प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध

पक्षसिख ख़ालसा सेनालाल सिंह और तेज सिंह; सोबराँव में शाम सिंह अटारीवाला
1845 ई.बनाम
विजेताईस्ट इंडिया कंपनीसर ह्यू गफ़; गवर्नर-जनरल सर हेनरी हार्डिंग

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के छह वर्ष बाद ख़ालसा सेना ने सतलुज पार की और चार कड़े युद्धों में कंपनी से लड़ी; तब भी और बाद में भी बहुतों का मानना रहा कि उसके अपने सेनापतियों ने उसे धोखा दिया।

तिथि: दिसंबर 1845 – फ़रवरी 1846 ई.स्थान: मुदकी, फ़िरोज़शाह, अलीवाल और सोबराँव, सतलुज के किनारेप्रकार: अभियान
चित्र: J. Harris (etcher), Henry Martens, after Major G. F. White, · Public domain
परिणाम

10 फ़रवरी 1846 को सोबराँव में कंपनी जीती और लाहौर की संधि से जालंधर दोआब तथा भारी हर्जाना ले लिया।

01आठ सप्ताह में चार युद्ध

ख़ालसा ने 11 दिसंबर 1845 को सतलुज पार की। 18 दिसंबर को मुदकी में कंपनी ने कठिन संध्याकालीन लड़ाई झेली। 21–22 दिसंबर को फ़िरोज़शाह में सिख मोर्चों और तोपचियों ने गफ़ की सेना को लगभग तोड़ दिया था; अंग्रेज़ अफ़सरों ने लिखा कि वह रात उनकी सबसे बुरी रातों में थी। फिर भी ताज़ा सेना के साथ पहुँचे तेज सिंह बिना धावा बोले लौट गए। 28 जनवरी 1846 को अलीवाल में रणजोध सिंह हारे। 10 फ़रवरी को सोबराँव में सिख पीठ पर नदी रखकर लड़े; नावों का पुल टूट गया और हज़ारों सतलुज में डूब मरे। श्वेत वस्त्र पहने वृद्ध सेनापति शाम सिंह अटारीवाला अंतिम धावे का नेतृत्व करते हुए गिरे।

02लाहौर की संधि

9 मार्च 1846 की लाहौर संधि से बालक महाराजा दलीप सिंह गद्दी पर बने रहे, पर पंजाब ने जालंधर दोआब खो दिया, उसकी सेना घटा दी गई, और लाहौर में अंग्रेज़ रेज़िडेंट बैठ गया। कंपनी ने डेढ़ करोड़ रुपये का हर्जाना माँगा। पूरा न चुका सकने पर दरबार ने कश्मीर और पहाड़ी प्रदेश सौंप दिए, जिन्हें एक सप्ताह बाद अमृतसर की संधि से कंपनी ने 75 लाख रुपये में जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेच दिया। इसी बिक्री से जम्मू-कश्मीर राज्य बना।

सिख साम्राज्य (सरकार-ए-ख़ालसा)
राजवंश · 1799–1849 ई.सिख साम्राज्य (सरकार-ए-ख़ालसा)रणजीत सिंह ने 1799 में लाहौर लिया और 1801 में पंजाब के महाराजा घोषित हुए। उन्होंने सिख मिसलों को एक राज्य में जोड़ा, अफ़गानों को ख़ैबर के पार धकेला, और अंग्रेज़ों का सामना करने वाली अन्तिम बड़ी भारतीय सेना खड़ी की; उनके देहान्त के दस वर्ष बाद 1849 में साम्राज्य अंग्रेज़ी राज में मिला लिया गया।पढ़ें →
महत्त्व

इस युद्ध ने सिख साम्राज्य की स्वतंत्रता तोड़ दी और अंतिम बड़ी भारतीय सत्ता पंजाब को कंपनी के लिए खोल दिया।