अठारह दिनों में कौरव सेना नष्ट हुई और हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का अभिषेक हुआ।
01अठारह दिन
महर्षि वेदव्यास के महाभारत में इस युद्ध के चार पर्व हैं, जो कौरवों के चार सेनापतियों के नाम पर हैं। भीष्म दस दिन तक लड़े, फिर शरशय्या पर लेट गए। द्रोण ने पाँच दिन सेना चलाई, कर्ण ने दो दिन, और अन्तिम दिन शल्य ने। रणभूमि में अठारह अक्षौहिणी सेना उतरी, सात पाण्डवों की और ग्यारह दुर्योधन की। तेरहवें दिन अभिमन्यु चक्रव्यूह में वीरगति को प्राप्त हुए। अठारहवें दिन द्वैपायन सरोवर पर भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ी। व्यास से दिव्य दृष्टि पाकर संजय ने सारा युद्ध अन्धे राजा धृतराष्ट्र को सुनाया।
02परम्परा की तिथि
परम्परागत गणना के अनुसार श्रीकृष्ण 3102 ई.पू. में धराधाम से गए, उसी दिन कलियुग आरम्भ हुआ, और उससे पहले युधिष्ठिर युद्ध के बाद छत्तीस वर्ष राज कर चुके थे। इस हिसाब से युद्ध लगभग 3138 ई.पू. में हुआ। आधुनिक विद्वानों ने खगोल और पुरातत्त्व के आधार पर दूसरी तिथियाँ सुझाई हैं; हिन्दू परम्परा में परम्परागत तिथि ही मान्य है। थानेसर के पास ज्योतिसर में, जहाँ गीता कही गई मानी जाती है, आज भी तीर्थयात्री जाते हैं, और सूर्यग्रहण पर कुरुक्षेत्र के सरोवरों में स्नान के लिए भीड़ उमड़ती है।

इस युद्ध के साथ द्वापर युग समाप्त हुआ, और इसकी रणभूमि में कही गई गीता सनातन धर्म का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ बनी।

