01ऐर्लंग्गा का राज्य-विभाजन
ऐर्लंग्गा ने 1016 की विपदा के बाद पूर्वी जावा का राज्य फिर खड़ा किया। जीवन के अन्त में, लगभग 1042 में, वे संन्यास लेकर हट गए और राज्य दो पुत्रों में बाँट दिया: पूर्व में जंग्गला और पश्चिम में पंजलु, जिसकी राजधानी दाहा थी। पंजलु, जो केदिरी नाम से अधिक प्रसिद्ध है, जल्द ही जंग्गला को निगल गया और लगभग दो शताब्दी तक जावा की प्रमुख शक्ति रहा।
02भारतयुद्ध, 1157
1157 में जयभय के समय कवि मपु सेदाह और मपु पनुलुह ने काकाविन भारतयुद्ध पूरा किया, कुरुक्षेत्र का युद्ध पुरानी जावानी कविता में, संस्कृत छन्दों में। पनुलुह ने हरिवंश और घटोत्कचाश्रय भी लिखे। राजा कामेश्वर के लिए मपु धर्मज ने स्मरदहन लिखा, शिव द्वारा कामदेव के भस्म होने की कथा। यही काव्य वायांग छाया-नाट्य की पूँजी बने, और जावा के गाँव का दलांग आज भी इन्हीं से कथा लेता है।

03गन्तेर में पतन
अन्तिम राजा कृतजय का शैव और बौद्ध पुरोहितों से विरोध हुआ, और वे तुमापेल के शासक केन अरोक के पक्ष में चले गए। 1222 में केन अरोक ने गन्तेर में कृतजय को हराया। पररातोन और नागरकृतागम दोनों इसका वर्णन करते हैं। केदिरी सामन्त के रूप में बचा रहा और 1292 में फिर उठा, जब उसके राजकुमार जयकटवांग ने सिंहसारी के कृतनगर को मार डाला। एक वर्ष बाद मजपहित ने उसका अन्त कर दिया।
शासक
- 1ऐर्लंग्गाजावा का राज्य फिर बनाया, फिर बाँटा1019–1042
- 2जयवर्षc. 1104
- 3कामेश्वर प्रथमस्मरदहन एक राजा कामेश्वर को समर्पित हैc. 1116–1135
- 4जयभयउनके लिए काकाविन भारतयुद्ध रचा गयाc. 1135–1157
- 5कृतजय (श्रृंग)गन्तेर में केन अरोक से पराजितc. 1194–1222
उनकी विरासत
- काकाविन भारतयुद्ध (1157), जावानी महाभारत युद्ध
- स्मरदहन, हरिवंश और घटोत्कचाश्रय
- पेनातरान के आरम्भिक मन्दिर, पूर्वी जावा का सबसे बड़ा मन्दिर परिसर
- जयभय का नाम, जो आज भी पूरे जावा में लिया जाता है
