्रैल 1672
कलियाबोर में लचित बरफुकन का निधनप्रतिरोध
सराईघाट के विजेता का निधन युद्ध के लगभग एक वर्ष बाद हुआ। उनका मैदाम जोरहाट के पास हूलुंगापारा में है और असम 24 नवंबर को लचित दिवस मनाता है।
- 6 जून 1674
रायगढ़ में शिवाजी का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेकराजनीति
काशी के गागा भट्ट ने रायगढ़ में शिवाजी का राज्याभिषेक कराया। उन्होंने छत्रपति की उपाधि ली, राज्याभिषेक शक चलाया और फ़ारसी राजकीय शब्दों के स्थान पर राजव्यवहार कोश तैयार कराया।
- 17 जून 1674
पाचाड़ में राजमाता जिजाबाई का देहावसानराजनीति
रायगढ़ पर अपने पुत्र का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक देखने के ग्यारह दिन बाद जिजाबाई का क़िले के नीचे पाचाड़ में देहान्त हुआ।
- 11 नवंबर 1675
दिल्ली में गुरु तेग बहादुर की शहादतधर्म
बलपूर्वक धर्मान्तरण झेल रहे कश्मीरी पंडितों का पक्ष लेने वाले नौवें गुरु का औरंगज़ेब के आदेश पर चाँदनी चौक में सिर काटा गया। गुरुद्वारा शीशगंज वह स्थान है; उन्हें ‘हिन्द दी चादर’ कहा जाता है।
- 1676 ई.
तंजावुर में मराठा शासन आरम्भराजनीति
शिवाजी के सौतेले भाई एकोजी (वेंकोजी) ने तंजावुर लेकर वहाँ मराठा वंश स्थापित किया। उनके उत्तराधिकारियों ने तंजावुर को संगीत और विद्या का केंद्र बनाया; सरस्वती महल पुस्तकालय में उनका संग्रह है।
- 1679 ई.
दुर्गादास राठौड़ ने शिशु अजीत सिंह को बचायाप्रतिरोध
महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब ने मारवाड़ हड़पना चाहा, तो दुर्गादास राठौड़ शिशु उत्तराधिकारी अजीत सिंह को दिल्ली से निकाल लाए। राठौड़ लगभग तीस वर्ष लड़ते रहे, जब तक 1707 में अजीत सिंह ने जोधपुर नहीं ले लिया।
- 2 अप्रैल 1679
औरंगज़ेब ने जज़िया फिर लगायाराजनीति
मआसिर-ए-आलमगीरी बादशाह के उस आदेश को दर्ज करती है जिससे ग़ैर-मुसलमानों पर जज़िया कर फिर लगा, जिसे अकबर ने एक शताब्दी पहले हटाया था।
- 3 अप्रैल 1680
रायगढ़ में छत्रपति शिवाजी का देहावसानराजनीति
लगभग पचास वर्ष की आयु में छोटी बीमारी के बाद शिवाजी महाराज का रायगढ़ में देहावसान हुआ। वे लगभग 300 दुर्गों का राज्य और पश्चिमी तट पर नौसेना छोड़ गए।
- 16 जनवरी 1681
रायगढ़ में संभाजी का राज्याभिषेकराजनीति
संभाजी का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक हुआ। नौ वर्ष वे एक साथ मुग़लों, सिद्दियों और पुर्तगालियों से लड़े, जबकि औरंगज़ेब पूरा दरबार दक्कन ले आया।
- 1682 ई.
अहोमों ने मुग़लों को गुवाहाटी से निकालाप्रतिरोध
गदाधर सिंह के नेतृत्व में अहोमों ने इटाखुली में मुग़लों को हराकर गुवाहाटी सदा के लिए वापस ले ली। मानस नदी सीमा बनी।
- 1682 ई.
सज्जनगढ़ में समर्थ रामदास का देहावसानधर्म
दासबोध और मनाचे श्लोक के रचयिता और महाराष्ट्र भर में हनुमान मठ स्थापित करने वाले समर्थ रामदास ने सातारा के पास सज्जनगढ़ में देह त्यागी।
- 3 नवंबर 1688
आमेर में सवाई जयसिंह द्वितीय का जन्मराजनीति
जयपुर बसाने वाले और दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी तथा मथुरा में जंतर-मंतर वेधशालाएँ बनवाने वाले कछवाहा राजा का जन्म हुआ।
- 1689 ई.
राजाराम जिंजी पहुँचे, केलदी चेन्नम्मा ने शरण दीप्रतिरोध
रायगढ़ घिर जाने पर संभाजी के भाई राजाराम दक्षिण निकल गए। केलदी की रानी चेन्नम्मा ने औरंगज़ेब की अवहेलना कर उन्हें मार्ग दिया और जिंजी दुर्ग से उन्होंने आठ वर्ष मराठा राज्य जीवित रखा।
- 11 मार्च 1689
तुळापुर में संभाजी की हत्याप्रतिरोध
संगमेश्वर में पकड़े गए छत्रपति संभाजी ने दुर्ग और धर्म छोड़ने से मना किया; सप्ताहों की यातना के बाद भीमा तट के तुळापुर में उनकी हत्या की गई। उनकी समाधि वढू बुद्रुक में है।
- 24 अगस्त 1690
जॉब चार्नॉक सुतानुटी में बसाराजनीति
कम्पनी का प्रतिनिधि जॉब चार्नॉक हुगली तट के सुतानुटी लौटा; कालिकाता और गोविन्दपुर के साथ यही कलकत्ता बना, जो 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा।
- वैसाखी 1699
गुरु गोबिन्द सिंह ने खालसा की स्थापना कीधर्म
वैसाखी को आनन्दपुर में गुरु गोबिन्द सिंह ने शीश माँगे; पाँच व्यक्ति आगे आए और पंज प्यारे बने, खंडे दी पाहुल से दीक्षित पहले खालसा।
- 1700 ई.
राजाराम के बाद ताराबाई ने मराठों का नेतृत्व कियाप्रतिरोध
छत्रपति राजाराम के सिंहगढ़ में निधन पर उनकी विधवा ताराबाई ने बाल पुत्र के नाम से राज सँभाला और युद्ध मुग़ल क्षेत्र तक ले गईं। मुग़ल इतिहासकार ख़ाफ़ी ख़ाँ मराठों को लड़ते रखने का श्रेय उन्हें देता है।
- दिसंबर 1704
चमकौर और सरहिंद में चारों साहिबज़ादों का बलिदानधर्म
गुरु गोबिन्द सिंह के बड़े पुत्र अजीत सिंह और जुझार सिंह चमकौर में लड़ते हुए शहीद हुए। छोटे पुत्र जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह, नौ और छह वर्ष के, धर्म न छोड़ने पर सरहिंद में दीवार में चुनवाकर मारे गए; भारत 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस मनाता है।
- 3 मार्च 1707
अहमदनगर में औरंगज़ेब की मृत्युराजनीति
दक्कन में छब्बीस वर्ष मराठों को कुचलने के प्रयास के बाद अठासी वर्ष की आयु में औरंगज़ेब की अहमदनगर में मृत्यु हुई। एक दशक में साम्राज्य बिखरने लगा।
12 · मराठा उत्कर्ष और सिख साम्राज्य1707–1818 ई.
- 12 जनवरी 1708
सातारा में शाहू का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेकराजनीति
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़लों से छूटे संभाजी के पुत्र शाहू ने अधिकांश मराठा सरदारों को अपने पक्ष में किया और सातारा में उनका राज्याभिषेक हुआ। ताराबाई की शाखा आगे कोल्हापुर से राज करती रही।
- 7 अक्टूबर 1708
गुरु गोबिन्द सिंह का ज्योति-जोत, ग्रन्थ गुरु बनाधर्म
नांदेड़ में हत्यारे के वार से घायल गुरु गोबिन्द सिंह ने ग्रन्थ साहिब को सिखों का शाश्वत गुरु घोषित कर ज्योति-जोत ली। वहाँ तख़्त सचखंड हज़ूर साहिब है।
- 12 मई 1710
छप्पड़ चिड़ी में बंदा सिंह बहादुर की विजयप्रतिरोध
गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा पंजाब भेजे गए बंदा सिंह बहादुर ने छोटे साहिबज़ादों की हत्या कराने वाले सरहिंद के वज़ीर ख़ाँ को हराया। दो दिन बाद सरहिंद गिरा और बंदा ने लोहगढ़ में गुरुओं के नाम के सिक्के चलाए।
- 17 नवंबर 1713
बालाजी विश्वनाथ पेशवा बनेराजनीति
शाहू ने बालाजी विश्वनाथ भट को पेशवा नियुक्त किया। 1719 में बालाजी ने दिल्ली कूच कर दक्कन भर में मराठों के चौथ और सरदेशमुखी के अधिकार की मुग़ल सनदें प्राप्त कीं।
- 9 जून 1716
दिल्ली में बंदा सिंह बहादुर की शहादतप्रतिरोध
गुरदास नंगल के घेरे के बाद पकड़े गए बंदा सिंह को सैकड़ों सिखों के साथ दिल्ली में घुमाया गया, जिनके सिर रोज़ काटे गए। धर्म छोड़ने से मना करने पर क़ुतुब मीनार के पास यातना देकर उनकी हत्या की गई।
- 17 अप्रैल 1720
बाजीराव प्रथम पेशवा बनेराजनीति
बीस वर्ष की आयु में बाजीराव अपने पिता के बाद पेशवा बने। बीस वर्षों के अभियानों में वे एक भी युद्ध नहीं हारे और मराठा शक्ति को दक्कन से दिल्ली के द्वार तक ले गए।
- 1721 ई.
कान्होजी आंग्रे ने अंग्रेज़-पुर्तगाली हमला विफल कियाप्रतिरोध
मराठा नौसेनापति कान्होजी आंग्रे ने कुलाबा (अलीबाग) में अपने ठिकाने पर अंग्रेज़ों और पुर्तगालियों के संयुक्त हमले को विफल किया। 1729 में उनकी मृत्यु तक उनका बेड़ा कोंकण तट पर छाया रहा।
- 1724 ई.
सवाई जयसिंह ने दिल्ली में जंतर मंतर बनवायाविज्ञान
आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने दिल्ली में अपनी पहली बड़ी पत्थर की वेधशाला बनवाई; फिर जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में। जयपुर का सम्राट यंत्र दो सेकंड तक समय बताता है।
- 18 नवंबर 1727
सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर बसायासंस्कृति
शिल्पशास्त्र के अनुसार वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य के साथ बनी चौपड़ योजना पर जयपुर की नींव रखी गई। यह नगर यूनेस्को विश्व धरोहर है।
- 28 फ़रवरी 1728
पालखेड में बाजीराव ने निज़ाम को घेरायुद्ध
बाजीराव ने तेज़ कूचों से निज़ाम-उल-मुल्क को उसके आधार से दूर खींचा और पालखेड के निर्जल क्षेत्र में घेर लिया। निज़ाम ने मुंगी शेवगाँव की संधि कर शाहू के अधिकार माने।
- 1729 ई.
बाजीराव ने बुंदेलखंड में छत्रसाल को बचायाप्रतिरोध
जैतपुर में मुहम्मद ख़ाँ बंगश से घिरे वृद्ध छत्रसाल ने बाजीराव को सहायता के लिए बुलाया; पेशवा आए और घेरा तोड़ दिया। छत्रसाल ने उन्हें अपने राज्य का एक तिहाई दे दिया।
- मार्च–अप्रैल 1737
बाजीराव की घुड़सेना दिल्ली परयुद्ध
दोआब में मुग़ल सेनाओं को चकमा देकर तेज़ कूच के बाद पेशवा बाजीराव प्रथम दिल्ली के बाहर आ पहुँचे, अपने विरुद्ध भेजी गई सेना को हराया और लौट गए। मुग़ल दरबार ने जान लिया कि मराठे जब चाहें उसके द्वार तक आ सकते हैं।
- मार्च 1737
बाजीराव दिल्ली के द्वार तक पहुँचेयुद्ध
बिजली जैसे धावे में बाजीराव दिल्ली के बाहर आ पहुँचे, एक मुग़ल सेना हराई और लौट गए। कुछ महीने बाद उन्होंने भोपाल में निज़ाम को हराया और मालवा मराठों को मिला।
- 7 जनवरी 1738
निज़ाम ने दोराहा की संधि पर हस्ताक्षर किएयुद्ध
भोपाल के पास बाजीराव प्रथम से घिरे निज़ाम ने दोराहा में शर्तें मानीं: मालवा मराठों को मिलेगा और मुग़ल दरबार हर्जाना देगा।
- मई 1739
चिमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों से वसई लीयुद्ध
दो वर्ष के अभियान के बाद बाजीराव के भाई चिमाजी अप्पा ने बम्बई के उत्तर में पुर्तगालियों के गढ़ वसई पर धावा बोलकर उत्तरी कोंकण पर उनका शासन समाप्त किया।
- 22 मार्च 1739
दिल्ली में नादिर शाह का क़त्लेआमयुद्ध
करनाल में मुग़ल सेना को कुचलने के बाद फ़ारसी आक्रान्ता नादिर शाह ने दिल्ली में क़त्लेआम का आदेश दिया, जिसमें हज़ारों मारे गए। वह मयूर सिंहासन और कोहिनूर लेकर लौटा।
- 28 अप्रैल 1740
रावेरखेड़ी में बाजीराव प्रथम का निधनराजनीति
उनतालीस वर्ष की आयु में पेशवा का नर्मदा तट के रावेरखेड़ी में डेरे में ज्वर से निधन हुआ। उनकी समाधि नदी किनारे है।
- 10 अगस्त 1741
कुलच्चल में मार्तण्ड वर्मा ने डचों को हरायायुद्ध
त्रावणकोर की सेना ने कुलच्चल में डच ईस्ट इंडिया कम्पनी को हराकर उसके सेनापति यूस्टेकियस डी लैनॉय को पकड़ा, जो फिर दशकों त्रावणकोर की सेवा में रहा। किसी भारतीय राज्य के हाथों यह किसी यूरोपीय शक्ति की पहली हार थी।
- जनवरी 1750
तृप्पडिदानम्: त्रावणकोर पद्मनाभ को समर्पितधर्म
मार्तण्ड वर्मा ने तिरुवनन्तपुरम में श्री पद्मनाभस्वामी के सामने अपनी तलवार रखकर राज्य भगवान को समर्पित कर दिया। तब से राजा पद्मनाभदास, भगवान के सेवक, होकर राज करते रहे।
- फ़रवरी 1756
विजयदुर्ग का पतन, आंग्रे नौसेना टूटीयुद्ध
पेशवा के समर्थन से वॉटसन और क्लाइव के ब्रिटिश बेड़े ने तुळाजी आंग्रे से विजयदुर्ग (घेरिया) लेकर उनके जहाज़ जला दिए। मराठा नौसेना फिर कभी नहीं सँभली।
- मार्च 1757
अहमद शाह अब्दाली ने मथुरा और वृन्दावन लूटेयुद्ध
अब्दाली की सेना ने होली के समय मथुरा और फिर वृन्दावन और गोकुल पर हमला कर तीर्थयात्रियों और साधुओं को मारा। गोकुल में नागा साधुओं ने मुक़ाबला किया; समकालीन पत्र यमुना के लाल होने का वर्णन करते हैं।
- 1758 ई.
अटक और पेशावर पर मराठा ध्वजयुद्ध
रघुनाथराव और मल्हारराव होलकर ने अब्दाली के सूबेदारों को पंजाब से निकालकर अटक और पेशावर लिए। मराठा शक्ति सिन्धु की सीमा तक पहुँची।
- 14 जनवरी 1761
पानीपत का तीसरा युद्धयुद्ध
सदाशिवराव भाऊ की भूखी मराठा सेना ने मकर संक्रान्ति को पानीपत में अहमद शाह अब्दाली पर आक्रमण किया और नष्ट हो गई; विश्वासराव और भाऊ मारे गए और हज़ारों अनुयायी मारे गए या दास बनाए गए। अब्दाली दिल्ली में राज न कर सका और दस वर्ष में मराठे लौट आए।
- 5 फ़रवरी 1762
वड्डा घल्लूघारा: सिखों का बड़ा नरसंहारप्रतिरोध
मलेरकोटला के पास कुप में अब्दाली ने परिवारों सहित सिख दल पर अचानक हमला किया और एक दिन में हज़ारों मारे गए। अप्रैल में उसने हरमंदिर साहिब को उड़ा दिया; सिखों ने उसे फिर बनाया और दो वर्ष में सरहिंद और लाहौर ले लिए।
- 25 दिसंबर 1763
दिल्ली के पास महाराजा सूरजमल की मृत्युराजनीति
पानीपत से बचे मराठों को शरण देने वाले भरतपुर के जाट राजा दिल्ली के पास हिंडन पर घात में मारे गए। उनके जीवनकाल में भरतपुर और डीग के दुर्ग कभी धावे से नहीं जीते गए।
- 1767 ई.
अहिल्याबाई होलकर ने मालवा का शासन सँभालाराजनीति
पति, पुत्र और ससुर मल्हारराव को खोने के बाद अहिल्याबाई ने नर्मदा तट के महेश्वर से अट्ठाईस वर्ष होलकर राज्य चलाया। उनका शासन न्याय और केदारनाथ से रामेश्वरम तक बने मंदिरों और घाटों के लिए याद किया जाता है।
- 4 मई 1767
तिरुवारूर में त्यागराज का जन्मसंस्कृति
कर्नाटक संगीत के संत-रचनाकार त्यागराज का जन्म तिरुवारूर में हुआ। श्रीराम पर उनकी कृतियाँ, पंचरत्न सहित, हर जनवरी तिरुवैयारु में उनकी समाधि पर गाई जाती हैं।
- 1769 ई.
मोआमोरिया विद्रोह से अहोम राज्य हिलाराजनीति
मोआमोरिया वैष्णव अनुयायी अहोम दरबार के विरुद्ध उठ खड़े हुए; यह गृहयुद्ध रुक-रुककर तीस वर्ष चला और असम को बर्मी आक्रमण के लिए खुला छोड़ गया।
- 1771–72
महादजी शिंदे ने शाह आलम को दिल्ली लौटायाराजनीति
पानीपत के दस वर्ष बाद महादजी शिंदे के नेतृत्व में मराठा सेनाओं ने दिल्ली फिर ली और बादशाह शाह आलम द्वितीय को राजधानी लौटाया। मुग़ल तख़्त अब मराठों के हाथ में था।
- 22 मई 1772
राधानगर में राजा राममोहन राय का जन्मपुनर्निर्माण
समाज-सुधारक का जन्म बंगाल के हुगली ज़िले में हुआ। उन्होंने उपनिषदों का बांग्ला और अंग्रेज़ी में अनुवाद किया और सती प्रथा के अन्त के लिए संघर्ष किया।
- 18 नवंबर 1772
थेऊर में पेशवा माधवराव प्रथम का निधनराजनीति
पानीपत के बाद मराठा शक्ति को फिर खड़ा करने वाले माधवराव प्रथम का सत्ताईस वर्ष की आयु में थेऊर के चिंतामणि गणेश के सामने क्षयरोग से निधन हुआ। ग्रांट डफ़ ने लिखा कि पानीपत का मैदान मराठा साम्राज्य के लिए उनकी अकाल मृत्यु से अधिक घातक नहीं था।
- 30 अगस्त 1773
शनिवार वाड़े में पेशवा नारायणराव की हत्याराजनीति
गणेश चतुर्थी के दिन युवा पेशवा को उनके महल में गारदी पहरेदारों ने मार डाला। उनके चाचा रघुनाथराव को उत्तरदायी ठहराया गया और नाना फड़नवीस की बारभाई सभा ने शासन सँभाला।
- 24 मार्च 1775
तिरुवारूर में मुत्तुस्वामी दीक्षितर का जन्मसंस्कृति
कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति में से एक मुत्तुस्वामी दीक्षितर का जन्म तिरुवारूर में हुआ। उनकी संस्कृत कृतियाँ तमिल प्रदेश के मंदिरों को एक-एक देवता के साथ पिरोती हैं।
- 1 मार्च 1776
पुरन्दर की संधिराजनीति
पुणे में नाना फड़नवीस की संरक्षक सभा और कलकत्ता की कम्पनी सरकार ने संधि की, जिसमें कम्पनी ने रघुनाथराव का साथ छोड़ा। बम्बई ने इसे नहीं माना और युद्ध चलता रहा।
- जनवरी 1779
वडगाँव में मराठों ने अंग्रेज़ों से आत्मसमर्पण करायायुद्ध
पुणे की ओर बढ़ती बम्बई की सेना को तळेगाँव के पास महादजी शिंदे और नाना फडणवीस की सेनाओं ने घेर लिया और उसने वडगाँव का अपमानजनक समझौता किया।
- लगभग 1779
भाग्यचन्द्र ने मणिपुर में श्री गोविन्दजी की स्थापना कीधर्म
मणिपुर के राजर्षि भाग्यचन्द्र ने इम्फाल में श्री गोविन्दजी की मूर्ति स्थापित की और मणिपुरी रासलीला को रूप दिया, जो पहले उनके दरबार में हुई।
- 1780 ई.
अहिल्याबाई ने काशी विश्वनाथ का पुनर्निर्माण करायापुनर्निर्माण
अहिल्याबाई होलकर ने ज्ञानवापी के पास वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया। 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने लगभग एक टन सोने से इसके शिखर मढ़वाए।
- 1780 ई.
वेलु नाचियार ने शिवगंगा वापस लीप्रतिरोध
कम्पनी और अर्काट के नवाब द्वारा शिवगंगा हड़पे जाने पर विधवा हुई रानी वेलु नाचियार हैदर अली की सहायता और अपनी सेना के साथ लौटीं और अपना राज्य वापस लिया।
- 13 नवंबर 1780
गुजरांवाला में रणजीत सिंह का जन्मराजनीति
सुकरचकिया मिसल के महा सिंह के पुत्र रणजीत सिंह का जन्म गुजरांवाला में हुआ। बचपन में चेचक से उनकी एक आँख चली गई।
- 17 मई 1782
सालबाई की संधि, पहला आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्तराजनीति
महादजी शिंदे के माध्यम से हुई इस संधि ने दोनों पक्षों के अधिकांश क्षेत्र लौटाए और मराठों तथा कम्पनी के बीच बीस वर्ष की शान्ति लाई।
- 1783 ई.
बघेल सिंह ने दिल्ली के गुरुद्वारे बनवाएधर्म
बघेल सिंह के नेतृत्व में सिख मिसलें दिल्ली में घुसीं। शाह आलम द्वितीय से समझौते पर वे रुके और गुरुओं से जुड़े स्थानों पर शीशगंज, रकाबगंज और बंगला साहिब सहित गुरुद्वारे बनवाए।
- 1783 ई.
