श्रुतिऋग्वेद
चार वेदों में प्रथम: 10 मंडल, अग्नि, इंद्र, वरुण और अन्य देवताओं की स्तुति के 1,028 सूक्त। इसमें गायत्री मंत्र (3.62.10) और सृष्टि का नासदीय सूक्त है।
श्रुतियजुर्वेद
यज्ञ का वेद, वेदी पर पुरोहित के लिए गद्य-मंत्रों में। इसकी दो धाराएँ हैं, शुक्ल और कृष्ण; श्रीरुद्रम् कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में है।
श्रुतिसामवेद
गान का वेद। इसके अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से हैं, उद्गाता पुरोहित के लिए स्वरों में बँधे। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “वेदों में मैं सामवेद हूँ।”
श्रुतिअथर्ववेद
स्वास्थ्य, घर, फ़सल और राजधर्म की प्रार्थनाओं के बीस कांड, साथ में ऊँचा दर्शन। इसका पृथ्वी सूक्त (12.1) कहता है, “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
श्रुतिउपनिषद
वेदांत, वेद का शिखर। मुक्तिका उपनिषद 108 गिनाता है; आदि शंकराचार्य ने प्रमुख उपनिषदों पर भाष्य लिखे, ईश, केन, कठ, मुंडक, मांडूक्य, छांदोग्य, बृहदारण्यक और अन्य।
स्मृतिभगवद्गीता
अठारह अध्यायों में सात सौ श्लोक, जो श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच अर्जुन से कहे, महाभारत के भीष्म पर्व के भीतर। उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों के साथ यह प्रस्थानत्रयी बनाती है।
स्मृतिधर्मशास्त्र
आचार, संस्कार और कर्तव्य के ग्रंथ: मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर और अन्य। पराशर स्मृति कहती है कि कलियुग के लिए उसी के नियम हैं।
इतिहासरामायण
महर्षि वाल्मीकि का आदिकाव्य: सात कांडों में 24,000 श्लोक, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की कथा, अयोध्या से वन, लंका और फिर घर तक। यह कथा पहले नारद ने वाल्मीकि को सुनाई।
इतिहासमहाभारत
महर्षि व्यास का कुरुवंश का इतिहास, अठारह पर्वों और लगभग एक लाख श्लोकों में। यह अपने विषय में कहता है, जो यहाँ है वह अन्यत्र है, जो यहाँ नहीं वह कहीं नहीं।
पुराणअठारह महापुराण
महर्षि व्यास के पुराण, ब्रह्म से ब्रह्मांड तक, सृष्टि, प्रलय, मन्वंतरों और राजवंशों का वर्णन करते हैं। हर सप्ताह-कथा और मंदिर उत्सव में सुनाई जाने वाली कथाएँ इन्हीं में हैं।
पुराणश्रीमद्भागवत पुराण
बारह स्कंध और 18,000 श्लोक, जो शुकदेव ने राजा परीक्षित को उनके अंतिम सात दिनों में सुनाए। दसवाँ स्कंध, श्रीकृष्ण की लीला, भागवत सप्ताह का केंद्र है।
दर्शनषड्दर्शन
वेद को प्रमाण मानने वाले छह दर्शन: गौतम का न्याय, कणाद का वैशेषिक, कपिल का सांख्य, पतंजलि का योग, जैमिनि की पूर्व मीमांसा और बादरायण का वेदांत।
दर्शनब्रह्मसूत्र
बादरायण के चार अध्यायों में 555 सूत्र उपनिषदों के उपदेश को समेटते हैं। शंकर, रामानुज, मध्व, निंबार्क और वल्लभ, सबने इस पर भाष्य लिखा, और हर संप्रदाय इसी पर खड़ा है।
आगमआगम और तंत्र
मंदिर और उपासना के ग्रंथ: गर्भगृह कैसे बने, मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कैसे हो, नित्य पूजा कैसे चले। शैव मंदिर 28 शैव आगमों का, वैष्णव मंदिर पांचरात्र या वैखानस का, और देवी मंदिर शाक्त तंत्रों का पालन करते हैं।
भक्तिरामचरितमानस
गोस्वामी तुलसीदास ने इसे संवत 1631 (1574 ई.) की राम नवमी को अयोध्या में आरंभ किया: अवधी की चौपाइयों और दोहों में, सात कांडों में रामायण। उत्तर भारत अपने राम को इसी से जानता है।
भक्तितिरुमुरै
तमिल शैव स्तोत्रों के बारह ग्रंथ। पहले सात संबंदर, अप्पर और सुंदरर का तेवारम हैं; आठवें में माणिक्कवाचकर का तिरुवाचकम है; बारहवाँ सेक्किळार का 63 नायनमारों का पेरिय पुराणम् है।
भक्तिनालायिर दिव्य प्रबंधम्
बारह आळवारों के चार हज़ार तमिल पाशुरम्, जिन्हें नाथमुनि ने संकलित किया। श्रीरंगम और तिरुमला में रोज़ गाए जाते हैं, और श्रीवैष्णव इन्हें द्रविड़ वेद मानते हैं।
भक्तिज्ञानेश्वरी
संत ज्ञानेश्वर की गीता पर मराठी टीका, जो उन्होंने लगभग सोलह वर्ष की आयु में 1290 ई. में नेवासा में पूरी की। वारकरी इसे पंढरपुर की वारी में साथ ले जाते हैं।