01पहला श्लोक
देवर्षि नारद तमसा तट पर वाल्मीकि के आश्रम आए और संक्षेप में श्रीराम का चरित सुनाया। कुछ ही समय बाद नदी की ओर जाते हुए वाल्मीकि ने देखा कि एक व्याध ने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मार गिराया। उनके मन में उठा शोक शाप बनकर निकला, और वह शाप छन्द में बँधा था। वे अपने ही वचनों पर चकित रह गए। तब ब्रह्माजी प्रकट हुए और कहा कि इसी अनुष्टुप छन्द में वे रामकथा कहें। बालकाण्ड के आरम्भ में यह कथा है।
02सीता का आश्रय
उत्तरकाण्ड में जब सीता अयोध्या छोड़ती हैं, तब वाल्मीकि का आश्रम ही उन्हें शरण देता है। लव और कुश वहीं पले और स्वयं कवि से रामायण सीखी, फिर अश्वमेध के समय श्रीराम की सभा में उसका गान किया। स्कन्द पुराण और लोक परंपरा में कथा है कि ऋषि बनने से पहले वे रत्नाकर नाम के वनवासी डाकू थे, जिन्होंने राम नाम उल्टा, ‘मरा मरा’, जपना आरम्भ किया और इतने लीन हुए कि उन पर दीमक की बाँबी (वल्मीक) बन गई। वाल्मीकि जयंती आश्विन पूर्णिमा को मनाई जाती है।

“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥”
Valmiki Ramayana, Bala Kanda 2.15