अहिल्याबाई ने नया सोमनाथ मंदिर बनवायापुनर्निर्माण
पुराने ध्वस्त मंदिर के पास अहिल्याबाई होलकर ने सोमनाथ का नया मंदिर बनवाया, जिसमें 1951 में महामंदिर के फिर बनने तक पूजा चलती रही। अहिल्याबाई मंदिर के नाम से उसमें आज भी पूजा होती है।
- मार्च 1795
खर्डा में मराठों की अंतिम संयुक्त विजययुद्ध
नाना फडणवीस के निर्देशन में पेशवा, शिंदे, होलकर, भोंसले और गायकवाड़ की सेनाओं ने खर्डा में निज़ाम को हराया। यह अंतिम बार था जब संघ एक होकर लड़ा।
- 13 अगस्त 1795
महेश्वर में अहिल्याबाई होलकर का देहावसानधर्म
पुण्यश्लोक अहिल्याबाई का महेश्वर में देहावसान हुआ। काशी, गया, सोमनाथ, द्वारका और अनेक स्थानों पर उनके बनवाए घाट, धर्मशालाएँ और मंदिर आज भी काम आते हैं।
- 7 जुलाई 1799
रणजीत सिंह ने लाहौर लियाराजनीति
नगरवासियों के बुलावे पर उन्नीस वर्षीय रणजीत सिंह लाहौर में प्रवेश करते हैं। यह सिख साम्राज्य की राजधानी बना।
- 13 मार्च 1800
पुणे में नाना फडणवीस का निधनराजनीति
पच्चीस वर्ष मराठा राज्य को एक रखने वाले मंत्री का निधन हुआ। वेलेज़ली के रेज़िडेंट ने लिखा कि उनके साथ मराठा शासन की सारी बुद्धि और संयम चला गया।
- 12 अप्रैल 1801
रणजीत सिंह पंजाब के महाराजा घोषितराजनीति
वैसाखी को लाहौर में रणजीत सिंह महाराजा घोषित हुए। उन्होंने गुरुओं के नाम के सिक्के चलाए और सरकार ख़ालसा के प्रमुख के रूप में राज किया।
- 31 दिसंबर 1802
पेशवा ने वसई की संधि कीराजनीति
यशवंतराव होलकर द्वारा पुणे से निकाले गए बाजीराव द्वितीय ने वसई में कम्पनी से सहायक संधि स्वीकार की। शिंदे और भोंसले ने इसके विरुद्ध शस्त्र उठाए।
- 23 सितंबर 1803
असई का युद्धयुद्ध
आर्थर वेलेज़ली की सेना ने असई में शिंदे और भोंसले की सेनाओं को हराया; मराठा तोपची कट जाने तक तोपें चलाते रहे। बाद में ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन बने वेलेज़ली ने इसे अपना देखा सबसे रक्तरंजित युद्ध कहा।
- 29 नवंबर 1803
अड़गाँव का युद्धयुद्ध
बरार में आर्थर वेलेज़ली ने नागपुर के रघुजी भोंसले की सेना को हराया। कुछ ही सप्ताह में भोंसले ने देवगाँव की संधि पर हस्ताक्षर किए।
- जनवरी–अप्रैल 1805
भरतपुर ने लॉर्ड लेक को रोकाप्रतिरोध
भरतपुर की मिट्टी की दीवारों पर चार ब्रिटिश धावे भारी हानि के साथ विफल हुए। जाट दुर्ग लोहागढ़ कहलाया और 1826 तक अजेय रहा।
- 25 अप्रैल 1809
अमृतसर की संधि, सतलुज सीमाराजनीति
रणजीत सिंह और कम्पनी ने सहमति दी कि सतलुज उनके क्षेत्रों की सीमा होगी। उन्होंने अपनी सेनाएँ पश्चिम और उत्तर की ओर मोड़ीं।
- 2 दिसंबर 1815
सुगौली की संधिराजनीति
आंग्ल-नेपाल युद्ध के बाद नेपाल ने कुमाऊँ, गढ़वाल और तराई की भूमि कम्पनी को सौंपने की बात मानी। मार्च 1816 में इसकी पुष्टि हुई।
- 13 जून 1817
पूना की संधि से बाजीराव द्वितीय झुकेराजनीति
माउंटस्टुअर्ट एल्फ़िन्स्टन के दबाव में पेशवा ने मराठा संघ के नेतृत्व का दावा छोड़ा और क़िले तथा प्रदेश सौंपे। नवम्बर में उन्होंने कम्पनी के विरुद्ध शस्त्र उठाए।
- 21 दिसंबर 1817
महिदपुर के युद्ध में होलकर पराजितयुद्ध
क्षिप्रा के तट पर थॉमस हिस्लॉप के नेतृत्व में कम्पनी की सेना ने युवा मल्हारराव होलकर द्वितीय को हराया। जनवरी में मन्दसौर की संधि हुई।
- 3 जून 1818
बाजीराव द्वितीय का आत्मसमर्पण, पेशवाई समाप्तराजनीति
तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद अंतिम पेशवा ने जॉन मैल्कम के आगे आत्मसमर्पण किया और पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिए गए। कम्पनी अब भारत में सर्वोपरि थी।
- जुलाई 1819
रणजीत सिंह ने कश्मीर लियाराजनीति
सिख सेना ने शोपियाँ में अफ़ग़ान सूबेदार को हराकर घाटी में सुल्तानों और अफ़ग़ानों के लगभग पाँच सौ वर्ष के शासन का अंत किया।
- 1834
ज़ोरावर सिंह ने लद्दाख जीताराजनीति
डोगरा शासक गुलाब सिंह के सेनापति ज़ोरावर सिंह कहलूरिया ऊँचे दर्रे पार कर लद्दाख में घुसे और उसे जम्मू के अधीन लाए।
- 30 अप्रैल 1837
जमरूद में हरि सिंह नलवा का बलिदानयुद्ध
अफ़ग़ानों के विरुद्ध ख़ैबर सीमा थामने वाले सिख साम्राज्य के महान सेनापति जमरूद की रक्षा करते हुए घातक रूप से घायल हुए। अफ़ग़ान दुर्ग नहीं ले सके।
- 27 जून 1839
लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह का निधनराजनीति
शेर-ए-पंजाब का चालीस वर्ष के शासन के बाद निधन हुआ। उत्तराधिकारियों के झगड़ों में एक दशक के भीतर सिख साम्राज्य अंग्रेज़ों के हाथ चला गया।
- 12 दिसंबर 1841
तिब्बत के तोयो में ज़ोरावर सिंह का बलिदानयुद्ध
अपनी सेना को मानसरोवर और कैलास तक ले जाने वाले ज़ोरावर सिंह सर्दियों की बर्फ़ में तोयो में तिब्बती सेना से लड़ते हुए मारे गए। वहाँ उनकी समाधि आज भी पूजी जाती है।
13 · कम्पनी राज और 1857 का युद्ध1757–1858 ई.
- 23 जून 1757
प्लासी का युद्धयुद्ध
मीर जाफ़र और अन्य सेनापतियों के अपनी सेनाएँ रोक लेने के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने पलाशी में नवाब सिराजुद्दौला को हराया। ईस्ट इंडिया कम्पनी बंगाल की स्वामी बन गई।
- 23 अक्टूबर 1764
बक्सर का युद्धयुद्ध
हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में कम्पनी की सेना ने मीर क़ासिम, अवध के शुजाउद्दौला और मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेनाओं को हराया। गंगा के मैदान में ब्रिटिश शक्ति अब निर्विरोध थी।
- 12 अगस्त 1765
कम्पनी को बंगाल की दीवानी मिलीराजनीति
इलाहाबाद की संधि से शाह आलम द्वितीय ने कम्पनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा का राजस्व वसूलने का अधिकार दिया। बंगाल की सम्पत्ति का ब्रिटेन की ओर बहाव शुरू हुआ।
- 1769–70
बंगाल का महा-अकालराजनीति
सूखे और कम्पनी की कठोर लगान वसूली से बंगाल और बिहार में अकाल पड़ा। वॉरेन हेस्टिंग्स ने बाद में अनुमान लगाया कि बंगाल की एक तिहाई जनता मर गई।
- 1770 का दशक
बंगाल में संन्यासी और फ़क़ीर विद्रोहप्रतिरोध
तीर्थ-मार्गों और भूमि-अनुदानों से वंचित दशनामी संन्यासियों और फ़क़ीरों के दल 1770 के दशक में उत्तर बंगाल में कम्पनी से लड़ते रहे। बंकिमचन्द्र का आनन्दमठ इन्हीं की स्मृति पर रचा गया।
- 29 जनवरी 1780
हिकी का बंगाल गज़ट, भारत का पहला समाचार-पत्रसंस्कृति
जेम्स ऑगस्टस हिकी ने कलकत्ता से अपने साप्ताहिक का पहला अंक छापा। वारेन हेस्टिंग्स पर उसके प्रहारों के कारण दो वर्ष में ही छापाख़ाना ज़ब्त हो गया।
- 15 जनवरी 1784
कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापनासंस्कृति
सर विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की। इसकी पत्रिका और संग्रहों ने यूरोप के लिए संस्कृत विद्या के द्वार खोले और इसके विद्वानों ने आगे ब्राह्मी लिपि पढ़ी।
- 1785 ई.
भगवद्गीता का अंग्रेज़ी अनुवादसंस्कृति
चार्ल्स विल्किन्स ने वॉरेन हेस्टिंग्स की भूमिका के साथ भगवद्गीता का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद छापा। यह गेटे, इमर्सन और थोरो तक पहुँचा।
- 22 मार्च 1793
बंगाल का स्थायी बंदोबस्तराजनीति
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने ज़मींदारों के साथ बंगाल का भू-राजस्व सदा के लिए तय कर दिया। किसानों के पुराने अधिकार गए और भुगतान कम पड़ने पर जागीरें नीलाम होने लगीं।
- 4 मई 1799
श्रीरंगपट्टण का पतन, टीपू सुल्तान मारा गयायुद्ध
कम्पनी ने श्रीरंगपट्टण पर धावा बोला और टीपू दरार पर मारा गया। अंग्रेज़ों ने पाँच वर्षीय कृष्णराज वोडेयर तृतीय को अपने संरक्षण में छोटे किए गए मैसूर की गद्दी पर बैठाया।
- 16 अक्टूबर 1799
कयत्तार में वीरपांडिय कट्टबोम्मन को फाँसीप्रतिरोध
कम्पनी को कर देने से मना करने वाले पांचालंकुरिची के पालयक्कारर को धोखे से पकड़कर कयत्तार में इमली के पेड़ से फाँसी दी गई।
- 24 अक्टूबर 1801
तिरुप्पत्तूर में मरुदु भाइयों को फाँसीप्रतिरोध
पूरे दक्षिण को कम्पनी के विरुद्ध उठने का आह्वान करने वाली तिरुचिरापल्ली घोषणा जारी करने वाले शिवगंगा के पेरिय मरुदु और चिन्न मरुदु को परिजनों सहित तिरुप्पत्तूर दुर्ग में फाँसी दी गई।
- 31 जुलाई 1805
संकगिरि में धीरन चिन्नमलै को फाँसीप्रतिरोध
तीन युद्धों में कम्पनी से लड़ने वाले कोंगु सरदार को धोखे से पकड़कर भाइयों सहित संकगिरि दुर्ग में फाँसी दी गई।
- 10 जुलाई 1806
वेल्लोर के सिपाहियों का विद्रोहप्रतिरोध
माथे के तिलक हटाने और नई पगड़ी पहनने का आदेश मिलने पर वेल्लोर दुर्ग के सिपाहियों ने रात में विद्रोह किया और सौ से अधिक ब्रिटिश सैनिक मारे; उसी दिन विद्रोह कुचल दिया गया।
- जनवरी 1809
वेलु तम्पी की कुण्डरा घोषणाप्रतिरोध
त्रावणकोर के दळवा वेलु तम्पी ने जनता से कम्पनी के विरुद्ध उठने का आह्वान किया। घेरे जाने पर आत्मसमर्पण के बजाय उन्होंने मण्णडी में आत्मबलिदान किया।
- मार्च 1817
ओडिशा में पाइक विद्रोहप्रतिरोध
बक्शी जगबंधु ने खुर्दा राजाओं के पुराने सैनिक, पाइकों, का कम्पनी की भू-नीति के विरुद्ध नेतृत्व किया। विद्रोहियों ने महीनों खुर्दा और पुरी अपने हाथ में रखे।
- 20 जनवरी 1817
कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापनासंस्कृति
कलकत्ता के हिन्दू नागरिकों ने आधुनिक शिक्षा के लिए हिन्दू कॉलेज खोला। यही प्रेसिडेंसी कॉलेज बना, आज प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय।
- 26 सितंबर 1820
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का जन्मसंस्कृति
मेदिनीपुर के बीरसिंह गाँव में ईश्वरचन्द्र बंद्योपाध्याय का जन्म हुआ। संस्कृत कॉलेज ने उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी; उनकी बांग्ला प्रवेशिका वर्णपरिचय आज भी पढ़ाई जाती है।
- 5 अक्टूबर 1823
मरुदूर में रामलिंग स्वामिगल (वल्ललार) का जन्मधर्म
तमिल सन्त का जन्म चिदम्बरम के पास हुआ। उन्होंने वडलूर में निःशुल्क अन्नशाला खोली, जिसका 1867 में जला चूल्हा आज भी जलता है, और सत्य ज्ञान सभा बनवाई।
- 12 फ़रवरी 1824
टंकारा में स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्मधर्म
काठियावाड़ के टंकारा में मूलशंकर का जन्म हुआ, जो आगे स्वामी दयानन्द सरस्वती बने। उन्होंने हिन्दुओं को वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया।
- 23 अक्टूबर 1824
कित्तूर चेन्नम्मा ने कम्पनी को हरायाप्रतिरोध
दत्तक पुत्र को मान्यता न देकर कम्पनी ने कित्तूर हड़पना चाहा तो रानी चेन्नम्मा की सेना ने उसके सैनिकों को हराया; कलेक्टर थैकरे मारा गया। दिसंबर में दूसरी सेना ने दुर्ग लिया और 1829 में बैलहोंगल में बंदी अवस्था में उनका निधन हुआ।
- 4 सितंबर 1825
बम्बई में दादाभाई नौरोजी का जन्मराजनीति
‘भारत के वयोवृद्ध पुरुष’ का जन्म बम्बई में हुआ। उनके ‘धन-निकासी सिद्धान्त’ ने दिखाया कि भारत का धन ब्रिटेन कैसे जाता है; 1892 में वे ब्रिटिश संसद में पहुँचने वाले पहले भारतीय बने।
- 24 फ़रवरी 1826
यान्डाबू की संधि: असम कम्पनी के हाथराजनीति
असम और मणिपुर पर क़ब्ज़ा करने वाले बर्मा ने पहले आंग्ल-बर्मी युद्ध के बाद इन्हें कम्पनी को सौंप दिया। छह शताब्दियों का अहोम शासन समाप्त हुआ।
- 11 अप्रैल 1827
पुणे में ज्योतिराव फुले का जन्मपुनर्निर्माण
समाज-सुधारक ज्योतिराव का जन्म माली परिवार में हुआ। 1848 में उन्होंने पत्नी सावित्रीबाई के साथ भिडे वाड़ा में लड़कियों का विद्यालय खोला।
- 20 अगस्त 1828
राजा राममोहन राय ने ब्रह्म सभा स्थापित कीधर्म
राममोहन राय ने कलकत्ता में उपनिषदों के एक ब्रह्म की उपासना के लिए ब्रह्म सभा खोली। यही ब्रह्म समाज बना।
- 19 नवंबर 1828
काशी में रानी लक्ष्मीबाई का जन्मप्रतिरोध
सबसे अधिक मानी जाने वाली तिथि के अनुसार मणिकर्णिका, जिन्हें मनु कहते थे, का जन्म वाराणसी में हुआ। झाँसी के राजा से विवाह के बाद वे 1858 में ग्वालियर में लड़ती हुई वीरगति को प्राप्त हुईं।
- 4 दिसंबर 1829
विनियम XVII से सती पर प्रतिबन्धराजनीति
राजा राममोहन राय के वर्षों के प्रयास के बाद लॉर्ड विलियम बेंटिंक के विनियम ने बंगाल प्रेसिडेंसी में सती को दण्डनीय अपराध बनाया।
- लगभग 1830
झाँसी के पास झलकारी बाई का जन्मप्रतिरोध
रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना की कोरी वीरांगना का जन्म झाँसी के पास भोजला में हुआ। 1858 में उन्होंने रानी का वेश धरकर अंग्रेज़ों को भटकाया, ताकि लक्ष्मीबाई निकल सकें।
- 1 जून 1830
गढ़डा में भगवान स्वामिनारायण का देहत्यागधर्म
सहजानन्द स्वामी ने सौराष्ट्र के गढ़डा में देह त्यागी। तब तक वे अहमदाबाद, भुज, वड़ताल और अन्य नगरों में पहले स्वामिनारायण मन्दिर बनवा चुके थे।
- 2 फ़रवरी 1835
मैकॉले का शिक्षा पर विवरण-पत्रराजनीति
टॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने तर्क दिया कि कम्पनी का धन संस्कृत और अरबी विद्या के बजाय अंग्रेज़ी शिक्षा पर लगे; उसका दावा था कि अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी भारत और अरब के पूरे साहित्य के बराबर है।
- 17 जुलाई 1835
ढाका में बंदी तिरोत सिंह का निधनप्रतिरोध
पहाड़ों से होकर कम्पनी की सड़क के विरुद्ध चार वर्ष युद्ध करने वाले नोंगख्लाव के खासी सरदार का ढाका में बंदी अवस्था में निधन हुआ। मेघालय यह दिन तिरोत सिंह दिवस के रूप में मनाता है।
- 18 फ़रवरी 1836
कामारपुकुर में श्री रामकृष्ण का जन्मधर्म
हुगली ज़िले के कामारपुकुर में गदाधर चट्टोपाध्याय का जन्म हुआ, जो आगे श्री रामकृष्ण परमहंस कहलाए।
- 27 जून 1838
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्मसंस्कृति
वन्दे मातरम् के रचयिता उपन्यासकार का जन्म बंगाल में नैहाटी के पास कांठालपाड़ा में हुआ।
- 18 जनवरी 1842
निफाड में महादेव गोविन्द रानडे का जन्मपुनर्निर्माण
न्यायाधीश, अर्थशास्त्री और समाज-सुधारक रानडे का जन्म नाशिक ज़िले में हुआ। उन्होंने प्रार्थना समाज और पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना में हाथ बँटाया और गोखले के गुरु बने।
- 10 फ़रवरी 1846
सोबराँव का युद्ध, पहला आंग्ल-सिख युद्ध समाप्तयुद्ध
ख़ालसा सेना सतलुज को पीठ पर रखकर लड़ी; अन्तिम मोर्चे का नेतृत्व करते शाम सिंह अटारीवाला वीरगति को प्राप्त हुए। इस हार से लाहौर का रास्ता कम्पनी के लिए खुल गया।
- 9 मार्च 1846
लाहौर की संधिराजनीति
सिख राज्य ने जालन्धर दोआब छोड़ा और उस पर ऐसा हर्जाना डाला गया जो वह चुका न सका; बदले में कश्मीर ले लिया गया। लाहौर में ब्रिटिश रेज़िडेंट बैठ गया।
- 16 मार्च 1846
अमृतसर की संधि से जम्मू-कश्मीर राज्य बनाराजनीति
पहले आंग्ल-सिख युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने जम्मू के गुलाब सिंह को 75 लाख रुपये में कश्मीर बेच दिया। जम्मू-कश्मीर की डोगरा रियासत 1947 तक रही।
- 6 जनवरी 1847
तिरुवैयारु में त्यागराज की समाधिधर्म
पुष्य बहुल पंचमी को कावेरी तट पर त्यागराज ने देह त्यागी। हर वर्ष उसी तिथि को त्यागराज आराधना होती है।
- 29 अप्रैल 1848
किलिमानूर में राजा रवि वर्मा का जन्मसंस्कृति
चित्रकार का जन्म त्रावणकोर के किलिमानूर महल में हुआ। श्रीराम, लक्ष्मी और सरस्वती के उनके छापे चित्रों ने देवी-देवताओं को भारत भर के घरों तक पहुँचाया।
- 22 नवंबर 1848
रामनगर में ख़ालसा डटा रहाप्रतिरोध
रामनगर में चिनाब के तट पर गफ़ की घुड़सेना ने शेर सिंह अटारीवाला की सिख सेना पर धावा बोला और पीछे धकेल दी गई; ब्रिगेडियर क्योरटन मारा गया। दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध का यह पहला युद्ध ख़ालसा के नदी पर डटे रहने के साथ समाप्त हुआ।
- 21 फ़रवरी 1849
गुजरात (पंजाब) का युद्ध, सिख सेना की अन्तिम हारयुद्ध
चिनाब के पास कम्पनी की भारी तोपों ने शेर सिंह अटारीवाला की सिख सेना को तोड़ दिया। कुछ ही सप्ताह में पंजाब हड़प लिया गया।
- 29 मार्च 1849
पंजाब का विलयराजनीति
दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के बाद लॉर्ड डलहौज़ी ने पंजाब का विलय कर लिया। बालक महाराजा दलीप सिंह को दूर भेजा गया और कोहिनूर महारानी विक्टोरिया के पास गया।
- 9 सितंबर 1850
वाराणसी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्मसंस्कृति
आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक का जन्म काशी में हुआ। ‘अंधेर नगरी’ और ‘भारत दुर्दशा’ जैसे उनके नाटकों ने हिन्दी गद्य और रंगमंच को आकार दिया।
- 16 अप्रैल 1853
बम्बई से ठाणे तक पहली यात्री रेलविज्ञान
तीन इंजनों से खींची चौदह डिब्बों की रेल बोरी बंदर से ठाणे तक 34 किमी चली। भारत की रेल यहीं से आरम्भ हुई।
- 31 मई 1855
दक्षिणेश्वर काली मंदिर की प्रतिष्ठाधर्म
रानी रासमणि ने गंगा तट पर दक्षिणेश्वर में भवतारिणी काली के मंदिर की प्रतिष्ठा की। शीघ्र ही रामकृष्ण उसके पुजारी बने।
- 30 जून 1855
संथाल हूल आरम्भप्रतिरोध
भोगनाडीह में सिद्धू और कान्हू मुर्मू भाइयों ने हज़ारों संथालों को महाजनों, ज़मींदारों और कम्पनी के विरुद्ध उठने को बुलाया। महीनों के संघर्ष के बाद विद्रोह कुचला गया; 30 जून हूल दिवस है।
- 23 जुलाई 1856
रत्नागिरी में बाल गंगाधर तिलक का जन्मप्रतिरोध
रत्नागिरी में केशव गंगाधर तिलक का जन्म हुआ। उन्होंने भारत को उद्घोष दिया, ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा’।
- 26 जुलाई 1856
हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारितराजनीति
विद्यासागर के याचिका अभियान के बाद क़ानून ने हिन्दू विधवाओं के पुनर्विवाह की अनुमति दी। पहले कई विवाहों का ख़र्च उन्होंने स्वयं उठाया।
- जून 1857
नाना साहब ने कानपुर लियाप्रतिरोध
तीन सप्ताह के घेरे के बाद जनरल व्हीलर की सेना ने अंतिम पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब के आगे आत्मसमर्पण किया। अगले सप्ताहों में कानपुर में दोनों ओर से भीषण हत्याएँ हुईं।
- 24 जनवरी 1857
कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापनासंस्कृति
कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई; उसी वर्ष बम्बई और मद्रास विश्वविद्यालय भी बने।
- 29 मार्च 1857
बैरकपुर में मंगल पाण्डेय ने अफ़सरों पर हमला कियाप्रतिरोध
चर्बी लगे कारतूसों से क्षुब्ध 34वीं बंगाल नेटिव इन्फ़ैंट्री के सिपाही मंगल पाण्डेय ने परेड मैदान पर ब्रिटिश अफ़सरों पर हमला किया। 8 अप्रैल को उन्हें फाँसी दी गई।
- 10 मई 1857
मेरठ में सिपाहियों का विद्रोहप्रतिरोध
रविवार की संध्या मेरठ के सिपाहियों ने जेल में बंद साथियों को छुड़ाया, अफ़सरों को मारा और रातभर कूच कर दिल्ली की ओर बढ़े। 1857 का युद्ध आरम्भ हुआ।
- 11 मई 1857
दिल्ली पर अधिकार, बहादुर शाह ज़फ़र घोषितप्रतिरोध
मेरठ के सिपाही दिल्ली पहुँचे, वहाँ की सेना उनसे मिल गई और वृद्ध बहादुर शाह ज़फ़र हिन्दुस्तान के बादशाह घोषित हुए, विद्रोह के प्रतीक।
- 14 सितंबर 1857
अंग्रेज़ों का दिल्ली पर धावायुद्ध
ब्रिटिश टुकड़ियों ने कश्मीरी गेट उड़ाया और छह दिन गली-गली लड़ीं। बहादुर शाह ने हुमायूँ के मक़बरे पर आत्मसमर्पण किया और रंगून निर्वासित हुए; उनके पुत्रों को गोली मार दी गई।
- 18 सितंबर 1857
राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह तोप से उड़ाए गएप्रतिरोध
विद्रोह का आह्वान करने वाली कविताओं के लिए पकड़े गए गढ़ा-मण्डला के गोंड राजा और उनके पुत्र को जबलपुर में तोप के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया।
- 21 सितंबर 1857
हुमायूँ के मक़बरे में बहादुर शाह ज़फ़र पकड़े गएयुद्ध
दिल्ली के पतन के एक सप्ताह बाद विलियम हॉडसन ने अन्तिम मुग़ल बादशाह का आत्मसमर्पण लिया। अगले दिन हॉडसन ने ख़ूनी दरवाज़े पर तीन शहज़ादों को गोली मार दी।
- 10 दिसंबर 1857
रायपुर में वीर नारायण सिंह को फाँसीप्रतिरोध
सोनाखान के ज़मींदार, जिन्होंने अकाल में भूखों के लिए व्यापारी का अन्न-भण्डार खुलवाया और 1857 में विद्रोह किया, को रायपुर में सार्वजनिक रूप से फाँसी दी गई।
- मार्च–अप्रैल 1858
झाँसी का घेराप्रतिरोध
ह्यू रोज़ ने झाँसी को घेरा। रानी लक्ष्मीबाई ने रक्षा का नेतृत्व किया और नगर गिरने पर दत्तक पुत्र को पीठ पर बाँधकर रात में निकलकर कालपी पहुँचीं।
- 26 अप्रैल 1858
जगदीशपुर में कुँवर सिंह का निधनप्रतिरोध
बिहार में विद्रोह के नेता अस्सी वर्षीय जगदीशपुर के ज़मींदार ने अपना अंतिम युद्ध जीता और कुछ दिन बाद घर पर उनका निधन हुआ। कहते हैं गंगा पार करते समय बाँह में गोली लगने पर उन्होंने उसे काटकर नदी को अर्पित कर दिया।
- 18 जून 1858
ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई का बलिदानप्रतिरोध
ग्वालियर के बाहर कोटा की सराय के पास घुड़सवार वेश में लड़ती हुई झाँसी की रानी वीरगति को प्राप्त हुईं। उनके विरोधी ह्यू रोज़ ने उन्हें विद्रोहियों में सबसे वीर और श्रेष्ठ सेनानायक कहा।
14 · पुनर्जागरण और स्वराज का संघर्ष1858–1947 ई.
