10 फ़रवरी 1846 को सोबराँव में कंपनी जीती और लाहौर की संधि से जालंधर दोआब तथा भारी हर्जाना ले लिया।
01आठ सप्ताह में चार युद्ध
ख़ालसा ने 11 दिसंबर 1845 को सतलुज पार की। 18 दिसंबर को मुदकी में कंपनी ने कठिन संध्याकालीन लड़ाई झेली। 21–22 दिसंबर को फ़िरोज़शाह में सिख मोर्चों और तोपचियों ने गफ़ की सेना को लगभग तोड़ दिया था; अंग्रेज़ अफ़सरों ने लिखा कि वह रात उनकी सबसे बुरी रातों में थी। फिर भी ताज़ा सेना के साथ पहुँचे तेज सिंह बिना धावा बोले लौट गए। 28 जनवरी 1846 को अलीवाल में रणजोध सिंह हारे। 10 फ़रवरी को सोबराँव में सिख पीठ पर नदी रखकर लड़े; नावों का पुल टूट गया और हज़ारों सतलुज में डूब मरे। श्वेत वस्त्र पहने वृद्ध सेनापति शाम सिंह अटारीवाला अंतिम धावे का नेतृत्व करते हुए गिरे।
02लाहौर की संधि
9 मार्च 1846 की लाहौर संधि से बालक महाराजा दलीप सिंह गद्दी पर बने रहे, पर पंजाब ने जालंधर दोआब खो दिया, उसकी सेना घटा दी गई, और लाहौर में अंग्रेज़ रेज़िडेंट बैठ गया। कंपनी ने डेढ़ करोड़ रुपये का हर्जाना माँगा। पूरा न चुका सकने पर दरबार ने कश्मीर और पहाड़ी प्रदेश सौंप दिए, जिन्हें एक सप्ताह बाद अमृतसर की संधि से कंपनी ने 75 लाख रुपये में जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेच दिया। इसी बिक्री से जम्मू-कश्मीर राज्य बना।

इस युद्ध ने सिख साम्राज्य की स्वतंत्रता तोड़ दी और अंतिम बड़ी भारतीय सत्ता पंजाब को कंपनी के लिए खोल दिया।
