खानवा का युद्ध

पक्षमेवाड़ के नेतृत्व में राजपूत संघराणा साँगा, मेदिनी राय और हसन ख़ाँ मेवाती सहित
1527 ई.बनाम
विजेताबाबर की सेनाज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर

पानीपत के एक वर्ष बाद राणा साँगा ने उस युग की सबसे बड़ी राजपूत सेना लेकर बाबर का सामना किया। तोपों, तोड़ेदार बन्दूकों और बाबर के घुड़सवारों के घेराव ने दिन का फ़ैसला किया।

तिथि: मार्च 1527 ई.स्थान: खानवा, फ़तेहपुर सीकरी के पास, भरतपुर ज़िला, राजस्थानप्रकार: युद्ध
चित्र: "Mirza 'Abd al-Rahim, Khan-i khanan (Mirza 'Abd al-Rahim, Kh · Public domain
परिणाम

बाबर जीता; साँगा घायल होकर रणभूमि से ले जाए गए और एक वर्ष के भीतर उनका देहान्त हो गया।

01दोनों सेनाएँ

साँगा बयाना ले चुके थे और उनकी बढ़त से बाबर का शिविर हिल गया था। ‘बाबरनामा’ स्वीकार करता है कि उसके सैनिक भयभीत थे; बाबर ने शराब के प्याले तोड़े, मदिरा छोड़ने की शपथ ली और सेना को जिहाद के लिए पुकारा। साँगा के साथ मारवाड़, आमेर, ग्वालियर और चन्देरी के राजपूत घराने थे, और मेवात के हसन ख़ाँ तथा महमूद लोदी भी। बाबर ने ज़ंजीरों से जुड़ी गाड़ियों के पीछे मोर्चा बाँधा, जिनके बीच उस्ताद अली क़ुली और मुस्तफ़ा की तोपें थीं।

02युद्ध का दिन और उसके बाद

राजपूतों ने तोपों पर बार-बार धावा बोला। बाबर के घुड़सवार दोनों पार्श्वों से घूमकर पीछे से आ घिरे। साँगा पर प्रहार हुआ और वे अचेत होकर गिरे; साथी उन्हें उठा ले गए, और झाला अज्जा ने राजचिह्न धारण किया ताकि सेना लड़ती रहे। हसन ख़ाँ मेवाती रणभूमि में मारे गए। साँगा स्वस्थ हुए और फिर लड़ने की प्रतिज्ञा की, पर जनवरी 1528 में कालपी में उनका देहान्त हो गया; अनेक वृत्तांतों के अनुसार उन सामन्तों ने उन्हें विष दिया जो फिर युद्ध नहीं चाहते थे।

मेवाड़ के गुहिल और सिसोदिया
राजवंश · लगभग छठी शताब्दी–1949 ई.मेवाड़ के गुहिल और सिसोदियाबप्पा रावल से महाराणा प्रताप तक मेवाड़ के घराने ने दिल्ली से आई हर शक्ति के सामने अपनी पहाड़ियाँ थामे रखीं। यह संसार के सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले राजवंशों में है।पढ़ें →
महत्त्व

पानीपत से भी अधिक खानवा ने तय किया कि मुग़ल हिन्दुस्तान में टिके रहेंगे।