- 1 नवंबर 1858
कम्पनी से शासन ब्रिटिश ताज के हाथराजनीति
इलाहाबाद में महारानी विक्टोरिया की घोषणा पढ़ी गई: कम्पनी का शासन समाप्त हुआ और ब्रिटिश ताज वायसराय के माध्यम से भारत पर शासन करने लगा।
- 30 नवंबर 1858
जगदीश चन्द्र बसु का जन्मविज्ञान
रेडियो तरंगों और क्रेस्कोग्राफ़ के अग्रणी भौतिकविद और वनस्पति-शरीरविद का जन्म बंगाल के मैमनसिंह में हुआ।
- 18 अप्रैल 1859
शिवपुरी में तात्या टोपे को फाँसीप्रतिरोध
मध्य भारत में लगभग एक वर्ष के छापामार युद्ध के बाद सोते हुए तात्या टोपे को धोखे से पकड़ा गया और मुक़दमे के बाद शिवपुरी में फाँसी दी गई।
- 15 सितंबर 1860
मुद्देनहल्ली में एम. विश्वेश्वरैया का जन्मविज्ञान
कृष्णराज सागर बाँध के निर्माता और मैसूर के दीवान रहे अभियन्ता का जन्म कोलार ज़िले में हुआ। भारत उनका जन्मदिन अभियन्ता दिवस के रूप में मनाता है।
- 1861
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापनाविज्ञान
अलेक्ज़ेंडर कनिंघम पहले पुरातत्व सर्वेक्षक नियुक्त हुए। ह्वेनसांग के यात्रा-वृत्तान्त के सहारे उन्होंने सारनाथ, संकिसा, श्रावस्ती और तक्षशिला की पहचान की।
- 6 मई 1861
आगरा में मोतीलाल नेहरू का जन्मराजनीति
वकील और कांग्रेस नेता का जन्म आगरा में हुआ। उन्होंने चित्तरंजन दास के साथ स्वराज पार्टी बनाई और 1928 की नेहरू रिपोर्ट लिखी।
- 7 मई 1861
जोड़ासाँको में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्मसंस्कृति
महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के सबसे छोटे पुत्र रवीन्द्रनाथ का जन्म कलकत्ता के जोड़ासाँको में हुआ। उन्होंने भारत और बांग्लादेश दोनों के राष्ट्रगान लिखे।
- 2 अगस्त 1861
रारुली में प्रफुल्ल चन्द्र राय का जन्मविज्ञान
रसायनशास्त्री का जन्म खुलना ज़िले में हुआ। उन्होंने बंगाल केमिकल्स की स्थापना की और रसशास्त्र ग्रन्थों के आधार पर ‘हिस्ट्री ऑफ़ हिन्दू केमिस्ट्री’ लिखी।
- 25 दिसंबर 1861
प्रयाग में मदन मोहन मालवीय का जन्मप्रतिरोध
इलाहाबाद में मदन मोहन मालवीय का जन्म हुआ। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की और चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।
- 12 जनवरी 1863
कलकत्ता में स्वामी विवेकानन्द का जन्मधर्म
उत्तर कलकत्ता के सिमला पल्ली में नरेन्द्रनाथ दत्त का जन्म हुआ। भारत उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाता है।
- 28 जनवरी 1865
लाला लाजपत राय का जन्मप्रतिरोध
पंजाब केसरी का जन्म फ़िरोज़पुर ज़िले के ढुडीके में हुआ। वे लाल-बाल-पाल के ‘लाल’ थे।
- 11 अप्रैल 1869
पोरबन्दर में कस्तूरबा गांधी का जन्मप्रतिरोध
पोरबन्दर में कस्तूरबा कपाड़िया का जन्म हुआ। तेरह वर्ष में मोहनदास से विवाह हुआ, और सत्याग्रहों के लिए वे दक्षिण अफ़्रीका और भारत दोनों में जेल गईं।
- 2 अक्टूबर 1869
पोरबंदर में मोहनदास करमचंद गांधी का जन्मप्रतिरोध
काठियावाड़ के पोरबंदर में राज्य के दीवान के पुत्र गांधी का जन्म हुआ। उनका जन्मदिन गांधी जयंती राष्ट्रीय अवकाश है।
- 17 जनवरी 1872
मलेरकोटला में नामधारी कूकों को तोप से उड़ायाप्रतिरोध
मलेरकोटला पर कूकों के धावे के बाद डिप्टी कमिश्नर ने बिना मुक़दमे उनचास नामधारी सिखों को तोप से उड़वा दिया और अगले दिन सोलह और को। ब्रिटिश माल के बहिष्कार का आह्वान करने वाले उनके नेता सतगुरु राम सिंह बर्मा निर्वासित हुए।
- 8 फ़रवरी 1872
पोर्ट ब्लेयर में वायसराय लॉर्ड मेयो की हत्याप्रतिरोध
अंडमान की दण्ड-बस्ती का निरीक्षण करते वायसराय को बन्दी शेर अली अफ़रीदी ने छुरा घोंपकर मार डाला। 11 मार्च को शेर अली को फाँसी हुई।
- 15 अगस्त 1872
कलकत्ता में श्री अरविन्द का जन्मधर्म
कलकत्ता में अरविन्द घोष का जन्म हुआ। पहले क्रान्तिकारी, फिर पांडिचेरी के योगी; उनका जन्मदिन ठीक उस दिन पड़ता है जिस दिन पचहत्तर वर्ष बाद भारत स्वतंत्र हुआ।
- 24 सितंबर 1873
ज्योतिराव फुले ने सत्यशोधक समाज स्थापित कियाराजनीति
पुणे में ज्योतिराव फुले ने स्त्रियों और वंचित वर्गों में शिक्षा फैलाने के लिए सत्यशोधक समाज बनाया। वे और सावित्रीबाई 1848 में ही बालिका विद्यालय खोल चुके थे।
- 6 फ़रवरी 1874
पुरी में भक्तिसिद्धान्त सरस्वती का जन्मधर्म
भक्तिविनोद ठाकुर के पुत्र का जन्म पुरी में हुआ। उन्होंने गौड़ीय मठ की स्थापना की, और उनके शिष्य ए. सी. भक्तिवेदान्त गौड़ीय वैष्णव धर्म को पश्चिम ले गए।
- 26 जून 1874
कोल्हापुर के शाहू महाराज का जन्मपुनर्निर्माण
शिवाजी के वंशज कोल्हापुर के शासक का जन्म हुआ। 1902 में उन्होंने अपने राज्य की सेवाओं के आधे पद पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित किए।
- 10 अप्रैल 1875
बम्बई में आर्य समाज की स्थापनाधर्म
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की। उसी वर्ष छपे उनके सत्यार्थ प्रकाश ने हिन्दुओं को वेदों की ओर बुलाया और वेद-अध्ययन सबके लिए खोला।
- 31 अक्टूबर 1875
नडियाद में वल्लभभाई पटेल का जन्मप्रतिरोध
भारत के लौहपुरुष का जन्म गुजरात के नडियाद में हुआ। उनका जन्मदिन राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- 15 नवंबर 1875
उलिहातु में बिरसा मुंडा का जन्मप्रतिरोध
राँची के पास उलिहातु में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। यह दिन जनजातीय गौरव दिवस है और 2000 में उनके जन्मदिन पर ही झारखंड बना।
- 9 अक्टूबर 1877
सुआण्डो में उत्कलमणि गोपबन्धु दास का जन्मपुनर्निर्माण
ओड़िया समाज-सुधारक, कवि और स्वाधीनता सेनानी का जन्म पुरी के पास हुआ। उन्होंने सत्यवादी में खुले वन-विद्यालय की स्थापना की और ‘समाज’ समाचार-पत्र निकाला।
- 1879
वासुदेव बलवन्त फड़के का सशस्त्र विद्रोहप्रतिरोध
पुणे के सैन्य लेखा कार्यालय के लिपिक फड़के ने रामोशियों और अन्य लोगों के दल खड़े कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया। जुलाई में पकड़े गए और 1883 में अदन की जेल में उनका निधन हुआ।
- 13 फ़रवरी 1879
हैदराबाद में सरोजिनी नायडू का जन्मप्रतिरोध
‘भारत कोकिला’ कही जाने वाली कवयित्री का जन्म हैदराबाद में हुआ। 1925 में वे कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं।
- 30 दिसंबर 1879
तिरुचुली में रमण महर्षि का जन्मधर्म
आरुद्र दर्शनम् की रात तिरुचुली में वेंकटरमण अय्यर का जन्म हुआ। सोलह वर्ष की आयु में वे अरुणाचल चले गए और फिर कभी वहाँ से नहीं गए।
- 4 जनवरी 1881
तिलक का ‘केसरी’ पहली बार छपासंस्कृति
पुणे से मराठी साप्ताहिक ‘केसरी’ निकला, जिसे बाल गंगाधर तिलक और गोपाल गणेश आगरकर ने आरम्भ किया। चार दशक तक यह पश्चिम भारत में स्वराज की सबसे प्रबल आवाज़ रहा।
- 1882
वन्दे मातरम् सहित आनन्दमठ प्रकाशितसंस्कृति
संन्यासी विद्रोह पर बंकिमचन्द्र का उपन्यास पुस्तक रूप में छपा, जिसमें मातृभूमि को दुर्गा मानकर गाया गया वन्दे मातरम् था। यही स्वतंत्रता आन्दोलन का गीत बना।
- 11 दिसंबर 1882
एट्टयपुरम में सुब्रमण्य भारती का जन्मसंस्कृति
स्वतंत्रता और शक्ति के तमिल कवि का जन्म तिरुनेलवेली ज़िले में हुआ। भारत माता और काली पर उनके गीत आज भी तमिलनाडु में गाए जाते हैं।
- 17 फ़रवरी 1883
अदन की जेल में वासुदेव बलवन्त फड़के का देहान्तप्रतिरोध
1879 के सशस्त्र विद्रोह के बाद आजीवन कालापानी पाए फड़के एक बार जेल से भागे, फिर पकड़े गए और अनशन के बाद अदन की जेल में उनका देहान्त हुआ।
- 28 मई 1883
भगूर में विनायक दामोदर सावरकर का जन्मप्रतिरोध
नासिक के पास भगूर में सावरकर का जन्म हुआ। उन्होंने 1857 का स्वातंत्र्य समर लिखा और दस वर्ष सेल्युलर जेल में बिताए।
- 30 अक्टूबर 1883
अजमेर में स्वामी दयानन्द का देहावसानधर्म
जोधपुर में बीमार पड़ने के कुछ सप्ताह बाद दीपावली के दिन अजमेर में स्वामी दयानन्द सरस्वती का देहावसान हुआ; आर्य समाज के वृत्तान्त कहते हैं कि उन्हें विष दिया गया था।
- 4 जून 1884
मैसूर में कृष्णराज वोडेयर चतुर्थ का जन्मराजनीति
जिन महाराजा के शासन में कृष्णराज सागर बाँध और मैसूर विश्वविद्यालय बने, उनका जन्म मैसूर में हुआ।
- 28 दिसंबर 1885
बम्बई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापनाप्रतिरोध
डब्ल्यू. सी. बनर्जी की अध्यक्षता में बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में बहत्तर प्रतिनिधि मिले। याचिकाओं के मंच के रूप में आरम्भ हुई कांग्रेस स्वतंत्रता संघर्ष की प्रमुख संस्था बनी।
- 25 मई 1886
बर्धमान में रासबिहारी बोस का जन्मप्रतिरोध
क्रान्तिकारी का जन्म बंगाल में हुआ। उन्होंने 1912 में हार्डिंग पर बम और 1915 के ग़दर विद्रोह की योजना बनाई, फिर जापान निकल गए और वहाँ इंडियन इंडिपेंडेंस लीग खड़ी की।
- 3 अगस्त 1886
चिरगाँव में मैथिलीशरण गुप्त का जन्मसंस्कृति
राष्ट्रकवि का जन्म झाँसी के पास हुआ। उनकी ‘भारत-भारती’ ने हिन्दी पाठकों को भारत के अतीत से जगाया और ‘साकेत’ ने उर्मिला की दृष्टि से रामकथा कही।
- 16 अगस्त 1886
काशीपुर में श्री रामकृष्ण की महासमाधिधर्म
काशीपुर उद्यान-भवन में श्री रामकृष्ण परमहंस ने देह त्यागी। नरेन्द्रनाथ के नेतृत्व में उनके युवा शिष्यों ने संन्यास लिया और बराहनगर में पहला मठ बनाया।
- 17 मार्च 1887
मुलबागल में डी. वी. गुंडप्पा का जन्मसंस्कृति
पत्रकार और कवि डीवीजी का जन्म कोलार ज़िले में हुआ। गीता और उपनिषदों से प्रेरित उनकी ‘मंकुतिम्मन कग्ग’ के छन्द पूरे कर्नाटक में उद्धृत किए जाते हैं।
- 8 सितंबर 1887
पट्टमडै में स्वामी शिवानन्द का जन्मधर्म
तिरुनेलवेली ज़िले में कुप्पुस्वामी का जन्म हुआ। ऋषिकेश में संन्यास लेने से पहले वे मलाया में डॉक्टर थे; उन्होंने योग और वेदान्त पर सैकड़ों पुस्तकें लिखीं।
- 22 दिसंबर 1887
इरोड में श्रीनिवास रामानुजन का जन्मविज्ञान
गणितज्ञ रामानुजन का जन्म इरोड में हुआ और वे कुम्भकोणम में पले। उनका जन्मदिन राष्ट्रीय गणित दिवस है।
- 1888
श्री नारायण गुरु ने अरुविप्पुरम में शिव की प्रतिष्ठा कीधर्म
शिवरात्रि को श्री नारायण गुरु ने नेय्यार नदी से एक पत्थर लेकर अरुविप्पुरम में शिव के रूप में प्रतिष्ठित किया और लम्बे समय से बाहर रखे गए लोगों के लिए मंदिर-पूजा खोली। आलोचकों को उन्होंने उत्तर दिया कि उन्होंने एझवा शिव की स्थापना की है।
- 7 नवंबर 1888
तिरुचिरापल्ली में सी. वी. रामन का जन्मविज्ञान
तिरुचिरापल्ली के पास तिरुवानैकोविल में चन्द्रशेखर वेंकट रामन का जन्म हुआ। वे विज्ञान में नोबेल पाने वाले पहले एशियाई बने।
- 1 अप्रैल 1889
नागपुर में के. बी. हेडगेवार का जन्मराजनीति
गुड़ी पड़वा को नागपुर में केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ। कलकत्ता में क्रान्तिकारियों के बीच चिकित्सा पढ़े हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
- 14 नवंबर 1889
इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरू का जन्मराजनीति
भारत के पहले प्रधानमंत्री का जन्म इलाहाबाद में हुआ। उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- 28 नवंबर 1890
पुणे में ज्योतिराव फुले का देहान्तपुनर्निर्माण
सत्यशोधक समाज के संस्थापक, जिन्होंने लड़कियों और सबसे वंचित जातियों के लिए विद्यालय खोले, का पुणे में देहान्त हुआ।
- 14 अप्रैल 1891
महू में बी. आर. आम्बेडकर का जन्मराजनीति
महू की सैनिक छावनी में भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उन्होंने भारत के संविधान की प्रारूप समिति की अध्यक्षता की।
- 1893
तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक उत्सव बनायाधर्म
पुणे में लोकमान्य तिलक ने घरेलू गणेश उत्सव को दस दिन का सार्वजनिक उत्सव बना दिया। पंडाल हर वर्ग के लोगों के मिलने के स्थान बने।
- 5 जनवरी 1893
गोरखपुर में परमहंस योगानन्द का जन्मधर्म
गोरखपुर में मुकुन्द लाल घोष का जन्म हुआ। परमहंस योगानन्द के रूप में वे क्रियायोग को अमेरिका ले गए, और उनकी ‘योगी कथामृत’ आज भी संसार भर में पढ़ी जाती है।
- 29 जून 1893
कलकत्ता में प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस का जन्मविज्ञान
भारतीय सांख्यिकी संस्थान के संस्थापक और दूसरी पंचवर्षीय योजना के निर्माता सांख्यिकीविद् का जन्म कलकत्ता में हुआ।
- 11 सितंबर 1893
विश्व धर्म महासभा में विवेकानन्द का भाषणधर्म
शिकागो में स्वामी विवेकानन्द ने ‘अमेरिका की बहनो और भाइयो’ से भाषण आरम्भ किया और पूरा सभागार तालियों के साथ खड़ा हो गया। उन्होंने हिन्दू धर्म को धर्मों की जननी के रूप में रखा।
- 6 अक्टूबर 1893
ढाका के पास मेघनाद साहा का जन्मविज्ञान
खगोल-भौतिकविद् का जन्म शाओराताली में हुआ। उनके आयनीकरण समीकरण से तारों का तापमान पढ़ा जा सका; बाद में उन्होंने राष्ट्रीय पंचांग सुधार समिति का नेतृत्व किया।
- 21 फ़रवरी 1894
भेड़ा में शान्ति स्वरूप भटनागर का जन्मविज्ञान
रसायनशास्त्री भटनागर का जन्म पंजाब के भेड़ा में हुआ। वे सीएसआईआर के पहले महानिदेशक बने और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की शृंखला खड़ी की।
- 25 फ़रवरी 1894
पुणे में मेहेर बाबा का जन्मधर्म
पुणे में मेरवान शेरियार ईरानी का जन्म हुआ। मेहेर बाबा के रूप में उन्होंने 1925 से 1969 में देहत्याग तक मौन रखा; उनके अनुयायी अहमदनगर के पास मेहेराबाद में जुटते हैं।
- 20 मई 1894
विल्लुपुरम में कांची परमाचार्य का जन्मधर्म
विल्लुपुरम में स्वामिनाथन का जन्म हुआ, जो कांची के 68वें शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती बने। उन्होंने 87 वर्ष मठ का नेतृत्व किया।
- 31 जनवरी 1896
धारवाड़ में कन्नड़ कवि द. रा. बेन्द्रे का जन्मसंस्कृति
‘अम्बिकातनयदत्त’ नाम से लिखने वाले बेन्द्रे का जन्म धारवाड़ में हुआ। उनकी ‘नाकु तन्ति’ को 1973 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
- 29 फ़रवरी 1896
भदेली में मोरारजी देसाई का जन्मराजनीति
भावी प्रधानमंत्री का जन्म गुजरात के वलसाड ज़िले में हुआ। 1977 में उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस से बाहर की पहली सरकार का नेतृत्व किया।
- 28 अगस्त 1896
गोरखपुर में फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्मसंस्कृति
‘फ़िराक़’ नाम से प्रसिद्ध उर्दू कवि रघुपति सहाय का जन्म गोरखपुर में हुआ। उनकी ‘गुल-ए-नग़मा’ को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
- 1 सितंबर 1896
ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद का जन्मधर्म
जन्माष्टमी के अगले दिन कलकत्ता में अभय चरण दे का जन्म हुआ। सत्तर वर्ष की आयु में वे हरे कृष्ण महामंत्र को पश्चिम ले गए।
- 23 जनवरी 1897
कटक में सुभाषचन्द्र बोस का जन्मप्रतिरोध
ओडिशा के कटक में नेताजी का जन्म हुआ। उनका जन्मदिन पराक्रम दिवस है।
- 10 मार्च 1897
प्लेग रोगियों की सेवा में सावित्रीबाई फुले का देहान्तपुनर्निर्माण
पुणे में लड़कियों के विद्यालय की भारत की पहली शिक्षिका एक बीमार बच्चे को अपने चिकित्सालय ले जाते समय प्लेग की चपेट में आईं और उनका देहान्त हुआ।
- 1 मई 1897
रामकृष्ण मिशन की स्थापनाधर्म
पश्चिम से लौटकर विवेकानन्द ने कलकत्ता में संन्यास और सेवा को जोड़ने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। अगले वर्ष बेलूर मठ की प्रतिष्ठा हुई।
- 22 जून 1897
चापेकर बंधुओं ने पुणे में रैंड को गोली मारीप्रतिरोध
महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती की रात दामोदर और बालकृष्ण चापेकर ने प्लेग आयुक्त रैंड को गोली मारी, जिसके सैनिकों ने घरों और पूजा-स्थलों की तलाशी ली थी। तीनों भाइयों को फाँसी दी गई।
- 12 सितंबर 1897
इक्कीस सिखों ने सारागढ़ी पर मोर्चा लियायुद्ध
हवलदार ईशर सिंह और 36वीं सिख के बीस जवानों ने हज़ारों अफ़रीदी और ओरकज़ई क़बायलियों के विरुद्ध संकेत चौकी की रक्षा की और अन्तिम व्यक्ति तक लड़े।
- 9 दिसंबर 1898
बेलूर मठ की प्रतिष्ठाधर्म
विवेकानन्द श्री रामकृष्ण के अवशेषों का कलश कंधे पर उठाकर बेलूर में गंगा तट के नए मठ ले गए। यही रामकृष्ण संघ का मुख्यालय है।
- 9 जून 1900
राँची जेल में बिरसा मुंडा का निधनप्रतिरोध
अंग्रेज़ी शासन और ज़मींदारों के विरुद्ध उलगुलान, महाविद्रोह, का नेतृत्व करने वाले धरती आबा बिरसा मुंडा का पच्चीस वर्ष की आयु में हिरासत में निधन हुआ। उनके विद्रोह के बाद 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम आया।
- 8 दिसंबर 1900
उदयपुर में उदय शंकर का जन्मसंस्कृति
भारतीय नृत्य को पश्चिमी मंचों तक ले जाने वाले, अन्ना पावलोवा के सहनर्तक उदय शंकर का जन्म उदयपुर में हुआ। आगे उन्होंने अल्मोड़ा में सांस्कृतिक केन्द्र खोला।
- 6 जुलाई 1901
श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्मराजनीति
सर आशुतोष मुखर्जी के पुत्र श्यामाप्रसाद का जन्म कलकत्ता में हुआ। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और आगे भारतीय जनसंघ की स्थापना की।
- 22 दिसंबर 1901
रवीन्द्रनाथ ने शान्तिनिकेतन में विद्यालय खोलासंस्कृति
रवीन्द्रनाथ ने शान्तिनिकेतन में पाँच विद्यार्थियों के साथ पेड़ों के नीचे ब्रह्मचर्य आश्रम विद्यालय आरम्भ किया। यही विश्वभारती बना।
- 4 जुलाई 1902
बेलूर में स्वामी विवेकानन्द की महासमाधिधर्म
उनतालीस वर्ष की आयु में संध्या के ध्यान के बाद बेलूर मठ में विवेकानन्द ने देह त्यागी।
- 29 फ़रवरी 1904
मदुरै में रुक्मिणी देवी अरुंडेल का जन्मसंस्कृति
भरतनाट्यम को फिर से सार्वजनिक मंच पर लाने वाली नृत्यांगना का जन्म मदुरै में हुआ। 1936 में उन्होंने अड्यार में कलाक्षेत्र की स्थापना की।
- 29 जुलाई 1904
पेरिस में जे. आर. डी. टाटा का जन्मविज्ञान
उद्योगपति का जन्म पेरिस में हुआ। 1932 में उन्होंने कराची से बम्बई तक पहली हवाई डाक उड़ाई, जिससे टाटा एयरलाइंस, आगे की एयर इंडिया, शुरू हुई।
- 29 दिसंबर 1904
हिरेकोडिगे में कुवेम्पु का जन्मसंस्कृति
कन्नड़ कवि कुवेम्पु (के. वी. पुट्टप्पा) का जन्म हुआ। उनके महाकाव्य ‘श्री रामायण दर्शनम्’ को 1967 में ज्ञानपीठ मिला, जो कन्नड़ का पहला था।
- 7 अगस्त 1905
कलकत्ता में स्वदेशी आन्दोलन आरम्भप्रतिरोध
कलकत्ता टाउन हॉल की सभा ने बंगाल विभाजन के विरोध में ब्रिटिश माल के बहिष्कार का संकल्प लिया। यह दिन राष्ट्रीय हथकरघा दिवस है।
- 16 अक्टूबर 1905
बंगाल विभाजन, विरोध में रक्षाबंधनप्रतिरोध
