आज भी खड़ा

श्री वेंकटेश्वर मंदिर, तिरुमला

शेषाचलम की सातवीं पहाड़ी पर वेंकटेश्वर का धाम, जहाँ भगवान इस कलियुग में शरण देने के लिए खड़े हैं। संसार के गिने-चुने तीर्थों में ही इतने यात्री पहुँचते हैं।

निर्माण: अति प्राचीन धाम; पल्लव काल से शिलालेख; चोल, पाण्ड्य और विजयनगर ने विस्तार कियास्थान: आंध्र प्रदेशदेवता: भगवान विष्णु, श्री वेंकटेश्वर (बालाजी, श्रीनिवास) रूप में13.68° N, 79.35° E
  1. 966 ई.
  2. 1513–1521
  3. 1843
  4. 1933
चित्र: Adityamadhav83 · CC BY-SA 3.0

01सात पहाड़ियों के स्वामी

वराह और भविष्योत्तर पुराणों से संकलित वेंकटाचल माहात्म्य बताता है कि माता लक्ष्मी के वैकुण्ठ छोड़ देने पर श्रीविष्णु इन पहाड़ियों पर आए और राजा आकाश राज की पुत्री पद्मावती से विवाह किया। विवाह के लिए उन्होंने कुबेर से ऋण लिया, और भक्त कहते हैं कि हुण्डी में डाली गई भेंट से वह ऋण आज भी चुकाया जा रहा है। सात पहाड़ियाँ आदिशेष के सात फण मानी जाती हैं। भक्त कल्याणकट्टा में अपने केश अर्पित करते हैं, और बहुत से लोग आज भी अलिपिरि मार्ग की 3,550 सीढ़ियाँ नंगे पैर चढ़ते हैं।

02रानियाँ, राजा और एक गायक

दीवारों पर एक हज़ार से अधिक शिलालेख हैं। 966 ई. में पल्लव रानी सामवै ने चाँदी की वह मूर्ति दी जिसकी आज भोग श्रीनिवास के रूप में पूजा होती है, और उसके दीपों के लिए भूमि भी। रामानुजाचार्य ने पूजा का वह क्रम बाँधा जिसे पुजारी आज भी निभाते हैं। विजयनगर के कृष्णदेवराय 1513 से 1521 के बीच कम से कम सात बार आए, और राजा तथा उनकी दो रानियों, तिरुमला देवी और चिन्ना देवी, की ताँबे की प्रतिमाएँ हाथ जोड़े आज भी प्रवेश के पास खड़ी हैं। तल्लपाक के कवि अन्नमाचार्य ने 15वीं शताब्दी में वेंकटेश्वर के हज़ारों कीर्तन गाए; उनके वंशजों ने उन्हें ताम्रपत्रों पर खुदवाया, जो 20वीं शताब्दी में मंदिर के एक बंद कक्ष में मिले।

03पहाड़ी का प्रबंध

17वीं और 18वीं शताब्दी के अशांत समय में मंदिर गोलकोण्डा, फिर अर्काट के नवाबों और फिर ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन रहा, जो चढ़ावे में हिस्सा लेती थी। 1843 में कम्पनी ने प्रबंध हाथीरामजी मठ के महंतों को सौंप दिया, जिन्होंने नब्बे वर्ष उसे सँभाला। 1932 के मद्रास कानून से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बना, जिसने 1933 में कार्यभार लिया। आज वही मंदिर, रोज़ लाखों को भोजन कराने वाला निःशुल्क अन्नदानम, विद्यालय, अस्पताल और श्री वेंकटेश्वर वैदिक विश्वविद्यालय चलाता है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 966 ई.पल्लव रानी सामवै ने चाँदी की भोग श्रीनिवास मूर्ति और दान दिए।
  2. 1513–1521कृष्णदेवराय बार-बार आए और सोने-जवाहरात के बड़े दान दिए।
  3. 1843ईस्ट इंडिया कम्पनी ने प्रबंध हाथीरामजी मठ को सौंपा।
  4. 19331932 के अधिनियम के अंतर्गत तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ने कार्यभार लिया।
दर्शन और यात्रा

दर्शन की बुकिंग पहले से टीटीडी से करें। तिरुपति से अलिपिरि पैदल मार्ग में तीन-चार घंटे लगते हैं; दर्शन के लिए धोती या साड़ी अपेक्षित है।

श्रीवारि सुप्रभातम्, तिरुमलाSVBCTTD LIVE TV · YouTube से चलता है