01कुम्भा का आश्रय
मेवाड़ को चित्तौड़ के पीछे एक सुरक्षित गढ़ चाहिए था, और कुम्भा ने उसे यहाँ मारवाड़ की सीमा पर बनाया। उनके स्थपति मण्डन ने, जिन्होंने वास्तु ग्रन्थ राजवल्लभ लिखा, ऐसी दीवार बनाई जिसके ऊपर कई घुड़सवार साथ चल सकें, और उसके भीतर 300 से अधिक जैन और हिन्दू मन्दिर, खेत और इतने जलाशय रखे कि घेरे में सेना का पेट भरे। 1468 में कुम्भा की यहीं उनके पुत्र उदयसिंह (ऊदा) ने पूजा करते समय हत्या कर दी। 1537 में धाय पन्ना ने शिशु उदयसिंह द्वितीय को बनबीर से बचाया और वे इसी दुर्ग में पले; उनके पुत्र प्रताप का जन्म 1540 में यहीं हुआ।
02एकमात्र पराजय
हल्दीघाटी के बाद अकबर ने शाहबाज़ ख़ाँ को प्रताप के पहाड़ी गढ़ों पर भेजा। अप्रैल 1578 में कुम्भलगढ़ गिरा, यह इसकी एकमात्र पराजय थी; प्रताप पहले ही निकल चुके थे और पहाड़ों से युद्ध जारी रखा। 1580 के दशक में उन्होंने कुम्भलगढ़ सहित मेवाड़ का अधिकांश भाग वापस जीत लिया। दीवारों के भीतर ऊँचे शिवलिंग वाला नीलकण्ठ महादेव मन्दिर आज भी नित्य पूजा में है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1443–1458 ई.मण्डन की योजना पर राणा कुम्भा ने बनवाया।
- 1468 ई.राणा कुम्भा की यहीं उनके पुत्र उदयसिंह (ऊदा) ने हत्या की।
- 1540 ई.दुर्ग में महाराणा प्रताप का जन्म।
- अप्रैल 1578अकबर के सेनापति शाहबाज़ ख़ाँ ने लिया; एकमात्र पराजय।
- 2013 ई.यूनेस्को की राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों की सूची में।
उदयपुर से लगभग 85 कि.मी. उत्तर। सूर्यास्त के समय दीवार पर कुछ दूर चलिए; शाम का प्रकाश कार्यक्रम हिन्दी और अंग्रेज़ी में होता है।