लॉर्ड कर्ज़न का बंगाल विभाजन लागू हुआ। रवीन्द्रनाथ भीड़ के साथ गंगा तट पहुँचे और लोगों ने एक-दूसरे को राखी बाँधी; पूरे कलकत्ता में वन्दे मातरम् गूँजा।
- 25 अगस्त 1906
कृपानन्द वारियार का जन्मधर्म
तमिलनाडु के वेल्लोर क्षेत्र में तिरुमुरुग कृपानन्द वारियार का जन्म। भगवान मुरुगन, कन्द पुराण और अरुणगिरिनाथर के तिरुप्पुगऴ् पर उनके प्रवचनों से छह दशकों तक तमिल प्रदेश के मन्दिर-आँगन भरे रहे।
- 17 अक्टूबर 1906
स्वामी रामतीर्थ की जल समाधिधर्म
गणित के अध्यापक से वेदान्ती बने रामतीर्थ, जिन्होंने जापान और अमेरिका में वेदान्त पर व्याख्यान दिए थे, दीवाली के दिन टिहरी के पास भिलंगना नदी में समा गए।
- 26 मार्च 1907
फ़र्रुख़ाबाद में महादेवी वर्मा का जन्मसंस्कृति
छायावाद की कवयित्री का जन्म फ़र्रुख़ाबाद में हुआ। उनके संग्रह ‘यामा’ को 1982 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
- 15 मई 1907
लुधियाना में सुखदेव थापर का जन्मप्रतिरोध
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रान्तिकारी का जन्म लुधियाना में हुआ। 1931 में उन्हें भगत सिंह और राजगुरु के साथ फाँसी दी गई।
- 28 सितंबर 1907
बंगा में भगत सिंह का जन्मप्रतिरोध
लायलपुर ज़िले के बंगा में देशभक्त परिवार में भगत सिंह का जन्म हुआ; जन्म के दिन उनके पिता और चाचा राष्ट्रीय कार्य के लिए जेल में थे।
- जुलाई 1908
तिलक को मांडले में छह वर्ष का कारावासप्रतिरोध
केसरी के लेखों के लिए राजद्रोह में दोषी ठहराए तिलक को बर्मा की मांडले जेल भेजा गया। वहाँ उन्होंने गीता के कर्मयोग पर अपनी टीका गीता रहस्य लिखी।
- 2 मई 1908
अलीपुर बम काण्ड में अरविन्द घोष गिरफ़्तारप्रतिरोध
पुलिस ने मानिकतला बाग़ान पर छापा मारा और भोर में अरविन्द को पकड़ा। अलीपुर जेल में उन्हें सर्वत्र वासुदेव के दर्शन का अनुभव हुआ; 1909 में वे बरी हुए।
- 11 अगस्त 1908
मुज़फ़्फ़रपुर में खुदीराम बोस को फाँसीप्रतिरोध
प्रफुल्ल चाकी के साथ मजिस्ट्रेट किंग्सफ़ोर्ड की समझी गई बग्घी पर बम फेंकने वाले अठारह वर्षीय खुदीराम बोस मुस्कुराते हुए फाँसी चढ़े। बंगाल वर्षों उनके गीत गाता रहा।
- 1 जुलाई 1909
मदनलाल ढींगरा ने लंदन में कर्ज़न वायली को माराप्रतिरोध
इम्पीरियल इंस्टीट्यूट में मदनलाल ढींगरा ने इंडिया ऑफ़िस के राजनीतिक सहायक सर विलियम कर्ज़न वायली को गोली मारी। 17 अगस्त को पेंटनविल में उन्हें फाँसी दी गई।
- 16 जुलाई 1909
कालका में अरुणा आसफ़ अली का जन्मप्रतिरोध
कालका में अरुणा गांगुली का जन्म हुआ। 9 अगस्त 1942 को उन्होंने गोवालिया टैंक पर तिरंगा फहराया और फिर भूमिगत रहकर भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया।
- 21 दिसंबर 1909
नाशिक में कलेक्टर जैक्सन को गोलीप्रतिरोध
बाबाराव सावरकर को कालापानी भेजने का बदला लेने के लिए अनन्त कान्हेरे ने विजयानन्द नाट्यगृह में ए. एम. टी. जैक्सन को गोली मारी। 1910 में कान्हेरे को फाँसी हुई।
- 4 अप्रैल 1910
श्री अरविन्द पांडिचेरी पहुँचेधर्म
अलीपुर बम मुक़दमे से बरी होकर अरविन्द ब्रिटिश भारत छोड़ फ़्रांसीसी पांडिचेरी पहुँचे और राजनीति से योग की ओर मुड़े। वे वहाँ चालीस वर्ष रहे।
- 8 जुलाई 1910
मार्सेई में सावरकर की छलाँगप्रतिरोध
मुक़दमे के लिए लंदन से बम्बई भेजे जा रहे सावरकर मार्सेई में एसएस मोरिया के रोशनदान से निकलकर तैरते हुए तट पर पहुँचे, पर घाट पर पकड़ लिए गए। उन्हें अंडमान में दो आजीवन कारावास मिले।
- 21 जुलाई 1911
बामणा में उमाशंकर जोशी का जन्मसंस्कृति
गुजराती कवि का जन्म साबरकांठा में हुआ। उनकी ‘निशीथ’ को 1967 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
- 13 अक्टूबर 1911
दार्जिलिंग में भगिनी निवेदिता का देहावसानधर्म
स्वामी विवेकानन्द की आयरिश शिष्या, जिन्होंने बागबाज़ार में बालिका विद्यालय चलाया और प्लेग में कलकत्ता की सेवा की, का 44 वर्ष की आयु में देहान्त हुआ। उनके स्मृति-पत्थर पर लिखा है कि उन्होंने भारत को अपना सर्वस्व दिया।
- 12 दिसंबर 1911
दिल्ली दरबार: राजधानी दिल्ली जाएगीराजनीति
दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने घोषणा की कि राजधानी कलकत्ता से दिल्ली जाएगी और बंगाल का विभाजन रद्द होगा।
- 27 दिसंबर 1911
जन गण मन पहली बार गाया गयासंस्कृति
कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन के दूसरे दिन रवीन्द्रनाथ का ‘भारत भाग्य विधाता’ गाया गया। इसका पहला पद भारत का राष्ट्रगान बना।
- 23 दिसंबर 1912
दिल्ली में वायसराय हार्डिंग पर बमप्रतिरोध
नई राजधानी में चाँदनी चौक से हाथी पर प्रवेश करते लॉर्ड हार्डिंग के हौदे में रासबिहारी बोस के संगठित क्रान्तिकारियों ने बम फेंका। वायसराय घायल हुआ और उसका सेवक मारा गया।
- 3 मई 1913
बम्बई में ‘राजा हरिश्चन्द्र’ प्रदर्शितसंस्कृति
सत्यवादी राजा पर दादासाहेब फाल्के की फ़िल्म कोरोनेशन सिनेमा में लगी। यह भारत की पहली पूरी लम्बाई की कथा-फ़िल्म है।
- 13 नवंबर 1913
रवीन्द्रनाथ को साहित्य का नोबेल पुरस्कारसंस्कृति
स्वीडिश अकादमी ने गीतांजलि के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार दिया। वे नोबेल पाने वाले पहले एशियाई हैं।
- 22 सितंबर 1914
जर्मन युद्धपोत एमडेन ने मद्रास पर गोले बरसाएयुद्ध
रात में एमडेन ने मद्रास बन्दरगाह की बर्मा ऑयल टंकियों पर गोले दागे और उनमें आग लगा दी। तमिल में आज भी दुस्साहसी को ‘एमडेन’ कहते हैं।
- 29 सितंबर 1914
बजबज में कोमागाता मारू के यात्रियों पर गोलीबारीप्रतिरोध
कनाडा से लौटाए गए जहाज़ के पंजाबी यात्री कलकत्ता के पास बजबज उतरे; पुलिस ने गोली चलाई और लगभग बीस लोग मारे गए।
- 9 जनवरी 1915
दक्षिण अफ़्रीका से गांधी की वापसीप्रतिरोध
दक्षिण अफ़्रीका में इक्कीस वर्ष बिताकर गांधी बम्बई के अपोलो बंदर पर उतरे। यह दिन प्रवासी भारतीय दिवस है।
- 16 नवंबर 1915
लाहौर में करतार सिंह सराभा को फाँसीप्रतिरोध
फ़रवरी 1915 के ग़दर पार्टी के नियोजित विद्रोह के भेद खुल जाने के बाद उन्नीस वर्षीय करतार सिंह सराभा को छह साथियों सहित फाँसी दी गई। भगत सिंह उनका चित्र अपने पास रखते थे।
- 4 फ़रवरी 1916
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापनासंस्कृति
वसंत पंचमी को लॉर्ड हार्डिंग ने मदन मोहन मालवीय के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। यह एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक बना।
- 28 अप्रैल 1916
तिलक ने होम रूल लीग बनाईप्रतिरोध
बेलगाँव में तिलक ने अपनी इंडियन होम रूल लीग आरम्भ की; एनी बेसेंट ने सितंबर में अपनी लीग शुरू की। स्वराज्य जन-जन की माँग बन गया।
- 8 मई 1916
एर्नाकुलम में स्वामी चिन्मयानन्द का जन्मधर्म
केरल में बालकृष्ण मेनन का जन्म हुआ। स्वामी चिन्मयानन्द के रूप में उन्होंने भारत और विदेशों में अंग्रेज़ी में गीता ज्ञान-यज्ञ किए, और अनुयायियों ने चिन्मय मिशन बनाया।
- 16 सितंबर 1916
मदुरै में एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का जन्मसंस्कृति
जिनका ‘वेंकटेश सुप्रभातम्’ हर सुबह तिरुमला को जगाता है, उन कर्नाटक गायिका का जन्म मदुरै में हुआ। 1998 में वे भारत रत्न पाने वाली पहली संगीतज्ञ बनीं।
- अप्रैल 1917
चम्पारण सत्याग्रहप्रतिरोध
राजकुमार शुक्ल के बुलावे पर गांधी बिहार के चम्पारण में नील किसानों की बात सुनने गए। उन्होंने ज़िला छोड़ने का आदेश नहीं माना; बाद की जाँच ने तिनकठिया प्रथा समाप्त की।
- 19 नवंबर 1917
इलाहाबाद में इंदिरा गांधी का जन्मराजनीति
भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री का जन्म जवाहरलाल और कमला नेहरू के घर हुआ।
- मई 1918
बरेली जेल में कुँवर प्रताप सिंह बारहठ का बलिदानप्रतिरोध
राजस्थान के शाहपुरा के युवा क्रान्तिकारी, केसरी सिंह बारहठ के पुत्र और रासबिहारी बोस के साथी, लगभग पच्चीस वर्ष की आयु में बरेली जेल में बलिदान हुए। बनारस षड्यन्त्र मामले में बन्दी रहते हुए यातना सहकर भी उन्होंने साथियों के नाम नहीं बताए।
- 30 जुलाई 1918
श्रीरामकृष्ण के शिष्य स्वामी प्रेमानन्द की महासमाधिधर्म
श्रीरामकृष्ण के युवा संन्यासी शिष्यों में से एक, बाबूराम महाराज, कलकत्ता में देह त्यागते हैं। वर्षों तक उन्होंने बेलूड़ मठ के दैनिक जीवन और पूजा का संचालन किया।
- 13 अप्रैल 1919
जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्डप्रतिरोध
वैसाखी के दिन ब्रिगेडियर-जनरल डायर के सैनिकों ने अमृतसर के चारदीवारी वाले जलियाँवाला बाग़ में शान्त भीड़ पर बिना चेतावनी गोलियाँ चलाईं। सरकारी आँकड़ों में 379 मृत थे; भारतीय अनुमान कहीं अधिक थे।
- 31 अगस्त 1919
गुजराँवाला में अमृता प्रीतम का जन्मसंस्कृति
पंजाबी कवयित्री का जन्म गुजराँवाला में हुआ। विभाजन की स्त्रियों पर उनका विलाप ‘अज्ज आखाँ वारिस शाह नू’ सीमा के दोनों ओर गाया जाता है।
- 7 अप्रैल 1920
वाराणसी में पंडित रविशंकर का जन्मसंस्कृति
सितार के आचार्य का जन्म काशी में हुआ। बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ के शिष्य रविशंकर हिन्दुस्तानी संगीत को संसार भर के मंचों तक ले गए।
- 24 अप्रैल 1920
श्रीमाँ पांडिचेरी में बस गईंधर्म
मीरा अल्फ़ासा जापान से लौटकर श्री अरविन्द के पास पांडिचेरी में बस गईं। आगे उन्होंने आश्रम खड़ा किया और ऑरोविल की स्थापना की।
- 26 अप्रैल 1920
कुम्भकोणम में रामानुजन का निधनविज्ञान
कैम्ब्रिज से लौटने के एक वर्ष बाद, जहाँ वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो चुने गए थे, बत्तीस वर्ष की आयु में श्रीनिवास रामानुजन का निधन हुआ। उनकी नोटबुकें आज भी नए परिणाम दे रही हैं।
- 20 जुलाई 1920
कलकत्ता में श्री सारदा देवी का देहत्यागधर्म
श्री रामकृष्ण की सहधर्मिणी और पहली शिष्या, श्री माँ ने उद्बोधन भवन में देह त्यागी। उनका समाधि-मन्दिर बेलुड़ मठ में है।
- 1 अगस्त 1920
तिलक का निधन, असहयोग आरम्भप्रतिरोध
बम्बई में लोकमान्य तिलक का निधन हुआ; उसी दिन गांधी ने असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया। चौपाटी तक तिलक की अंतिम यात्रा में लाखों लोग जुटे।
- 18 अक्टूबर 1920
गांधी जी ने गुजरात विद्यापीठ स्थापित कीसंस्कृति
अंग्रेज़ी कॉलेज छोड़ने वाले छात्रों के लिए अहमदाबाद में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खुला, जहाँ गुजराती में पढ़ाई होती थी और कताई पाठ्यक्रम का अंग थी।
- 19 अक्टूबर 1920
रोहा में पांडुरंग शास्त्री आठवले का जन्मधर्म
स्वाध्याय परिवार के संस्थापक दादाजी का जन्म रायगढ़ ज़िले में हुआ। गीता पर आधारित उनका आन्दोलन लाखों मछुआरों और किसानों तक पहुँचा; 1997 में उन्हें टेम्पलटन पुरस्कार मिला।
- 10 फ़रवरी 1921
वाराणसी में काशी विद्यापीठ का उद्घाटनसंस्कृति
गांधी जी ने काशी में राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का उद्घाटन किया। शिवप्रसाद गुप्त ने इसे स्थापित किया और भगवान दास इसके पहले कुलपति बने; यह असहयोग में सरकारी कॉलेज छोड़ने वाले छात्रों के लिए था।
- 2 मई 1921
कलकत्ता में सत्यजित राय का जन्मसंस्कृति
फ़िल्मकार का जन्म लेखकों और मुद्रकों के राय परिवार में हुआ। उनकी ‘पथेर पांचाली’ (1955) विदेशों में व्यापक पहचान पाने वाली पहली भारतीय फ़िल्म बनी।
- 11 सितंबर 1921
मद्रास में सुब्रह्मण्य भारती का निधनसंस्कृति
स्वतंत्रता और शक्ति-भक्ति के तमिल गीतों से दक्षिण को जगाने वाले महाकवि भारती का अड़तीस वर्ष की आयु में निधन हुआ; कुछ महीने पहले पार्थसारथी मंदिर के हाथी ने उन्हें धक्का मारा था।
- 7 दिसंबर 1921
चाणसद में प्रमुख स्वामी महाराज का जन्मधर्म
वडोदरा के पास शान्तिलाल पटेल का जन्म हुआ। 1971 से बीएपीएस के प्रमुख के रूप में उन्होंने गांधीनगर और दिल्ली के अक्षरधाम और संसार भर में मन्दिर बनवाए।
- 4 फ़रवरी 1922
चौरी चौरा, असहयोग वापसप्रतिरोध
गोरखपुर के पास चौरी चौरा में जुलूस पर पुलिस की गोलीबारी के बाद भीड़ ने थाना जला दिया और बाईस पुलिसकर्मी मारे गए। कुछ दिन बाद गांधी ने आन्दोलन वापस ले लिया।
- 18 मार्च 1922
अहमदाबाद में गांधी को छह वर्ष की सज़ाप्रतिरोध
‘महान मुक़दमे’ में गांधी जी ने ‘यंग इंडिया’ के लेखों पर राजद्रोह का आरोप स्वीकार कर सबसे कड़ी सज़ा माँगी। न्यायाधीश ब्रूमफ़ील्ड ने तिलक की तरह छह वर्ष की सज़ा दी।
- 30 मार्च 1924
वैकोम सत्याग्रह आरम्भधर्म
त्रावणकोर में सत्याग्रहियों ने वैकोम महादेव मंदिर के चारों ओर की सड़कों पर वंचित वर्गों के चलने की रोक को चुनौती दी। बीस महीनों बाद तीन ओर की सड़कें खोल दी गईं।
- 7 मई 1924
कोय्यूरु में अल्लूरी सीताराम राजू की हत्याप्रतिरोध
1922 से गोदावरी एजेंसी की पहाड़ी जनजातियों को वन क़ानूनों के विरुद्ध लड़ाने वाले रम्पा विद्रोह के नायक को असम राइफ़ल्स ने पकड़कर गोली मार दी।
- 14 दिसंबर 1924
पेशावर में राज कपूर का जन्मसंस्कृति
अभिनेता और निर्देशक का जन्म पेशावर में हुआ। ‘आवारा’ जैसी फ़िल्मों ने हिन्दी सिनेमा को मॉस्को से काहिरा तक लोकप्रिय बनाया।
- 6 अगस्त 1925
‘राष्ट्रगुरु’ सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का निधनराजनीति
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का बैरकपुर में निधन। उन्होंने 1876 में इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की, दो बार कांग्रेस की अध्यक्षता की, और 1905 के बंग-भंग के विरुद्ध बंगाल के संघर्ष का नेतृत्व किया।
- 9 अगस्त 1925
काकोरी कांडप्रतिरोध
राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रान्तिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में रेल रोककर उसमें जा रहा सरकारी ख़ज़ाना ले लिया।
- 27 सितंबर 1925
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापनाराजनीति
विजयादशमी को डॉ. के. बी. हेडगेवार ने नागपुर में कुछ युवकों के साथ दैनिक शाखा पर आधारित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
- 23 नवंबर 1926
पुट्टपर्ती में सत्य साईं बाबा का जन्मधर्म
अनन्तपुर ज़िले में सत्यनारायण राजू का जन्म हुआ। उनके आश्रम प्रशान्ति निलयम में अनेक देशों से भक्त आते हैं, और उनके न्यासों ने सैकड़ों गाँवों तक पीने का पानी पहुँचाया।
- 24 नवंबर 1926
श्री अरविन्द का सिद्धि दिवसधर्म
जिसे उन्होंने अधिमानस का अवतरण कहा, उस अनुभूति के बाद श्री अरविन्द एकान्त में चले गए और उनके चारों ओर बने आश्रम का मार्गदर्शन श्री माँ को सौंप दिया।
- 20 मार्च 1927
चवदार तालाब पर महाड सत्याग्रहपुनर्निर्माण
डॉ. आम्बेडकर हज़ारों लोगों के साथ महाड के सार्वजनिक चवदार तालाब पर पहुँचे और पानी पिया, जिसका उपयोग अछूत कहे जाने वालों के लिए वर्जित था।
- 8 नवंबर 1927
कराची में लालकृष्ण आडवाणी का जन्मराजनीति
1990 की राम रथयात्रा के नेता का जन्म सिन्ध में हुआ। आगे वे उपप्रधानमंत्री बने।
- 19 दिसंबर 1927
बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला और रोशन सिंह को फाँसीप्रतिरोध
काकोरी कांड के लिए राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ को फ़ैज़ाबाद और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद में फाँसी दी गई। राजेन्द्र लाहिड़ी को दो दिन पहले गोंडा में फाँसी हुई थी।
- 28 फ़रवरी 1928
सी. वी. रामन ने रामन प्रभाव खोजाविज्ञान
कलकत्ता के इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस में रामन और के. एस. कृष्णन ने प्रकाश के उस प्रकीर्णन की पुष्टि की जो रामन के नाम से जाना जाता है। भारत यह दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाता है।
- 26 मई 1928
एम्स्टर्डम में हॉकी का पहला ओलम्पिक स्वर्णसंस्कृति
भारत ने फ़ाइनल में नीदरलैंड्स को 3–0 से हराया और पूरी प्रतियोगिता में एक भी गोल नहीं खाया। ध्यानचन्द सबसे अधिक गोल करने वाले रहे।
- 20 सितंबर 1928
शिवगिरि में श्री नारायण गुरु की समाधिधर्म
‘मनुष्य के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर’ का सन्देश देकर सबके लिए खुले मन्दिरों की प्रतिष्ठा करने वाले सन्त ने वर्कला के पास शिवगिरि में देह त्यागी।
- 17 नवंबर 1928
पुलिस लाठियों के बाद लाला लाजपत राय का निधनप्रतिरोध
30 अक्टूबर को लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध मौन जुलूस का नेतृत्व करते लाजपत राय पर पुलिस ने लाठियाँ बरसाईं और कुछ सप्ताह बाद उनका निधन हुआ। उन्होंने कहा था कि उन पर पड़ी लाठियाँ ब्रिटिश राज के ताबूत की कीलें बनेंगी।
- 8 अप्रैल 1929
केन्द्रीय असेम्बली में भगत सिंह के बमप्रतिरोध
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केन्द्रीय विधानसभा में दो हानिरहित बम फेंके, पर्चे उछाले, ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे लगाए और गिरफ़्तारी के लिए खड़े रहे।
- 13 सितंबर 1929
भूख हड़ताल में यतीन्द्रनाथ दास का बलिदानप्रतिरोध
राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल के 63वें दिन लाहौर जेल में जतिन दास का बलिदान हुआ। उनका शव कलकत्ता ले जाते समय मार्ग में लाखों लोग खड़े रहे।
- 31 दिसंबर 1929
लाहौर में पूर्ण स्वराज का प्रस्तावप्रतिरोध
रावी तट पर आधी रात को लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य घोषित कर तिरंगा फहराया। 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज दिवस घोषित किया गया, जो आगे गणतंत्र के लिए चुनी गई तिथि बनी।
- 1930
रामन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कारविज्ञान
प्रकाश के प्रकीर्णन पर कार्य के लिए सी. वी. रामन विज्ञान में नोबेल पाने वाले पहले एशियाई बने।
- 2 मार्च 1930
नाशिक में कालाराम मन्दिर प्रवेश सत्याग्रहपुनर्निर्माण
डॉ. आम्बेडकर हज़ारों लोगों को लेकर कालाराम मन्दिर पहुँचे, ताकि सभी हिन्दुओं के प्रवेश का अधिकार माँगा जा सके। मन्दिर के द्वार बन्द रहे और सत्याग्रह पाँच वर्ष चला।
- 12 मार्च 1930
दांडी यात्रा आरम्भप्रतिरोध
गांधी 78 साथियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक 385 किमी पैदल चले। 6 अप्रैल को तट पर मुट्ठी भर नमक उठाकर उन्होंने नमक क़ानून तोड़ा।
- 6 अप्रैल 1930
दांडी में गांधी जी ने नमक क़ानून तोड़ाप्रतिरोध
साबरमती से 24 दिन की यात्रा के बाद गांधी जी ने दांडी के तट पर प्राकृतिक नमक की डली उठाई। पूरे भारत में लाखों लोगों ने उनके पीछे नमक बनाया।
- 18 अप्रैल 1930
चटगाँव शस्त्रागार पर धावाप्रतिरोध
सूर्य सेन, मास्टरदा, के नेतृत्व में युवा क्रान्तिकारियों ने चटगाँव के पुलिस और सहायक शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा किया। कुछ दिन बाद वे जलालाबाद पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना से लड़े।
- 23 अप्रैल 1930
क़िस्सा ख़्वानी में गोलीबारी; गढ़वाल राइफ़ल्स ने गोली चलाने से मना कियाप्रतिरोध
पेशावर में सैनिकों ने निहत्थे ख़ुदाई ख़िदमतगारों पर गोली चलाई। चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में रॉयल गढ़वाल राइफ़ल्स की टुकड़ियों ने गोली चलाने से मना कर दिया और उनका कोर्ट-मार्शल हुआ।
- 21 मई 1930
धरासना नमक कारख़ाने पर सत्याग्रहियों की पिटाईप्रतिरोध
निहत्थे स्वयंसेवकों की एक के बाद एक टोली नमक कारख़ाने की ओर बढ़ी और पुलिस ने लाठियों से उन्हें गिरा दिया। वेब मिलर के समाचार ने यह दृश्य संसार तक पहुँचाया।
- 8 दिसंबर 1930
बिनय, बादल और दिनेश का राइटर्स बिल्डिंग पर धावाप्रतिरोध
तीन युवा क्रान्तिकारी बंगाल सरकार के मुख्यालय में घुसे, महानिरीक्षक सिम्पसन को गोली मारी और गलियारों में मुठभेड़ लड़ी। बाहर का चौक अब बी. बी. डी. बाग़ कहलाता है।
- 13 फ़रवरी 1931
नई दिल्ली राजधानी के रूप में उद्घाटितराजनीति
वायसराय इरविन ने रायसीना पहाड़ी पर एडविन लुटियन्स और हर्बर्ट बेकर के बनाए नए शहर का उद्घाटन किया, राजधानी बदलने की दरबारी घोषणा के बीस वर्ष बाद।
- 27 फ़रवरी 1931
अल्फ़्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आज़ाद का बलिदानप्रतिरोध
इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में पुलिस से घिरे आज़ाद अकेले लड़े और जीवित न पकड़े जाने का प्रण निभाते हुए अंतिम गोली स्वयं को मारी। यह पार्क अब चन्द्रशेखर आज़ाद पार्क है।
- 5 मार्च 1931
गांधी-इरविन समझौताराजनीति
सविनय अवज्ञा रोकी गई; हिंसा के आरोप से मुक्त बन्दी छोड़े गए और घरेलू उपयोग के लिए नमक बनाने की छूट मिली। गांधी जी लन्दन के गोलमेज़ सम्मेलन में जाने को राज़ी हुए।
- 14 मार्च 1931
पहली भारतीय बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’संस्कृति
अर्देशिर ईरानी की फ़िल्म बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा में लगी। इसका गीत ‘दे दे ख़ुदा के नाम पर’ किसी भारतीय फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड हुआ पहला गीत है।
- 23 मार्च 1931
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसीप्रतिरोध
तीनों को तय समय से एक दिन पहले लाहौर जेल में फाँसी दी गई और उनके शव चुपचाप सतलुज तट पर हुसैनीवाला में जला दिए गए। यह दिन शहीद दिवस है।
- 25 मार्च 1931
कानपुर दंगे में गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्याप्रतिरोध
‘प्रताप’ के सम्पादक दंगाग्रस्त कानपुर की गलियों में दोनों समुदायों के लोगों को बचाने निकले और भीड़ ने उनकी हत्या कर दी।
- 15 अक्टूबर 1931
रामेश्वरम में ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जन्मविज्ञान
रामनाथस्वामी मन्दिर के द्वीप पर एक नाविक के पुत्र का जन्म हुआ। उन्होंने एसएलवी-3 और अग्नि परियोजनाओं का नेतृत्व किया और भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति बने।
- 1 नवंबर 1931
गुरुवायूर सत्याग्रह आरम्भधर्म
के. केलप्पन ने गुरुवायूर मंदिर में सभी हिन्दुओं के प्रवेश के लिए सत्याग्रह का नेतृत्व किया; ए. के. गोपालन स्वयंसेवकों में थे। गांधी के आग्रह पर केलप्पन का उपवास समाप्त हुआ।
- अक्टूबर 1932
नागा पहाड़ियों में रानी गाइदिन्ल्यू गिरफ़्तारप्रतिरोध
हेराका आन्दोलन और अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध की सत्रह वर्षीय ज़ेलियांग्रोंग नेता पकड़ी गईं और आजीवन कारावास मिला। वे 1947 में ही मुक्त हुईं।
- 24 सितंबर 1932
पूना समझौताराजनीति
वंचित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन के विरुद्ध यरवदा जेल में गांधी के उपवास के बाद उन्होंने और डॉ. आम्बेडकर ने संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटों पर सहमति दी।
- 15 अक्टूबर 1932
जे. आर. डी. टाटा की पहली हवाई डाक उड़ानविज्ञान
एक इंजन वाले पस मॉथ विमान में जे. आर. डी. टाटा अहमदाबाद होते हुए कराची से बम्बई डाक लेकर उड़े; यह टाटा एयर लाइंस, आगे की एयर इंडिया, की पहली उड़ान थी।
- 12 जनवरी 1934
चटगाँव में सूर्य सेन को फाँसीप्रतिरोध
चटगाँव विद्रोह के नायक मास्टरदा सूर्य सेन को यातना के बाद तारकेश्वर दस्तीदार के साथ चटगाँव जेल में फाँसी दी गई।
- 15 जनवरी 1934
बिहार-नेपाल का भीषण भूकम्पराजनीति
लगभग 8 तीव्रता के भूकम्प ने उत्तर बिहार और नेपाल को हिलाया; दस हज़ार से अधिक लोग मरे और मुंगेर तथा काठमांडू का बड़ा भाग ढह गया।
- 8 जून 1936
ऑल इंडिया रेडियो का नामकरणसंस्कृति
इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम ऑल इंडिया रेडियो रखा गया। आगे चलकर इसका नाम आकाशवाणी हुआ।
- 12 नवंबर 1936
त्रावणकोर मंदिर प्रवेश घोषणाधर्म
अपने जन्मदिन पर त्रावणकोर के महाराजा चित्तिरा तिरुनाल ने राज्य के सभी मंदिर जन्म का भेद किए बिना हर हिन्दू के लिए खोल दिए।
- 13 मार्च 1940
ऊधम सिंह ने माइकल ओ’डायर को माराप्रतिरोध
लंदन के कैक्सटन हॉल में ऊधम सिंह ने जलियाँवाला बाग़ के समय पंजाब के गवर्नर सर माइकल ओ’डायर को गोली मारी। 31 जुलाई को पेंटनविल में उन्हें फाँसी दी गई।
- 21 जून 1940
नागपुर में डॉ. हेडगेवार का निधनराजनीति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक का निधन हुआ; मा. स. गोलवलकर, गुरुजी, सरसंघचालक बने।
- 17 अक्टूबर 1940
विनोबा भावे ने व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ कियाप्रतिरोध
गांधी जी द्वारा पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही चुने गए विनोबा ने पवनार में युद्ध के विरोध में भाषण दिया और चार दिन बाद गिरफ़्तार हुए।
- 17 जनवरी 1941
कलकत्ता से सुभाष बोस का निकल भागनाप्रतिरोध
एल्गिन रोड के घर में नज़रबंद सुभाषचन्द्र बोस पठान बीमा एजेंट के वेश में रात को निकले और काबुल होते हुए बर्लिन पहुँचे।
- 7 अगस्त 1941
जोड़ासाँको में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का निधनसंस्कृति
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का उसी घर में निधन हुआ जहाँ उनका जन्म हुआ था। बंगाल यह दिन पंचांग से ‘बाइशे श्रावण’ को मनाता है।
- 8 अगस्त 1942
ग्वालिया टैंक पर भारत छोड़ो प्रस्तावप्रतिरोध
बम्बई में कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। अगली सुबह तक नेता जेल में थे और देश उठ खड़ा हुआ; 9 अगस्त अगस्त क्रान्ति दिवस है।
- 14 अगस्त 1942
उषा मेहता का गुप्त कांग्रेस रेडियोप्रतिरोध
नेताओं के जेल में होने पर 22 वर्ष की छात्रा ने बम्बई में छिपे ट्रांसमीटरों से प्रसारण शुरू किया। नवम्बर में पुलिस के पकड़ने तक यह चलता रहा।
- 19 अगस्त 1942
बलिया ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कियाप्रतिरोध
भीड़ ने बलिया के अधिकारियों को बन्दी नेताओं को छोड़ने पर विवश किया, और सेना के लौटने तक कुछ दिन चित्तू पाण्डेय ने वहाँ राष्ट्रीय सरकार चलाई।
- 20 सितंबर 1942
गोहपुर में कनकलता बरुआ को गोलीप्रतिरोध
सत्रह वर्ष की कनकलता असम के गोहपुर थाने पर तिरंगा फहराने जुलूस लेकर गईं और ध्वज थामे हुए गोली खाकर बलिदान हुईं।
- 29 सितंबर 1942
तमलुक में मातंगिनी हाज़रा को गोलीप्रतिरोध
तिहत्तर वर्षीय मातंगिनी हाज़रा तिरंगा थामे तमलुक थाने की ओर भारत छोड़ो जुलूस का नेतृत्व करते हुए गोली से मारी गईं; गिरते समय भी ध्वज उनके हाथ में था।
- 1943
बंगाल का अकालराजनीति
युद्ध, बर्मा के चावल की हानि, जमाख़ोरी और निर्यात न रोकने व अनाज न मँगाने की सरकारी नीति से बंगाल में अकाल पड़ा; 20 से 30 लाख लोग मरे।
- 21 जनवरी 1943
सक्खर में हेमू कालाणी को फाँसीप्रतिरोध
भारत छोड़ो आन्दोलन में सैनिकों से भरी रेलगाड़ी को पटरी से उतारने का प्रयास करते पकड़े गए उन्नीस वर्षीय सिन्धी क्रान्तिकारी हेमू कालाणी को सक्खर जेल में फाँसी दी गई।
- 21 अक्टूबर 1943
नेताजी ने आज़ाद हिन्द सरकार की घोषणा कीप्रतिरोध
सिंगापुर में सुभाषचन्द्र बोस ने स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की और आज़ाद हिन्द फ़ौज तथा उसकी महिला टुकड़ी रानी झाँसी रेजिमेंट का नेतृत्व किया।
- 16 फ़रवरी 1944
नाशिक में दादासाहेब फाल्के का देहावसानसंस्कृति
‘राजा हरिश्चन्द्र’ और ‘लंका दहन’ के निर्माता, भारतीय सिनेमा के जनक, का नाशिक में देहान्त हुआ। सिनेमा में आजीवन योगदान का राष्ट्रीय सम्मान उन्हीं के नाम पर है।
- 22 फ़रवरी 1944
पुणे में बन्दी रहते कस्तूरबा गांधी का देहान्तप्रतिरोध
भारत छोड़ो आन्दोलन में बन्दी बनाई गई कस्तूरबा का आग़ा ख़ान महल में गांधी जी के सामने देहान्त हुआ। उनकी समाधि वहीं परिसर में है।
- 14 अप्रैल 1944
मोइरांग में आज़ाद हिन्द फ़ौज का तिरंगाप्रतिरोध
आज़ाद हिन्द फ़ौज के कर्नल शौकत मलिक ने मणिपुर के मोइरांग में राष्ट्रीय ध्वज फहराया, जो आज़ाद हिन्द फ़ौज द्वारा लिया गया पहला भारतीय भू-भाग था।
- नवंबर 1945
लाल क़िले में आज़ाद हिन्द फ़ौज पर मुक़दमेप्रतिरोध
शाहनवाज़ ख़ाँ, प्रेम सहगल और गुरबख़्श सिंह ढिल्लों पर लाल क़िले में राजद्रोह का मुक़दमा चला। देश उनके समर्थन में उठ खड़ा हुआ और उनकी सज़ाएँ माफ़ हुईं।
- 18 अगस्त 1945
ताइपे विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की सूचनाप्रतिरोध
जापानी सूत्रों ने बताया कि ताइहोकू (ताइपे) में विमान दुर्घटना के बाद जलने से सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु हुई। दशकों तक संदेह बना रहा और कई जाँचें हुईं।
- 18 फ़रवरी 1946
बम्बई में रॉयल इंडियन नेवी के नौसैनिकों का विद्रोहप्रतिरोध
एचएमआईएस तलवार के नौसैनिकों ने हड़ताल आरम्भ की जो लगभग अठहत्तर जहाज़ों और बीस तटीय ठिकानों तक फैली। ब्रिटिश नेताओं ने समझ लिया कि अब भारतीय सेनाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
- 16 अगस्त 1946
कलकत्ता में डायरेक्ट एक्शन डे की हत्याएँराजनीति
पाकिस्तान के लिए मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन के आह्वान से कलकत्ता में चार दिन हत्याएँ हुईं, जिनमें हज़ारों हिन्दू और मुसलमान मारे गए। अक्टूबर में हिंसा नोआखाली और फिर बिहार तक फैली।
- 10 अक्टूबर 1946
नोआखाली में हत्याकाण्ड आरम्भराजनीति
कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दिन पूर्वी बंगाल के नोआखाली और टिप्पेरा में भीड़ ने हिन्दुओं पर हमले किए; हज़ारों मारे गए या बलपूर्वक धर्मान्तरित किए गए। गांधी जी चार महीने गाँव-गाँव पैदल घूमे।
- 9 दिसंबर 1946
संविधान सभा की पहली बैठकराजनीति
नई दिल्ली में संसद के केन्द्रीय कक्ष में संविधान सभा की बैठक हुई; दो दिन बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसके स्थायी अध्यक्ष चुने गए।
- 20 अप्रैल 1947
इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा का देहावसानसंस्कृति
राजपूताने के इतिहासकार का सिरोही के रोहिड़ा में देहान्त हुआ। उनकी ‘भारतीय प्राचीन लिपिमाला’ ने हिन्दी पाठकों को पहली बार ब्राह्मी और पुरानी लिपियाँ पढ़ना सिखाया।
- 3 जून 1947
माउंटबेटन ने विभाजन योजना घोषित कीराजनीति
वायसराय ने घोषणा की कि ब्रिटिश भारत दो उपनिवेशों, भारत और पाकिस्तान, में बँटेगा और सत्ता हस्तांतरण की तिथि आगे खींचकर अगस्त कर दी गई।
- 18 जुलाई 1947
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को शाही स्वीकृतिराजनीति
ब्रिटिश संसद के इस अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश शासन समाप्त किया और रियासतों को विलय का चुनाव करने दिया।
- 22 जुलाई 1947
संविधान सभा ने राष्ट्रध्वज अपनायाराजनीति
केसरिया, सफ़ेद और हरे रंग का तिरंगा, बीच में नीले अशोक चक्र के साथ, स्वतंत्र भारत के ध्वज के रूप में अपनाया गया।
- 14 अगस्त 1947
आधी रात ‘नियति से साक्षात्कार’राजनीति
संविधान सभा में आधी रात निकट आते नेहरू ने भाषण दिया और सत्ता भारत को सौंपी गई। उसी दिन पाकिस्तान अस्तित्व में आया।
15 · स्वतन्त्र भारत1947 ई.–आज
- 28 जून 1921
लक्नेपल्ली में पी. वी. नरसिम्हा राव का जन्मराजनीति
अनेक भाषाओं के जानकार विद्वान राजनेता का जन्म वरंगल ज़िले में हुआ। 1991 में प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था खोली।
- 8 सितंबर 1926
सदिया में भूपेन हज़ारिका का जन्मसंस्कृति
असम के गायक और संगीतकार का जन्म सदिया में हुआ। ब्रह्मपुत्र पर उनके गीत असमिया संगीत को पूरे भारत तक ले गए।
- 15 अगस्त 1947
भारत स्वतंत्र हुआराजनीति
आधी रात को संविधान सभा ने सत्ता सँभाली और सुबह दिल्ली में तिरंगा फहराया गया। साथ ही विभाजन आया: पंजाब और बंगाल बँटे, एक करोड़ से कहीं अधिक लोग उजड़े और लाखों मारे गए।
- 26 अक्टूबर 1947
महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय कियाराजनीति
पाकिस्तान से आए क़बायली हमलावरों के बारामूला लूटने और श्रीनगर के निकट पहुँचने पर जम्मू-कश्मीर के शासक ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। अगली सुबह भारतीय सेना श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरी।
- 27 अक्टूबर 1947
श्रीनगर में भारतीय सेना उतरीयुद्ध
विलय के अगले दिन 1 सिख बटालियन को विमान से श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतारा गया और उसने हमलावरों को नगर से पहले रोक दिया। सेना यह दिन पैदल सेना दिवस के रूप में मनाती है।
- 13 नवंबर 1947
सरदार पटेल का सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्पपुनर्निर्माण
प्रभास पाटन के खंडहरों में खड़े होकर सरदार पटेल ने घोषणा की कि सोमनाथ मंदिर फिर बनेगा। के. एम. मुंशी ने यह कार्य सँभाला।
- 30 जनवरी 1948
महात्मा गांधी की हत्याराजनीति
दिल्ली के बिड़ला भवन में संध्या प्रार्थना को जाते समय नाथूराम गोडसे ने गांधी को गोली मारी। भारत यह दिन शहीद दिवस के रूप में मनाता है।
- 24 मई 1948
लेह में डकोटा उतरायुद्ध
गिलगित और स्कर्दू से हमलावर सिंधु के साथ बढ़ रहे थे, तब एयर कमोडोर मेहर सिंह ने लेह की कच्ची पट्टी पर डकोटा उतारा, इतनी ऊँचाई पर जहाँ पहले कोई मालवाहक विमान नहीं उतरा था। इसके बाद हवाई मार्ग से सैनिक और हथियार पहुँचे, और लद्दाख बचा रहा।
- 13 सितंबर 1948
ऑपरेशन पोलो: हैदराबाद भारत मेंराजनीति
भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया, जहाँ निज़ाम की रज़ाकार सेना ने गाँवों में आतंक फैला रखा था। चार दिन में निज़ाम ने आत्मसमर्पण किया और राज्य भारत में मिल गया।
- 4 नवंबर 1948
आम्बेडकर ने संविधान का प्रारूप प्रस्तुत कियाराजनीति
प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आम्बेडकर ने संविधान सभा में प्रारूप रखा, जिससे एक वर्ष की धारा-दर-धारा बहस शुरू हुई।
- 2 मार्च 1949
लखनऊ में सरोजिनी नायडू का देहान्तराजनीति
भारत की पहली महिला राज्यपाल का संयुक्त प्रान्त की राज्यपाल रहते हुए लखनऊ के राजभवन में देहान्त हुआ।
- 26 नवंबर 1949
भारत का संविधान अंगीकृतराजनीति
लगभग तीन वर्ष की बहस के बाद संविधान सभा ने संविधान अंगीकार किया। इसकी हाथ से लिखी मूल प्रति में नन्दलाल बोस के बनाए श्रीराम, श्रीकृष्ण और भारतीय इतिहास के चित्र हैं।
- 7 दिसंबर 1949
पहला सशस्त्र सेना झण्डा दिवसयुद्ध
भारत ने यह दिन छोटे झण्डे बेचकर सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए धन जुटाने को निश्चित किया।
- 23 दिसंबर 1949
अयोध्या के ढाँचे में रामलला की मूर्तियाँ प्रकटधर्म
22–23 दिसंबर की रात बाबरी ढाँचे के केन्द्रीय गुम्बद के नीचे रामलला की मूर्तियाँ रख दी गईं। प्रशासन ने द्वार पर ताला लगा दिया और जाली के बाहर से पूजा चलती रही।
- 26 जनवरी 1950
भारत गणराज्य बनाराजनीति
संविधान लागू हुआ, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने और पहली गणतंत्र दिवस परेड हुई।
- 6 मार्च 1950
पटना में सच्चिदानन्द सिन्हा का निधनराजनीति
सच्चिदानन्द सिन्हा, जिन्होंने 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक की अध्यक्षता की और बिहार को बंगाल से अलग कराने के लिए काम किया, संविधान लागू होने के छह सप्ताह बाद पटना में दिवंगत हुए।
- 14 अप्रैल 1950
रमण महर्षि की महासमाधिधर्म
भगवान रमण महर्षि ने तिरुवण्णामलै में देह त्यागी। उपस्थित अनेक लोगों ने उसी क्षण एक चमकीले तारे को अरुणाचल की ओर जाते देखने की बात कही।
- 5 दिसंबर 1950
श्री अरविन्द का देहावसानधर्म
पांडिचेरी में श्री अरविन्द का देहावसान हुआ। आश्रम के अभिलेख कहते हैं कि उनका शरीर चार दिन से अधिक बिना विकार के रहा, फिर आँगन की समाधि में रखा गया।
- 15 दिसंबर 1950
बम्बई में सरदार पटेल का निधनराजनीति
560 से अधिक रियासतों को संघ में मिलाने वाले लौहपुरुष का दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ।
- 4 मार्च 1951
नई दिल्ली में पहले एशियाई खेल आरम्भसंस्कृति
ग्यारह देशों के खिलाड़ी दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम में उतरे। पदक तालिका में भारत जापान के बाद दूसरे स्थान पर रहा।
- 11 मई 1951
सोमनाथ की पुनः प्राण-प्रतिष्ठापुनर्निर्माण
राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने प्रभास पाटन के पुनर्निर्मित मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। उन्होंने कहा कि पुनर्निर्माण की शक्ति सदा विनाश की शक्ति से बड़ी होती है।
- 25 अक्टूबर 1951
पहला आम चुनाव आरम्भराजनीति
सार्वभौम वयस्क मताधिकार पर पहले आम चुनाव का मतदान हिमाचल प्रदेश में आरम्भ हुआ। लगभग 17 करोड़ लोग मतदाता थे और मतदान फ़रवरी 1952 तक चला।
- 13 मई 1952
आम चुनाव के बाद पहली संसद की बैठकराजनीति
पहली निर्वाचित लोकसभा और राज्यसभा की पहली बैठकें हुईं। दो दिन बाद गणेश वासुदेव मावलंकर अध्यक्ष चुने गए।
- 19 अक्टूबर 1952
पोट्टि श्रीरामुलु का आन्ध्र के लिए अनशनराजनीति
श्रीरामुलु ने तेलुगु राज्य के लिए मद्रास में आमरण अनशन शुरू किया। 58वें दिन उनका देहान्त हुआ और कुछ ही दिनों में आन्ध्र राज्य की घोषणा हुई।
- 29 मई 1953
तेनज़िंग नोर्गे और हिलेरी एवरेस्ट के शिखर परसंस्कृति
दार्जिलिंग के तेनज़िंग और एडमंड हिलेरी सागरमाथा के शिखर पर पहुँचे, जहाँ पहुँचने वाले वे पहले ज्ञात पर्वतारोही थे। तेनज़िंग ने बर्फ़ में मिठाई का भोग रखा।
- 23 जून 1953
कश्मीर में हिरासत में श्यामाप्रसाद मुखर्जी का निधनराजनीति
जम्मू-कश्मीर के अलग दर्जे के विरुद्ध आन्दोलन में बिना परमिट प्रवेश करने पर गिरफ़्तार मुखर्जी का श्रीनगर में हिरासत में निधन हुआ।
- 1 अक्टूबर 1953
आन्ध्र राज्य का गठनराजनीति
मद्रास राज्य के तेलुगु ज़िले कुर्नूल को राजधानी बनाकर आन्ध्र राज्य बने; भाषा के आधार पर बना यह पहला राज्य है।
- 2 जनवरी 1954
भारत रत्न की स्थापनाराजनीति
राष्ट्रपति ने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न और साथ ही पद्म पुरस्कार स्थापित किए। उसी वर्ष सी. राजगोपालाचारी, एस. राधाकृष्णन और सी. वी. रमन इसके पहले पात्र बने।
- 3 फ़रवरी 1954
प्रयाग कुम्भ में भगदड़धर्म
स्वतंत्र भारत के पहले कुम्भ में मौनी अमावस्या को संगम पर भगदड़ में कई सौ तीर्थयात्री मारे गए।
- 2 अगस्त 1954
दादरा और नगर हवेली पुर्तगाल से मुक्तराजनीति
स्वयंसेवकों ने सिलवासा पर अधिकार कर इस अन्तःक्षेत्र में पुर्तगाली शासन समाप्त किया। 1961 में यह भारतीय संघ में मिला।
- 18 मई 1955
हिन्दू विवाह अधिनियम पारितराजनीति
हिन्दू कोड का पहला क़ानून लागू हुआ; 1956 में उत्तराधिकार, दत्तक-ग्रहण और संरक्षकता के अधिनियम आए।
- 14 अक्टूबर 1956
नागपुर में डॉ. आम्बेडकर की बौद्ध दीक्षाधर्म
विजयादशमी को दीक्षाभूमि पर आम्बेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की शरण ली। सात सप्ताह बाद, 6 दिसंबर को, उनका निधन हुआ।
- 1 नवंबर 1956
भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठनराजनीति
राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने भारत का मानचित्र चौदह राज्यों और छह केन्द्रशासित प्रदेशों में फिर बनाया।
- 20 दिसंबर 1956
सन्त गाडगे बाबा का देहावसानपुनर्निर्माण
महाराष्ट्र के घुमन्तू कीर्तनकार, जो कीर्तन से पहले गाँव की गलियाँ बुहारते थे और तीर्थों में धर्मशालाएँ बनवाते थे, का अमरावती के पास देहान्त हुआ।
- 10 जून 1957
अमृतसर में भाई वीर सिंह का देहावसानसंस्कृति
पंजाबी साहित्य में नई जान फूँकने वाले कवि और विद्वान, ‘राणा सूरत सिंह’ के रचयिता, का अमृतसर में देहान्त हुआ।
- 31 मार्च 1959
दलाई लामा भारत पहुँचेधर्म
चीनी सेना से बचकर चौदहवें दलाई लामा खेंज़ीमाने से अरुणाचल में आए और उन्हें शरण दी गई। निर्वासित तिब्बती सरकार धर्मशाला में बसी।
- 15 सितंबर 1959
दिल्ली में दूरदर्शन का आरम्भसंस्कृति
दिल्ली के आकाशवाणी भवन के एक छोटे स्टूडियो से प्रायोगिक टेलीविज़न सेवा शुरू हुई। अट्ठाईस वर्ष बाद इसके ‘रामायण’ के समय सड़कें सूनी हो जाती थीं।
- 27 अप्रैल 1960
बांग्ला में इतिहास-ग्रन्थ कहने वाले राजशेखर बसु का निधनसंस्कृति
रसायनविद्, कोशकार और ‘परशुराम’ नाम से हास्य-लेखक राजशेखर बसु का कलकत्ता में निधन। वाल्मीकि रामायण (1946) और महाभारत (1949) के उनके बांग्ला गद्य रूपान्तर आज भी बंगाली घरों में पढ़े जाते हैं।
- 4 मार्च 1961
भारत का पहला विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रान्तयुद्ध
बेलफ़ास्ट में यह विमानवाहक पोत भारतीय नौसेना में शामिल हुआ। 1971 में इसके विमानों ने पूर्वी पाकिस्तान के बन्दरगाहों की नाकाबन्दी की।
- 19 दिसंबर 1961
गोवा मुक्तराजनीति
ऑपरेशन विजय ने लगभग दो दिन में गोवा, दमन और दीव में 451 वर्ष का पुर्तगाली शासन समाप्त किया। यह दिन गोवा मुक्ति दिवस है।
- 20 अक्टूबर 1962
चीन का हिमालय पार आक्रमणयुद्ध
चीनी सेनाओं ने लद्दाख और पूर्वोत्तर सीमा पर हमला किया। 18 नवंबर को रेज़ांग ला में मेजर शैतान सिंह की टुकड़ी लगभग अंतिम सैनिक तक लड़ी। 21 नवंबर को चीन ने युद्धविराम घोषित किया।
- 14 जुलाई 1963
ऋषिकेश में स्वामी शिवानन्द की महासमाधिधर्म
डॉक्टर से संन्यासी बने, डिवाइन लाइफ़ सोसाइटी के संस्थापक ने गंगा तट पर अपने आश्रम में देह त्यागी।
- 21 नवंबर 1963
थुम्बा से पहला रॉकेटविज्ञान
तिरुवनन्तपुरम के पास थुम्बा से नाइक-अपाचे साउंडिंग रॉकेट छोड़ा गया, जहाँ एक चर्च ने पहली कार्यशाला के लिए अपना भवन दिया था। भारत का अन्तरिक्ष कार्यक्रम यहीं से शुरू हुआ।
- 1 दिसंबर 1963
नागालैण्ड राज्य बनाराजनीति
राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कोहिमा में नागालैण्ड का उद्घाटन संघ के 16वें राज्य के रूप में किया।
- 27 मई 1964
दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू का देहान्तराजनीति
भारत के पहले प्रधानमंत्री का सत्रह वर्ष पद पर रहने के बाद दिल का दौरा पड़ने से देहान्त हुआ।
- 29 अगस्त 1964
विश्व हिन्दू परिषद की स्थापनाधर्म
जन्माष्टमी को बम्बई के सांदीपनि आश्रम में स्वामी चिन्मयानन्द और मा. स. गोलवलकर सहित संतों और नेताओं ने विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की।
- 6 सितंबर 1965
भारत ने लाहौर की ओर बढ़त कीयुद्ध
पाकिस्तान के ऑपरेशन जिब्राल्टर और अखनूर पर बख़्तरबंद हमले के बाद भारतीय सेना ने पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की। असल उत्तर में हवलदार अब्दुल हमीद ने वीरगति से पहले कई पैटन टैंक नष्ट किए। 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र का युद्धविराम हुआ।
- 10 जनवरी 1966
ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षरराजनीति
लाल बहादुर शास्त्री और अयूब ख़ान ने 1965 के युद्ध को समाप्त करने वाली घोषणा पर हस्ताक्षर किए; दोनों सेनाएँ अगस्त 1965 से पहले की जगहों पर लौटेंगी। उसी रात शास्त्री जी का ताशकंद में देहान्त हुआ।
- 11 जनवरी 1966
ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री का निधनराजनीति
पाकिस्तान के साथ ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर के कुछ घंटे बाद ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री का ताशकंद में निधन हुआ।
- 7 नवंबर 1966
दिल्ली में गोरक्षा आन्दोलन पर गोलीबारीधर्म
गोहत्या पर राष्ट्रीय प्रतिबन्ध की माँग लेकर साधुओं और नागरिकों का विशाल समूह संसद की ओर बढ़ा। पुलिस ने गोली चलाई और कई प्रदर्शनकारी मारे गए।
- 12 अक्टूबर 1967
दिल्ली में राममनोहर लोहिया का देहान्तराजनीति
समाजवादी नेता, जिन्होंने राम, कृष्ण और शिव को भारतीय जन के आदर्श के रूप में लिखा, का शल्यक्रिया के बाद देहान्त हुआ।
- 11 फ़रवरी 1968
मुग़लसराय में दीनदयाल उपाध्याय मृत पाए गएराजनीति
भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष और एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय मुग़लसराय जंक्शन पर पटरियों के पास मृत पाए गए। वह स्टेशन अब उन्हीं के नाम पर है।
- 19 जुलाई 1969
चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरणराजनीति
अध्यादेश से सरकार ने चौदह सबसे बड़े व्यावसायिक बैंक अपने हाथ में ले लिए, जिनमें देश की अधिकांश जमा-राशि थी।
- 15 अगस्त 1969
इसरो की स्थापनाविज्ञान
विक्रम साराभाई के नेतृत्व में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन बना, जिसने 1962 में बनी अंतरिक्ष अनुसंधान की राष्ट्रीय समिति का स्थान लिया।
- 2 सितंबर 1970
विवेकानन्द शिला स्मारक का उद्घाटनधर्म
कन्याकुमारी के पास जिस शिला पर विवेकानन्द ने दिसंबर 1892 में ध्यान किया था, वहाँ एकनाथ रानडे के देशव्यापी संग्रह से बने स्मारक का राष्ट्रपति वी. वी. गिरि ने उद्घाटन किया।
- 16 दिसंबर 1971
ढाका में पाकिस्तान का आत्मसमर्पण, बांग्लादेश का जन्मयुद्ध
युद्ध आरम्भ होने के तेरह दिन बाद ले. जन. ए. ए. के. नियाज़ी ने ले. जन. जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर किए और लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाले। भारत यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाता है।
- 21 जनवरी 1972
मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा राज्य बनेराजनीति
पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम के अन्तर्गत मणिपुर और त्रिपुरा के पुराने राज्य तथा मेघालय की खासी-जयन्तिया-गारो पहाड़ियाँ पूर्ण राज्य बनीं।
- 2 जुलाई 1972
शिमला समझौताराजनीति
इंदिरा गांधी और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने तय किया कि भारत और पाकिस्तान अपने विवाद आपस में सुलझाएँगे; कश्मीर की युद्धविराम रेखा नियंत्रण रेखा बनी।
- 24 अप्रैल 1973
केशवानन्द भारती निर्णय: मूल ढाँचाराजनीति
केरल के एडनीर मठ के प्रमुख की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया कि संसद संविधान का मूल ढाँचा नहीं बदल सकती।
- 26 मार्च 1974
गौरा देवी और महिलाओं ने रैणी का वन बचायापुनर्निर्माण
चमोली के रैणी गाँव में गौरा देवी और गाँव की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर ठेकेदार के आदमियों को रोका। चिपको आन्दोलन पूरे हिमालय में फैल गया।
- 18 मई 1974
मुस्कुराते बुद्ध: पोखरण-1विज्ञान
बुद्ध पूर्णिमा को भारत ने थार मरुस्थल के पोखरण में भूमिगत पहला परमाणु परीक्षण किया।
- 19 अप्रैल 1975
भारत का पहला उपग्रह आर्यभट प्रक्षेपितविज्ञान
कुसुमपुर के गणितज्ञ के नाम पर बना इसरो का उपग्रह कपुस्तिन यार से सोवियत रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित हुआ। इसका चित्र दो रुपये के नोट पर छपा।
- 16 मई 1975
सिक्किम भारत का राज्य बनाराजनीति
जनमत संग्रह में सिक्किम की जनता द्वारा चोग्याल शासन समाप्त करने के मत के बाद सिक्किम संघ का बाईसवाँ राज्य बना।
- 12 जून 1975
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कियाराजनीति
राज नारायण की याचिका पर न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने प्रधानमंत्री को चुनावी कदाचार का दोषी पाया। तेरह दिन बाद आपातकाल घोषित हुआ।
- 25 जून 1975
आपातकाल की घोषणाराजनीति
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनका चुनाव रद्द करने के दो सप्ताह बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगवाया। विपक्षी नेता जेल में डाले गए, प्रेस पर सेंसर लगा और इक्कीस महीने नागरिक अधिकार निलम्बित रहे।
- 21 मार्च 1977
आपातकाल हटाराजनीति
चुनाव परिणाम आते ही आपातकाल हटा लिया गया। जनता पार्टी जीती और मोरारजी देसाई पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
- 14 नवंबर 1977
वृन्दावन में श्रील प्रभुपाद का देहत्यागधर्म
इस्कॉन के संस्थापक ने कृष्ण-बलराम मन्दिर में देह त्यागी; ग्यारह वर्षों में उन्होंने विदेशों में सौ से अधिक मन्दिर खोले थे।
- 6 अप्रैल 1980
भारतीय जनता पार्टी की स्थापनाराजनीति
पूर्व जनसंघ सदस्यों ने दिल्ली में भाजपा की स्थापना की; अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने।
- 18 जुलाई 1980
एसएलवी-3 ने रोहिणी को कक्षा में पहुँचायाविज्ञान
श्रीहरिकोटा से ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में इसरो के अपने रॉकेट एसएलवी-3 ने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में पहुँचाया।
- 19 जून 1981
भारत का पहला संचार उपग्रह ‘एप्पल’विज्ञान
यह प्रायोगिक उपग्रह कूरू से एरियान रॉकेट पर उड़ा। एंटीना परीक्षण के लिए इंजीनियर इसे बैलगाड़ी पर ले गए थे, यह चित्र प्रसिद्ध है।
- 20 नवंबर 1981
भास्कर-2 का प्रक्षेपणविज्ञान
भास्कराचार्य के नाम पर रखा गया भारत का दूसरा पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह सोवियत रॉकेट से अन्तरिक्ष में गया।
- 27 अगस्त 1982
श्री आनन्दमयी माँ का देहत्यागधर्म
बंगाल की सन्त ने देहरादून के पास किशनपुर में देह त्यागी। उनकी समाधि हरिद्वार के कनखल आश्रम में है।
- 30 अगस्त 1983
स्पेस शटल से इनसैट-1बी का प्रक्षेपणविज्ञान
चैलेंजर से ऊपर ले जाया गया इनसैट-1बी वह उपग्रह बना जिसने पूरे देश में राष्ट्रीय टेलीविज़न और मौसम के चित्र पहुँचाए।
- 3 अप्रैल 1984
राकेश शर्मा अंतरिक्ष मेंविज्ञान
स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा सोयुज़ टी-11 से सल्यूत 7 स्टेशन गए। अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, पूछने पर उन्होंने इक़बाल की पंक्ति ‘सारे जहाँ से अच्छा’ से उत्तर दिया।
- 31 अक्टूबर 1984
इंदिरा गांधी की हत्या, दिल्ली में सिखों का नरसंहारराजनीति
हरमंदिर साहिब में ऑपरेशन ब्लू स्टार के कुछ महीने बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने गोली मारी। अगले दिनों दिल्ली और अन्य नगरों में भीड़ ने हज़ारों सिखों की हत्या की।
- 3 दिसंबर 1984
भोपाल गैस त्रासदीराजनीति
2–3 दिसंबर की रात भोपाल के यूनियन कार्बाइड कीटनाशक संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट रिसी। कुछ ही दिनों में हज़ारों मरे और लाखों प्रभावित हुए।
- 1 फ़रवरी 1986
राम जन्मभूमि के ताले खुलेधर्म
फ़ैज़ाबाद के ज़िला न्यायाधीश ने राम जन्मभूमि के द्वारों के ताले खोलने का आदेश दिया, जिससे भीतर रामलला के दर्शन होने लगे।
- 25 जनवरी 1987
दूरदर्शन पर रामानन्द सागर की रामायण आरम्भसंस्कृति
टेलीविज़न रामायण का रविवार प्रसारण आरम्भ हुआ; परिवार टीवी के सामने जुटते और गलियाँ सूनी हो जातीं, बहुत से लोग धूप और फूल लेकर बैठते। अक्टूबर 1988 से बी. आर. चोपड़ा का महाभारत आया।
- 20 फ़रवरी 1987
अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम राज्य बनेराजनीति
पूर्वोत्तर के दोनों केन्द्रशासित प्रदेश एक ही दिन पूर्ण राज्य बने: मिज़ोरम संघ का 23वाँ और अरुणाचल 24वाँ राज्य।
- 25 फ़रवरी 1988
पृथ्वी प्रक्षेपास्त्र का पहला परीक्षणविज्ञान
समन्वित निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम का पहला प्रक्षेपास्त्र श्रीहरिकोटा से उड़ा। इसी कार्यक्रम से आगे अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग बने।
- 17 मार्च 1988
आईआरएस-1ए, पहला भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रहविज्ञान
बैकोनूर से सोवियत रॉकेट पर छोड़ा गया आईआरएस-1ए कक्षा से भारत की फ़सलों, वनों और जल-स्रोतों का मानचित्रण करने लगा।
- 22 मई 1989
चांदीपुर से अग्नि प्रक्षेपास्त्र की पहली उड़ानविज्ञान
पहला अग्नि प्रौद्योगिकी प्रदर्शक ओडिशा तट के परीक्षण क्षेत्र से छोड़ा गया, जिससे भारत की लम्बी दूरी के प्रक्षेपास्त्रों की शृंखला खुली।
- 9 नवंबर 1989
राम मंदिर का शिलान्यासधर्म
लाखों गाँवों में राम शिला पूजन के बाद कामेश्वर चौपाल ने अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखी।
- 19 जनवरी 1990
कश्मीरी पंडितों का पलायनधर्म
आतंकवादियों की महीनों की चुनिंदा हत्याओं और धमकियों के बाद कश्मीर घाटी के पंडित बड़ी संख्या में भागे, अधिकतर 19 जनवरी के आसपास के सप्ताहों में। लाखों आज भी निर्वासन में हैं।
- 25 सितंबर 1990
सोमनाथ से रथयात्रा आरम्भधर्म
लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा सोमनाथ से अयोध्या के लिए निकली। 23 अक्टूबर को बिहार में उसे रोका गया और आडवाणी गिरफ़्तार हुए।
- 2 नवंबर 1990
अयोध्या में कारसेवकों पर गोलीबारीधर्म
30 अक्टूबर और फिर 2 नवंबर को अयोध्या में पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चलाई; मारे गए लोगों में कलकत्ता के कोठारी बंधु भी थे।
- 21 मई 1991
श्रीपेरुम्बुदूर में राजीव गांधी की हत्याराजनीति
तमिलनाडु की एक चुनावी सभा में लिट्टे की आत्मघाती हमलावर ने पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या कर दी।
- 24 जुलाई 1991
आर्थिक सुधारों ने अर्थव्यवस्था खोलीराजनीति
विदेशी मुद्रा भंडार कुछ ही सप्ताह के आयात लायक़ बचा था; प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव के अधीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के बजट ने लाइसेंस राज समाप्त किया।
- 23 अप्रैल 1992
कलकत्ता में सत्यजित राय का देहावसानसंस्कृति
अपु त्रयी के निर्देशक का देहान्त मानद ऑस्कर और भारत रत्न पाने के कुछ ही सप्ताह बाद हुआ।
- 6 दिसंबर 1992
अयोध्या में बाबरी ढाँचा ध्वस्तधर्म
लाखों की संख्या में जुटे कारसेवकों ने बाबरी ढाँचा गिरा दिया। उसी स्थान पर रामलला का अस्थायी मंदिर बना; कई नगरों में दंगे हुए।
- 8 जनवरी 1994
कांची परमाचार्य की सिद्धिधर्म
कांची के परमाचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती ने 87 वर्ष शंकराचार्य रहने के बाद 99 वर्ष की आयु में देह त्यागी।
- 19 मार्च 1998
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लीराजनीति
वाजपेयी ने राजग गठबन्धन के प्रमुख के रूप में पद सँभाला। दो महीने के भीतर उनकी सरकार ने पोखरण-2 परीक्षण किए।
- 11 मई 1998
पोखरण-2 परमाणु परीक्षणविज्ञान
भारत ने पोखरण में तीन परमाणु परीक्षण किए और 13 मई को दो और, तथा स्वयं को परमाणु शस्त्र सम्पन्न राष्ट्र घोषित किया। 11 मई राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस है।
- 26 जुलाई 1999
कारगिल युद्ध में विजययुद्ध
भारतीय थल और वायु सेना ने कारगिल, तोलोलिंग और टाइगर हिल की ऊँचाइयों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा। कैप्टन विक्रम बत्रा और 500 से अधिक सैनिकों ने बलिदान दिया; यह दिन कारगिल विजय दिवस है।
- 24 दिसंबर 1999
इंडियन एयरलाइंस आईसी-814 का अपहरणराजनीति
काठमाण्डू से दिल्ली जा रही उड़ान का अपहरण कर उसे कन्धार ले जाया गया। एक सप्ताह बाद यात्रियों के बदले जेल में बन्द तीन आतंकवादी छोड़े गए।
- 19 सितंबर 2000
सिडनी में कर्णम मल्लेश्वरी का ओलम्पिक कांस्यसंस्कृति
69 किलो वर्ग में भार उठाकर आन्ध्र की भारोत्तोलक ओलम्पिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।
- 24 दिसंबर 2000
विश्वनाथन आनन्द विश्व शतरंज विजेता बनेसंस्कृति
तेहरान में फ़ाइनल में अलेक्सेई शिरोव को हराकर आनन्द शतरंज के पहले भारतीय विश्व विजेता बने, उस खेल में जो भारत में चतुरंग के रूप में जन्मा।
- 4 जनवरी 2001
तेजस लड़ाकू विमान की पहली उड़ानविज्ञान
हल्का लड़ाकू विमान, जिसे बाद में तेजस नाम मिला, बेंगलुरु से पहली बार उड़ा। एचएफ़-24 मरुत के बाद भारत में रचा और बना यह पहला लड़ाकू विमान है।
- 13 दिसंबर 2001
संसद पर आतंकी हमलायुद्ध
पाँच हथियारबंद आतंकवादियों ने नई दिल्ली में संसद भवन पर हमला किया; सुरक्षाकर्मियों ने भीतर घुसने से पहले सबको मार गिराया और आठ सुरक्षाकर्मी तथा एक माली मारे गए।
- 27 फ़रवरी 2002
गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस जलाई गईधर्म
अयोध्या से कारसेवकों को लौटा रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे एस-6 में गोधरा में आग लगाई गई; 59 लोग, जिनमें बहुत सी स्त्रियाँ और बच्चे थे, जलकर मरे। इसके बाद गुजरात भर में साम्प्रदायिक दंगे हुए।
- मार्च–अगस्त 2003
ASI ने राम जन्मभूमि पर खुदाई कीविज्ञान
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने विवादित स्थल की खुदाई की। उसकी रिपोर्ट मस्जिद के नीचे 12वीं शताब्दी के स्तम्भों वाले बड़े ढाँचे का वर्णन करती है।
- 29 अक्टूबर 2005
दीवाली की पूर्व संध्या पर दिल्ली में शृंखलाबद्ध विस्फोटराजनीति
पहाड़गंज, सरोजिनी नगर बाज़ार और गोविन्दपुरी की एक बस में हुए विस्फोटों में त्योहार की ख़रीदारी कर रहे साठ से अधिक लोग मारे गए।
- 6 नवंबर 2005
दिल्ली में स्वामिनारायण अक्षरधाम खुलाधर्म
यमुना तट पर BAPS द्वारा बिना इस्पात के बना पत्थर का मंदिर प्रमुख स्वामी महाराज की उपस्थिति में खुला।
- 11 जुलाई 2006
मुंबई की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोटराजनीति
शाम की भीड़ में पश्चिम रेलवे की ट्रेनों के प्रथम श्रेणी डिब्बों में कुछ ही मिनटों में सात बम फटे और लगभग दो सौ यात्री मारे गए।
- 21 अगस्त 2006
वाराणसी में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का देहावसानसंस्कृति
काशी के बालाजी मन्दिर में रियाज़ करने वाले और 15 अगस्त 1947 को लाल क़िले पर शहनाई बजाने वाले उस्ताद का 90 वर्ष की आयु में देहान्त हुआ।
- 9 फ़रवरी 2008
आनन्दवन में बाबा आमटे का देहावसानपुनर्निर्माण
मुरलीधर देवीदास आमटे का वरोरा के पास आनन्दवन में देहान्त हुआ। 1949 में बसाई इस बस्ती में कुष्ठ रोगी सम्मान से रहते और काम करते थे।
- 22 अक्टूबर 2008
चन्द्रयान-1 चन्द्रमा की ओरविज्ञान
इसरो का पहला चन्द्र अभियान PSLV-C11 से श्रीहरिकोटा से उड़ा। इस पर लगे नासा के उपकरण M3 ने चन्द्र सतह पर जल के स्पष्ट संकेत पाए और मून इम्पैक्ट प्रोब चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र से टकराया।
- 26 नवंबर 2008
मुंबई पर आतंकी हमलेयुद्ध
पाकिस्तान से समुद्र के रास्ते आए दस आतंकवादियों ने चार दिन तक सीएसटी स्टेशन, ताज और ओबेरॉय होटल, नरीमन हाउस आदि पर हमला किया; 166 लोग मारे गए। कांस्टेबल तुकाराम ओम्बले ने अजमल कसाब को जीवित पकड़ते हुए बलिदान दिया।
- 30 सितंबर 2010
अयोध्या पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णयधर्म
उच्च न्यायालय ने माना कि केन्द्रीय गुम्बद के नीचे का स्थान हिन्दुओं की आस्था के अनुसार श्रीराम का जन्मस्थान है और भूमि तीन भागों में बाँटी। सभी पक्ष सर्वोच्च न्यायालय गए।
- 3 अक्टूबर 2010
दिल्ली में राष्ट्रमण्डल खेल आरम्भसंस्कृति
जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में उद्घाटन समारोह से वह बहु-खेल प्रतियोगिता शुरू हुई जो तब तक भारत में हुई सबसे बड़ी थी।
- जून–जुलाई 2011
पद्मनाभस्वामी मंदिर के तहख़ाने खुलेधर्म
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर निरीक्षकों ने तिरुवनन्तपुरम के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के बंद तहख़ाने खोले और शताब्दियों में अर्पित स्वर्ण और रत्नों की सूची बनाई। तहख़ाना बी नहीं खोला गया।
- 16 जून 2013
केदारनाथ जलप्रलयधर्म
बादल फटने और चोराबाड़ी ताल के टूटने से केदारनाथ और मन्दाकिनी घाटी में बाढ़ आई; हज़ारों तीर्थयात्री और निवासी मारे गए। एक विशाल शिला, जो अब भीम शिला कहकर पूजी जाती है, मंदिर के पीछे आकर रुकी और पानी को मोड़ दिया।
- 26 मई 2014
नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लीराजनीति
भाजपा के अकेले बहुमत पाने के बाद, जो तीस वर्ष में किसी दल को पहली बार मिला, मोदी ने राष्ट्रपति भवन में शपथ ली।
- 24 सितंबर 2014
मंगलयान मंगल की कक्षा मेंविज्ञान
मार्स ऑर्बिटर मिशन पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुँचा; इस पर लगभग ₹450 करोड़ लगे थे। इसरो मंगल तक पहुँचने वाली पहली एशियाई संस्था बनी।
- 21 जून 2015
पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवससंस्कृति
दिसंबर 2014 में 177 देशों के समर्थन वाले संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के बाद विश्व ने पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया; दिल्ली के राजपथ पर लगभग 35,000 लोगों ने साथ योग किया।
- 9 अक्टूबर 2015
रवीन्द्र जैन का देहावसानसंस्कृति
जन्म से दृष्टिहीन संगीतकार, जिन्होंने रामानन्द सागर की ‘रामायण’ के गीतों को स्वर-रचना दी, का मुंबई में देहान्त हुआ।
- 15 फ़रवरी 2017
पीएसएलवी ने एक साथ 104 उपग्रह कक्षा में पहुँचाएविज्ञान
पीएसएलवी-सी37 कार्टोसैट-2डी और 103 छोटे उपग्रहों के साथ श्रीहरिकोटा से उड़ा; उस समय तक एक रॉकेट से इतने उपग्रह कभी नहीं छोड़े गए थे।
- 26 फ़रवरी 2019
बालाकोट पर हवाई हमलायुद्ध
पुलवामा में आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ़ के चालीस जवानों के बलिदान के बारह दिन बाद भारतीय वायु सेना के विमानों ने पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकी प्रशिक्षण शिविर पर हमला किया।
- 22 जुलाई 2019
चन्द्रयान-2 का प्रक्षेपणविज्ञान
जीएसएलवी मार्क-3 ने ऑर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर को उड़ाया। ऑर्बिटर आज भी चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहा है।
- 5 अगस्त 2019
अनुच्छेद 370 की समाप्तिराजनीति
राष्ट्रपति के आदेश और संसद के अधिनियमों ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया और उसे दो केन्द्रशासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, में पुनर्गठित किया।
- 5 सितंबर 2019
राखीगढ़ी जीनोम प्रकाशितविज्ञान
हड़प्पा स्थल से पहला प्राचीन जीनोम, राखीगढ़ी में दफ़न एक स्त्री का, ‘सेल’ पत्रिका में छपा। इसमें स्टेपी वंश का अंश नहीं है और यह आज के दक्षिण एशियाई लोगों के मुख्य पूर्वज स्रोत के निकट है।
- 7 सितंबर 2019
विक्रम लैंडर से सम्पर्क टूटाविज्ञान
उतरने के अन्तिम मिनटों में चन्द्रयान-2 का लैंडर चन्द्र सतह से लगभग दो किलोमीटर ऊपर मौन हो गया। इसका सबक़ चन्द्रयान-3 में काम आया।
- 9 नवंबर 2019
राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णयधर्म
पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या की पूरी विवादित भूमि एक न्यास द्वारा राम मंदिर बनाने के लिए दी और अयोध्या में अन्यत्र मस्जिद के लिए पाँच एकड़ भूमि देने का निर्देश दिया।
- 15 जून 2020
गलवान घाटी में झड़पयुद्ध
लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों से आमने-सामने की लड़ाई में 16 बिहार के कर्नल बी. संतोष बाबू सहित बीस भारतीय सैनिकों ने बलिदान दिया।
- 5 अगस्त 2020
राम मंदिर का भूमि पूजनपुनर्निर्माण
भारत भर के तीर्थों की मिट्टी और जल के साथ अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का भूमि पूजन हुआ।
- 25 जुलाई 2021
रामप्पा मंदिर विश्व धरोहर घोषितसंस्कृति
यूनेस्को ने काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर को विश्व धरोहर सूची में रखा; दो दिन बाद धोलावीरा भी जुड़ा।
- 27 जुलाई 2021
धोलावीरा विश्व धरोहर घोषितसंस्कृति
कच्छ का हड़प्पा नगर धोलावीरा, अपने जलाशयों और दस बड़े चिह्नों वाले नामपट्ट के साथ, भारत का 40वाँ विश्व धरोहर स्थल बना।
- 5 नवंबर 2021
केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरणधर्म
केदारनाथ मंदिर के पीछे 2013 की बाढ़ में बह गई आदि शंकराचार्य की समाधि के पुनर्निर्माण के साथ उनकी 12 फ़ुट की प्रतिमा का अनावरण हुआ।
- 13 दिसंबर 2021
काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पणपुनर्निर्माण
काशी विश्वनाथ मंदिर को ललिता घाट पर गंगा से जोड़ने वाले गलियारे का लोकार्पण हुआ; इसके लिए हटाए गए घरों के भीतर मिले दर्जनों पुराने मंदिर फिर सँवारे गए।
- 6 फ़रवरी 2022
लता मंगेशकर का देहावसानसंस्कृति
सात दशक तक भारत के फ़िल्मी गीतों और भजनों को स्वर देने वाली गायिका का 92 वर्ष की आयु में मुंबई में देहान्त हुआ। उन्हें 2001 में भारत रत्न मिला था।
- 18 जून 2022
पावागढ़ कालिका मंदिर पर ध्वज फिर फहरायापुनर्निर्माण
गुजरात के पावागढ़ पर्वत पर महाकाली मंदिर के पुनर्निर्मित शिखर पर फिर ध्वज फहराया गया; लगभग पाँच शताब्दी पहले महमूद बेगड़ा के समय टूटने के बाद से शिखर बिना ध्वज के था।
- 11 अक्टूबर 2022
उज्जैन में श्री महाकाल लोक का लोकार्पणपुनर्निर्माण
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के चारों ओर महाकाल लोक गलियारे का पहला चरण खुला, जिसमें भित्तिचित्र और मूर्तियाँ शिवपुराण की कथाएँ कहती हैं।
- 26 दिसंबर 2022
पहला वीर बाल दिवसधर्म
भारत ने पहली बार वीर बाल दिवस मनाया, गुरु गोबिन्द सिंह के छोटे साहिबज़ादों जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह के सम्मान में।
- 28 मई 2023
सेंगोल के साथ नए संसद भवन का उद्घाटनराजनीति
नए संसद भवन का उद्घाटन हुआ और 1947 में तमिल अधीनमों द्वारा दिया गया, चोल परम्परा से बना स्वर्णमंडित राजदण्ड सेंगोल अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित किया गया।
- 14 जुलाई 2023
श्रीहरिकोटा से चन्द्रयान-3 का प्रक्षेपणविज्ञान
एलवीएम3 रॉकेट ने विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर को चन्द्रमा की ओर भेजा। 23 अगस्त को वे दक्षिणी ध्रुव के पास उतरे।
- 23 अगस्त 2023
चन्द्रयान-3 चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतराविज्ञान
विक्रम लैंडर भारतीय समय सायं 6.04 बजे उतरा और भारत चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश बना। उतरने के स्थान का नाम शिवशक्ति रखा गया और 23 अगस्त राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस बना।
- 2 सितंबर 2023
सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य-एल1 प्रक्षेपितविज्ञान
भारत की पहली सौर वेधशाला श्रीहरिकोटा से उड़ी; जनवरी 2024 में यह L1 बिन्दु के चारों ओर अपनी कक्षा में पहुँची।
- 3 सितंबर 2023
चन्द्रमा पर विक्रम लैंडर की छलाँगविज्ञान
आदेश मिलने पर चन्द्रयान-3 के लैंडर ने इंजन चलाए, लगभग 40 सेमी ऊपर उठा और 30–40 सेमी दूर फिर उतरा, फिर सुप्त अवस्था में चला गया।
- 22 जनवरी 2024
अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठापुनर्निर्माण
नए राम जन्मभूमि मंदिर में अरुण योगीराज द्वारा श्याम शिला में तराशी गई पाँच वर्षीय रामलला की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। उस संध्या भारत भर के घरों में दीये जले।
- 29 जून 2024
बारबाडोस में भारत ने टी20 विश्व कप जीतासंस्कृति
रोहित शर्मा की टीम ने फ़ाइनल में दक्षिण अफ़्रीका को सात रन से हराया; 2007 के बाद यह भारत का दूसरा टी20 विश्व ख़िताब है।
- 13 जनवरी 2025
प्रयागराज में महाकुम्भ आरम्भधर्म
पौष पूर्णिमा से महाकुम्भ आरम्भ होकर 26 फ़रवरी को महाशिवरात्रि तक चला। उत्तर प्रदेश सरकार ने संगम पर 66 करोड़ से अधिक स्नान गिने, जिसे अब तक का सबसे बड़ा दर्ज समागम बताया गया; मौनी अमावस्या, 29 जनवरी, को भगदड़ में सरकारी गिनती से लगभग तीस श्रद्धालु मरे।
- 7 फ़रवरी 2025
पहली ईंट रखने वाले कामेश्वर चौपाल का निधनधर्म
बिहार के कामेश्वर चौपाल का निधन, जिन्होंने 9 नवम्बर 1989 के शिलान्यास में राम मन्दिर की पहली ईंट रखी थी। बाद में वे श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के न्यासी रहे।
- 7 मई 2025
ऑपरेशन सिंदूरयुद्ध
पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा 26 लोगों की हत्या के दो सप्ताह बाद, जिनमें अधिकतर हिन्दू पर्यटक धर्म पूछकर मारे गए थे, भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों पर हमला किया।
- 25 जून 2025
शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष स्टेशन की ओरविज्ञान
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला एक्सियम-4 अभियान पर उड़े और राकेश शर्मा के 41 वर्ष बाद अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहुँचने वाले पहले भारतीय बने।
- 15 जुलाई 2025
अंतरिक्ष स्टेशन से शुभांशु शुक्ला की वापसीविज्ञान
एक्सिओम-4 का यान कैलिफ़ोर्निया के तट पर समुद्र में उतरा, और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर रहने वाले पहले भारतीय घर लौटे।
- 25 नवंबर 2025
राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजपुनर्निर्माण
विवाह पंचमी को मुख्य मंदिर पूरा होने पर राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर सूर्य, ॐ और कोविदार वृक्ष से अंकित केसरिया ध्वज फहराया गया।
विश्व में हिन्दूजहाँ-जहाँ धर्म पहुँचा: दक्षिण-पूर्व एशिया, नेपाल, लंका, अफ़ग़ानिस्तान, रेशम मार्ग, और फ़िजी से लंदन तक प्रवासी हिन्दू।
- 543 ई.पू. (महावंश की गणना)
राजकुमार विजय लंका पहुँचेराजनीति
महावंश के अनुसार भारत के सिंहपुर राज्य से निर्वासित विजय अपने 700 साथियों के साथ उसी दिन लंका पहुँचे जिस दिन बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ।
- लगभग 247 ई.पू.
महिन्द लंका में बुद्ध का धम्म लाएधर्म
अशोक के पुत्र महिन्द अनुराधपुर के पास मिहिन्तले पर्वत पर राजा देवानंपिय तिस्स से मिले। लंका का बौद्ध संघ अपनी शुरुआत इसी भेंट से मानता है।
- लगभग पहली शताब्दी ई.
कौण्डिन्य और सोमा ने फूनान बसायाराजनीति
तीसरी शताब्दी के चीनी दूतों ने फूनान की स्थापना की कथा लिखी: कौण्डिन्य नाम के एक ब्राह्मण समुद्र मार्ग से आए और नागकन्या सोमा से विवाह किया। उनके वंश ने मेकांग के मुहाने पर राज किया।
- लगभग दूसरी शताब्दी ई. का आरम्भ
कुषाण सिक्कों पर शिव और नन्दीधर्म
कुषाण राजा विम कडफिसेस के सोने के सिक्कों पर त्रिशूलधारी शिव और उनके पीछे नन्दी अंकित हैं। इन सिक्कों पर राजा स्वयं को माहेश्वर का भक्त कहता है।
- लगभग 127 ई.
कनिष्क के रबातक अभिलेख में महासेनधर्म
1993 में उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में मिले रबातक अभिलेख में कनिष्क द्वारा पूजे गए देवताओं की सूची है, जिनमें उमा, महासेन और विशाख के नाम हैं।
- लगभग तीसरी शताब्दी ई.
वो कान्ह: वियतनाम के तट पर संस्कृतसंस्कृति
न्हा त्रांग के पास मिले एक संस्कृत शिलालेख में श्रीमार के वंश के एक राजा का नाम है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया में मिला सबसे पुराना संस्कृत अभिलेख है।
- लगभग चौथी शताब्दी ई. का अन्त
भद्रवर्मा ने मी सोन में भद्रेश्वर स्थापित किएधर्म
चम्पा के राजा भद्रवर्मा ने मी सोन की घाटी में भद्रेश्वर नाम का शिवलिंग स्थापित किया। अगले नौ सौ वर्ष चम्पा के राजा यहीं मन्दिर बनाते रहे।
- लगभग 400 ई.
बोर्नियो में मूलवर्मा के यूप स्तम्भधर्म
पूर्वी कालीमंतन के कुटई में मिले सात पत्थर के यूप बताते हैं कि राजा मूलवर्मा ने महायज्ञ किया और ब्राह्मणों को बीस हज़ार गायें दान दीं। ये इंडोनेशिया के सबसे पुराने अभिलेख हैं।
- लगभग पाँचवीं शताब्दी ई.
चिआरुतेउन में पूर्णवर्मा के पदचिह्नधर्म
बोगोर के पास नदी में पड़ी एक चट्टान पर तारुमानगर के राजा पूर्णवर्मा ने अपने पदचिह्न खुदवाए और उन्हें भगवान विष्णु के पदचिह्नों जैसा बताया।
- 464 ई.
चाँगु नारायण में मानदेव का स्तम्भधर्म
लिच्छवि राजा मानदेव ने चाँगु नारायण में भगवान विष्णु के मन्दिर के सामने स्तम्भ खड़ा किया। संवत 386 का यह अभिलेख नेपाल का सबसे पुराना तिथियुक्त लेख है।
- लगभग 616–637 ई.
ईशानवर्मा ने ईशानपुर बसायाराजनीति
चेनला के राजा ईशानवर्मा प्रथम ने ईशानपुर से राज किया, जो आज कम्बोडिया का सम्बोर प्रेई कुक है। वहाँ पेड़ों के बीच सौ से अधिक ईंटों के मन्दिर खड़े हैं।
- 682 ई.
केदुकन बुकित: श्रीविजय का पहला लेखराजनीति
सुमात्रा में पालेमबांग के पास मिला यह अभिलेख दापुन्ता ह्यांग की सिद्धयात्रा का वर्णन करता है, जो बीस हज़ार सैनिकों के साथ निकले। इसकी तिथि शक संवत में दी गई है।
- 732 ई.
संजय ने जावा में शिवलिंग स्थापित कियाधर्म
शक 654 का चांगगल अभिलेख बताता है कि मातरम के राजा संजय ने मध्य जावा की एक पहाड़ी पर शिवलिंग की प्रतिष्ठा की।
- 752 ई.
बोधिसेन ने नारा के बुद्ध का नेत्रोन्मीलन कियासंस्कृति
भारतीय भिक्षु बोधिसेन 736 में जापान पहुँचे थे। उन्होंने नारा के तोदाई-जी में विशाल कांस्य बुद्ध प्रतिमा का नेत्रोन्मीलन संस्कार किया। वहाँ आज भी उनका स्मरण होता है।
- 774 ई.
पो नगर जला, सत्यवर्मा ने फिर बनायायुद्ध
चम्पा के अभिलेख बताते हैं कि 774 में समुद्री आक्रमणकारियों ने पो नगर में देवी का मन्दिर जला दिया और प्रतिमा ले गए। राजा सत्यवर्मा ने 784 में देवी की पुनः प्रतिष्ठा की।
- लगभग 780–830 ई.
शैलेन्द्रों ने बोरोबुदुर बनवायासंस्कृति
शैलेन्द्र राजाओं ने मध्य जावा में बोरोबुदुर बनवाया, जो संसार का सबसे बड़ा बौद्ध स्मारक है। एक पीढ़ी के भीतर ही कुछ किलोमीटर दूर मातरम के हिन्दू राजाओं ने प्रम्बनन खड़ा किया।
- 802 ई.
जयवर्मा द्वितीय चक्रवर्ती घोषितराजनीति
कुलेन पहाड़ियों पर एक ब्राह्मण ने जयवर्मा द्वितीय के लिए देवराज अनुष्ठान किया और ख्मेर भूमि को जावा से स्वतन्त्र घोषित किया। 1052 का स्दोक काक थोम अभिलेख यह वृत्तान्त सुनाता है।
- 856 ई.
शिवगृह अभिलेख और प्रम्बननधर्म
856 का शिवगृह अभिलेख शिव के एक विशाल गृह का वर्णन करता है, जिसके पास से नदी का मार्ग मोड़ा गया। इसे प्रम्बनन की प्रतिष्ठा का लेख माना जाता है।
- लगभग 870 ई.
काबुल गया, शाही उदभाण्डपुर में डटेयुद्ध
लगभग 870 में सफ़्फ़ारी याक़ूब इब्न लैस ने काबुल ले लिया। हिन्दू शाही राजा उसके पूर्व में डटे रहे और सिन्धु तट पर उदभाण्डपुर (हुंड) से राज करते रहे।
- लगभग 889–900 ई.
यशोवर्मा ने यशोधरपुर बसायाराजनीति
यशोवर्मा प्रथम ने ख्मेर राजधानी अंगकोर में स्थापित की और नोम बाखेंग पहाड़ी को उसका केन्द्र बनाया। पास ही पूर्वी बराय नाम का विशाल जलाशय बना।
- 22 अप्रैल 967 ई.
बन्तेय स्रेई की प्रतिष्ठाधर्म
ख्मेर राजा के गुरु ब्राह्मण यज्ञवराह ने गुलाबी बलुआ पत्थर का एक छोटा शिव मन्दिर प्रतिष्ठित किया। इसकी रामायण की नक्काशी कम्बोडिया में सबसे बारीक है।
- 993 ई.
राजराज चोल ने अनुराधपुर लियायुद्ध
राजराज प्रथम की चोल सेना ने उत्तरी लंका जीत ली और राजधानी पोलोन्नरुवा ले गई। वहाँ चोल शैली के शिव मन्दिर आज भी खड़े हैं।
- 1025 ई.
राजेन्द्र चोल के बेड़े ने श्रीविजय पर धावा बोलायुद्ध
राजेन्द्र प्रथम का तंजौर अभिलेख उन बन्दरगाहों की सूची देता है जिन्हें उसकी नौसेना ने बंगाल की खाड़ी के पार जीता, कडारम (केडा) से लेकर सुमात्रा के श्रीविजय नगरों तक।
- 1070 ई.
विजयबाहु प्रथम ने लंका से चोल शासन हटायाराजनीति
विजयबाहु प्रथम ने चोलों को पोलोन्नरुवा से निकाला और वहीं अभिषेक कराया। उसने इसी नगर को राजधानी बनाए रखा।
- लगभग 1113–1150 ई.
सूर्यवर्मा द्वितीय ने अंगकोर वाट बनवायाधर्म
सूर्यवर्मा द्वितीय ने भगवान विष्णु के लिए अंगकोर वाट बनवाया। इसकी दीर्घाओं में समुद्र मन्थन और कुरुक्षेत्र का युद्ध उकेरा गया है, और इसका मुख पश्चिम की ओर है।
- 1157 ई.
केदिरी में काकविन भारतयुद्ध की रचनासंस्कृति
राजा जयभय के दरबार में कवि म्पु सेदह और म्पु पनुलुह ने महाभारत के युद्ध को प्राचीन जावा भाषा के छन्दों में फिर से कहा।
- 1177 ई.
चम्पा के बेड़े ने ख्मेर राजधानी लूटीयुद्ध
चम्पा का बेड़ा मेकांग और तोनले साप होते हुए आया और यशोधरपुर को लूटा। जयवर्मा सप्तम ने उन्हें खदेड़ा और 1181 में उसका राज्याभिषेक हुआ।
- 1181 ई. से
जयवर्मा सप्तम और बायोनसंस्कृति
महायानी बौद्ध जयवर्मा सप्तम ने अंगकोर थोम और शान्त मुखों वाले शिखरों का बायोन बनवाया। बाद के राजाओं ने इसके कुछ भागों को शिव और विष्णु की उपासना के लिए बदला।
- 1222 ई.
केन अरोक ने सिंहसारी की स्थापना कीराजनीति
केन अरोक ने गन्तेर में केदिरी के अन्तिम राजा को हराया और पूर्वी जावा में सिंहसारी राज्य बसाया। परारतोन ग्रन्थ उसका जीवन बताता है।
- 10 नवम्बर 1293
रादेन विजय का अभिषेक, मजापहित का आरम्भराजनीति
मंगोल अभियान को पहले अपने शत्रुओं पर मोड़कर और फिर जावा से भगाकर रादेन विजय का कृतराजस जयवर्धन के नाम से अभिषेक हुआ। वे मजापहित के पहले राजा बने।
- 1336 ई.
गजह मद की पलापा शपथराजनीति
परारतोन के अनुसार मजापहित के मन्त्री गजह मद ने शपथ ली कि जब तक नुसन्तारा के द्वीप मजापहित के अधीन एक नहीं होंगे, वे पलापा नहीं चखेंगे।
- 1349 ई.
शम्सुद्दीन इलियास का काठमाण्डू घाटी पर धावायुद्ध
बंगाल के शम्सुद्दीन इलियास शाह ने नेपाल पर धावा बोला। गोपालराज वंशावली लिखती है कि पशुपतिनाथ का लिंग खण्डित किया गया। कुछ ही समय बाद उसकी पुनः प्रतिष्ठा हुई।
- 1365 ई.
प्रपंच ने नागरकृतागम लिखासंस्कृति
दरबारी कवि म्पु प्रपंच ने हयम वुरुक के मजापहित का वर्णन किया: राजा की यात्राएँ, शैव और बौद्ध अधिकारी, और कर भेजने वाले प्रदेश।
- 1431 ई.
अयुत्थया ने अंगकोर लियायुद्ध
अयुत्थया की सेना ने अंगकोर लूटा और ख्मेर दरबार दक्षिण में नोम पेन्ह की ओर चला गया। अंगकोर वाट बौद्ध मन्दिर के रूप में पूजा में बना रहा।
- 1471 ई.
चम्पा की राजधानी विजय का पतनयुद्ध
दाई वियत के राजा ले थान्ह तोंग ने विजय नगर जीत लिया। चम्पा का जो बचा, वह सुदूर दक्षिण में पाण्डुरंग रियासत के रूप में टिका रहा।
- लगभग 16वीं शताब्दी
मजापहित के पुरोहित और कुलीन बाली पहुँचेपुनर्निर्माण
जब मजापहित की जगह देमक सल्तनत ने ली, तो उसके अनेक ब्राह्मण, कलाकार और कुलीन बाली चले गए। इस द्वीप ने पुराना धर्म बचाए रखा।
- 1619 ई.
पुर्तगालियों ने जाफ़ना राज्य हड़पायुद्ध
पुर्तगालियों ने जाफ़ना के अन्तिम राजा संकिलि द्वितीय को बन्दी बनाकर गोवा भेजा, जहाँ उन्हें मृत्युदण्ड दिया गया। इसके बाद पूरे प्रायद्वीप में मन्दिर तोड़े गए।
- 1622 ई.
पुर्तगालियों ने कोणेश्वरम तोड़ायुद्ध
कोन्स्तान्तिनो दे सा दे नोरोन्या ने त्रिंकोमाली की स्वामी चट्टान पर बने मन्दिर को गिरवाकर उसके पत्थरों से फ़ोर्ट फ़्रेडरिक बनवाया। मन्दिर की मूर्तियाँ छिपा दी गई थीं, जो 1950 में फिर मिलीं।
- 1702 ई.
भूपतीन्द्र मल्ल ने न्यातापोल बनवायाधर्म
भक्तपुर में भूपतीन्द्र मल्ल ने देवी सिद्धि लक्ष्मी का पाँच छतों वाला न्यातापोल मन्दिर बनवाया। यह 1934 और 2015 के भूकम्पों में भी खड़ा रहा।
- 25 सितम्बर 1768
पृथ्वीनारायण शाह ने काठमाण्डू लियाराजनीति
गोरखा के राजा इन्द्रजात्रा के उत्सव के दिन काठमाण्डू में प्रवेश कर गए, जब नगर रथयात्रा में लगा था। शाह वंश ने 2008 तक नेपाल पर राज किया।
- 1784 ई.
ब्राह्मणों के अनुष्ठान के लिए बैंकॉक का विशाल झूलाधर्म
राजा राम प्रथम ने बैंकॉक में साओ चिंग चा झूला बनवाया, जहाँ राजपुरोहित ब्राह्मण शिव के पृथ्वी पर उतरने के उत्सव में झूले का अनुष्ठान करते थे। यह अनुष्ठान 1935 तक चला।
- 1797 ई.
राम प्रथम ने रामकियेन संकलित करायासंस्कृति
1767 में अयुत्थया के ग्रन्थ नष्ट होने के बाद स्याम के राजा राम प्रथम ने थाई रामायण रामकियेन फिर से लिखवाई। वाट फ्रा केओ की दीर्घाओं की दीवारें इसी के चित्रों से भरी हैं।
- 1827 ई.
सिंगापुर में श्री मारियम्मन मन्दिर की स्थापनाधर्म
रैफ़ल्स के साथ पेनांग से आए नारायण पिल्लै ने साउथ ब्रिज रोड पर मारियम्मन का छोटा मन्दिर बनवाया। यह सिंगापुर का सबसे पुराना हिन्दू मन्दिर है।
- 1832 ई.
अन्तिम चम्पा रियासत पाण्डुरंग का विलयराजनीति
वियतनामी सम्राट मिन्ह मांग ने पाण्डुरंग को समाप्त कर दिया। निन्ह थुआन के चाम बालामोन आज भी अपने ब्राह्मण पुरोहित और पुराने मन्दिर-शिखरों पर काटे उत्सव बनाए हुए हैं।
- 2 नवम्बर 1834
एटलस जहाज़ मॉरीशस पहुँचाविश्व
एटलस जहाज़ से भारत के पहले गिरमिटिया मज़दूर पोर्ट लुई में उतरे। अगले अस्सी वर्षों में लगभग साढ़े चार लाख लोग उसी घाट से आए जिसे आज आप्रवासी घाट कहते हैं।
- 5 मई 1838
व्हिटबी और हेस्पेरस ब्रिटिश गयाना पहुँचेविश्व
भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों को लेकर पहले दो जहाज़ ब्रिटिश गयाना पहुँचे। गयाना में 5 मई आगमन दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- 30 मई 1845
फ़तेल रज़्ज़ाक त्रिनिदाद पहुँचाविश्व
फ़तेल रज़्ज़ाक जहाज़ पहले गिरमिटिया भारतीयों को त्रिनिदाद लाया। वहाँ 30 मई भारतीय आगमन दिवस है और सार्वजनिक अवकाश रहता है।
- 1 अक्टूबर 1847
लन्दन में एनी बेसेंट का जन्मधर्म
थियोसॉफ़िस्ट एनी बेसेंट का जन्म लन्दन में हुआ। भारत में उन्होंने वाराणसी में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज खोला, जो बीएचयू का बीज बना, गीता का अनुवाद किया और होम रूल लीग शुरू की।
- 16 नवम्बर 1860
ट्रूरो जहाज़ नटाल पहुँचाविश्व
ट्रूरो जहाज़ ने पहले गिरमिटिया भारतीयों को गन्ने के बागानों में काम के लिए पोर्ट नटाल, आज के डरबन, में उतारा। डरबन एशिया के बाहर भारतीयों का सबसे बड़ा नगर बना।
- 28 अक्टूबर 1867
आयरलैंड में मार्गरेट नोबल (भगिनी निवेदिता) का जन्मधर्म
आयरिश शिक्षिका का जन्म डंगैनन में हुआ। 1895 में लन्दन में वे स्वामी विवेकानन्द से मिलीं और उनके पीछे भारत आईं।
- 5 जून 1873
लल्ला रूख़ सूरीनाम पहुँचाविश्व
लल्ला रूख़ जहाज़ पहले भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों को डच सूरीनाम के पारामारिबो लाया। उनके वंशज हिन्दुस्तानी कहलाते हैं और आज देश का सबसे बड़ा समुदाय हैं।
- 14 मई 1879
लियोनिडास जहाज़ फ़िजी पहुँचाविश्व
लियोनिडास फ़िजी के गन्ने के खेतों के लिए पहले गिरमिटियों को लेकर लेवुका में रुका। 1916 तक लगभग साठ हज़ार लोग आए। उनके साथ आई रामचरितमानस आज भी वहाँ गाई जाती है।
- 1891 ई.
बातू गुफाओं में मुरुगन की प्रतिष्ठाधर्म
के. ताम्बूसामी पिल्लै ने कुआलालम्पुर के उत्तर में चूना-पत्थर की गुफाओं में मुरुगन का वेल स्थापित किया। 1892 से वहाँ थाईपूसम मनाया जाता है।
- 7 जून 1893
पीटरमैरित्सबर्ग में गांधी ट्रेन से उतारे गएप्रतिरोध
प्रथम श्रेणी का टिकट लिए एक युवा बैरिस्टर को भारतीय होने के कारण ट्रेन से उतार दिया गया। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय मज़दूरों और व्यापारियों के बीच उन्होंने सत्याग्रह का मार्ग गढ़ा।
- 11 सितम्बर 1893
शिकागो में विवेकानन्द का भाषणपुनर्निर्माण
विश्व धर्म महासभा में स्वामी विवेकानन्द ने "अमेरिका के बहनो और भाइयो" से आरम्भ किया और देर तक तालियाँ बजती रहीं। इसके बाद न्यूयॉर्क और लन्दन में वेदान्त सोसाइटियाँ बनीं।
- 18 सितंबर 1900
मॉरीशस में शिवसागर रामगुलाम का जन्मराजनीति
बिहार से आए गिरमिटिया मज़दूरों के पौत्र का जन्म बेल रीव में हुआ। उन्होंने 1968 में मॉरीशस को स्वतंत्रता दिलाई और पहले प्रधानमंत्री बने।
- 1905 ई.
सैन फ़्रांसिस्को का पुराना मन्दिरधर्म
उत्तरी कैलिफ़ोर्निया की वेदान्त सोसाइटी ने वेबस्टर स्ट्रीट पर अपना मन्दिर समर्पित किया। यह पश्चिम में बना पहला हिन्दू मन्दिर भवन था।
- 23 मई 1914
कोमागाता मारू वैंकूवर पहुँचाविश्व
जहाज़ पंजाब के 376 यात्रियों को लेकर पहुँचा, जो सभी ब्रिटिश प्रजा थे। कनाडा ने लगभग किसी को उतरने नहीं दिया और दो महीने बाद जहाज़ को भारत लौटा दिया।
- 1917 ई.
गिरमिट की भर्ती बन्दप्रतिरोध
भारत में गोखले, गांधी, सी. एफ़. एण्ड्रयूज़ और अन्य लोगों के वर्षों के विरोध के बाद सरकार ने उपनिवेशों के लिए गिरमिटिया मज़दूरों की भर्ती रोक दी।
- 1920 ई.
योगानन्द अमेरिका पहुँचेपुनर्निर्माण
परमहंस योगानन्द धर्म सम्मेलन के प्रतिनिधि बनकर बोस्टन आए और वहीं रह गए। उनकी पुस्तक योगी कथामृत (1946) ने क्रियायोग को करोड़ों लोगों तक पहुँचाया।
- 1 जनवरी 1920
शेष गिरमिट अनुबन्ध रद्दविश्व
इस दिन से फ़िजी में चल रहे सभी गिरमिट अनुबन्ध रद्द कर दिए गए। गिरमिट प्रथा समाप्त हुई।
- 7 सितंबर 1931
लन्दन में दूसरा गोलमेज़ सम्मेलनराजनीति
गांधी जी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में आए और ईस्ट एंड के किंग्सले हॉल में ठहरे। पृथक निर्वाचन के प्रश्न पर सम्मेलन विफल रहा।
- 2 जुलाई 1943
नेताजी सुभाष बोस सिंगापुर पहुँचेप्रतिरोध
जर्मनी से पनडुब्बी यात्रा और टोक्यो से उड़ान के बाद बोस पूर्वी एशिया में भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की बागडोर सँभालने सिंगापुर उतरे।
- 5 जुलाई 1943
नेताजी ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की सलामी ली: ‘दिल्ली चलो’प्रतिरोध
सिंगापुर के पदांग पर वर्दी में बोस ने सर्वोच्च सेनापति के रूप में आज़ाद हिन्द फ़ौज के लगभग बारह हज़ार सैनिकों का निरीक्षण किया और दिल्ली कूच का आह्वान किया।
- 12 जुलाई 1943
सिंगापुर में रानी झाँसी रेजिमेंट की घोषणाप्रतिरोध
बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज की महिला लड़ाकू रेजिमेंट की घोषणा की, जिसका नाम रानी लक्ष्मीबाई पर रखा गया और जिसकी कमान डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन को मिली।
- 1950 ई.
कोणेश्वरम की मूर्तियाँ कुएँ में मिलींपुनर्निर्माण
त्रिंकोमाली में कुआँ खोदते मज़दूरों को 1622 में तोड़े गए मन्दिर की कांस्य मूर्तियाँ मिलीं। स्वामी चट्टान पर 1952 से मन्दिर फिर बना और 1963 में दोबारा खुला।
- 7 मार्च 1952
लॉस एंजेलिस में परमहंस योगानन्द की महासमाधिधर्म
भारत के राजदूत विनय रंजन सेन के सम्मान में भोज पर योगानन्द ने भाषण समाप्त किया, अपनी कविता ‘माई इंडिया’ पढ़ी और देह त्याग दी।
- 1956 ई.
बैंकॉक में ब्रह्मा का एरावण मन्दिरधर्म
एरावण होटल के निर्माण के समय उसके कोने पर भगवान ब्रह्मा का मन्दिर बनाया गया, जिन्हें थाई लोग फ्रा फ्रोम कहते हैं। आज यह बैंकॉक के सबसे अधिक भीड़ वाले मन्दिरों में है।
- 1959 ई.
बाली में परिषद हिन्दू धर्म की स्थापनापुनर्निर्माण
बाली के पुरोहितों और विद्वानों ने यह परिषद बनाई, जिसने इंडोनेशिया में हिन्दू धर्म को राजकीय मान्यता दिलाई और आज भी मन्दिरों और शिक्षा का मार्गदर्शन करती है।
- 15 जून 1962
अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने प्रेह विहार कम्बोडिया को दियाराजनीति
अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने निर्णय दिया कि दांगरेक चट्टान पर बना शिखरेश्वर शिव मन्दिर कम्बोडिया में है। 2008 में यह विश्व धरोहर बना।
- 1963 ई.
एका दश रुद्र के समय अगुंग ज्वालामुखी फटाधर्म
बाली बेसाकिह में अपना सबसे बड़ा शुद्धि यज्ञ एका दश रुद्र कर रहा था, तभी गुनुंग अगुंग फट पड़ा और हज़ार से अधिक लोग मारे गए। 1979 में यह अनुष्ठान फिर पूर्ण रूप से हुआ।
- 17 सितम्बर 1965
प्रभुपाद बोस्टन पहुँचेपुनर्निर्माण
69 वर्ष के ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी मालवाहक जहाज़ जलदूत से बोस्टन पहुँचे। जुलाई 1966 में उन्होंने न्यूयॉर्क में इस्कॉन की स्थापना की।
- 9 जुलाई 1967
पश्चिम में पहली रथयात्रा, सैन फ़्रांसिस्कोधर्म
स्वामी प्रभुपाद के भक्तों ने गोल्डन गेट पार्क में एक ट्रक पर जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा को खींचा। आधुनिक काल में भारत से बाहर यह पहली रथयात्रा थी।
- 12 मार्च 1968
मॉरीशस स्वतन्त्र हुआराजनीति
एक गिरमिटिया के पुत्र सर शिवसागर रामगुलाम के नेतृत्व में मॉरीशस स्वतन्त्र हुआ। यह उन गिने-चुने देशों में है जहाँ हिन्दू सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय हैं।
- 25 मार्च 1971
ढाका में ऑपरेशन सर्चलाइट आरम्भयुद्ध
पाकिस्तानी सेना ने रात में ढाका पर हमला किया। उसके पहले निशानों में ढाका विश्वविद्यालय का हिन्दू छात्रावास जगन्नाथ हॉल था, जहाँ छात्रों और शिक्षकों को गोली मारी गई।
- 27 मार्च 1971
ढाका में रमना काली मन्दिर नष्टयुद्ध
पूर्वी पाकिस्तान में दमन के दौरान पाकिस्तानी सेना ने रमना काली मन्दिर नष्ट किया और वहाँ शरण लिए लोगों को मार डाला। 1971 के पूरे युद्ध में हिन्दुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।
- 1972 ई.
ग्रां बासें में गंगाजल डाला गयाधर्म
गंगा से लाया गया जल ग्रां बासें की ज्वालामुखी झील में डाला गया, जिसे मॉरीशस के हिन्दू गंगा तालाब कहते हैं। महाशिवरात्रि पर लाखों लोग पैदल वहाँ जाते हैं।
- 4 अगस्त 1972
ईदी अमीन ने एशियाइयों को युगाण्डा से निकालाविश्व
युगाण्डा के शासक ने एशियाई समुदाय को देश छोड़ने के लिए नब्बे दिन दिए। हज़ारों लोगों ने, जिनमें बहुत से गुजराती हिन्दू थे, ब्रिटेन में, विशेषकर लेस्टर में, नया जीवन बसाया।
- 1977 ई.
पिट्सबर्ग में श्री वेंकटेश्वर मन्दिर की प्रतिष्ठाधर्म
तिरुपति से आए शिल्पियों द्वारा आगम शैली में बना पेन हिल्स का यह मन्दिर अमेरिका के पहले पारम्परिक हिन्दू मन्दिरों में से एक बना।
- 4 अक्टूबर 1977
वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण दियाराजनीति
विदेश मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिन्दी में भाषण दिया।
- जुलाई 1983
श्रीलंका में काला जुलाईयुद्ध
एक सप्ताह तक कोलम्बो और अन्य नगरों में भीड़ ने तमिलों पर हमले किए। तमिलों के घर, दुकानें और मन्दिर जलाए गए। लंका के अधिकतर तमिल हिन्दू हैं, और बड़ी संख्या में लोग भारत, कनाडा और यूरोप चले गए।
- 14 मई 1987
फ़िजी का पहला तख़्तापलटराजनीति
लियोनिडास के आगमन की 108वीं वर्षगाँठ पर सितिवेनी राबुका ने मुख्यतः भारतवंशी फ़िजीवासियों के समर्थन से चुनी नई सरकार को हटा दिया। इसके बाद के वर्षों में बहुत से फ़िजी हिन्दू देश छोड़ गए।
- अगस्त 1995
नीसडन का बीएपीएस श्री स्वामिनारायण मन्दिरधर्म
प्रमुख स्वामी महाराज ने उत्तर-पश्चिम लन्दन में इस मन्दिर का उद्घाटन किया। बुल्गारियाई चूना-पत्थर और इतालवी संगमरमर भारत के कारीगरों ने तराशे और टुकड़ों में यहाँ भेजे गए।
- 19 मई 2000
फ़िजी के प्रधानमन्त्री बन्धक बनाए गएराजनीति
जॉर्ज स्पेट के नेतृत्व में हथियारबन्द लोगों ने संसद पर कब्ज़ा किया और भारतीय मूल के पहले प्रधानमन्त्री महेन्द्र चौधरी और उनके मन्त्रियों को 56 दिन बन्धक रखा।
- 1 जून 2001
नारायणहिटी में नेपाल का राजपरिवार मारा गयाराजनीति
राजा वीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्या और राजपरिवार के आठ अन्य सदस्य महल में गोली से मारे गए; आधिकारिक जाँच ने युवराज दीपेन्द्र को दोषी ठहराया।
- 28 मई 2008
नेपाल में राजतन्त्र समाप्तराजनीति
नेपाल की संविधान सभा ने शाह राजाओं के 240 वर्ष के शासन का अन्त किया। 2006 तक नेपाल संसार का एकमात्र संवैधानिक हिन्दू राज्य था।
- 25 अप्रैल 2015
गोरखा भूकम्प से काठमाण्डू घाटी हिलीविश्व
7.8 तीव्रता के भूकम्प में लगभग नौ हज़ार लोग मारे गए और दरबार चौकों के मन्दिर ढह गए। पशुपतिनाथ का मुख्य मन्दिर बचा रहा।
- 2021 ई.
इंग्लैण्ड और वेल्स में दस लाख से अधिक हिन्दूविश्व
2021 की जनगणना में इंग्लैण्ड और वेल्स में 10,32,775 हिन्दू गिने गए, जो 2011 में लगभग 8,17,000 थे। लेस्टर, हैरो और ब्रेंट में सबसे बड़े समुदाय हैं।
- 8 अक्टूबर 2023
रॉबिन्सविल अक्षरधाम का लोकार्पणधर्म
महन्त स्वामी महाराज ने न्यू जर्सी में बीएपीएस स्वामिनारायण अक्षरधाम का लोकार्पण किया। भारत में तराशे पत्थरों से बने इस मन्दिर को स्वयंसेवकों ने बारह वर्ष में जोड़ा।
- 14 फ़रवरी 2024
अबू धाबी में बीएपीएस हिन्दू मन्दिर का उद्घाटनधर्म
संयुक्त अरब अमीरात का पहला पारम्परिक पत्थर का हिन्दू मन्दिर, अमीरात की दी हुई भूमि पर, प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में खुला।