मैदान सिकन्दर के हाथ रहा, पर पुरु का राज्य बना रहा और मित्र बनकर उन्हें और भूमि मिली।
01रात में नदी पार
उफनती नदी के उस पार पुरु अपने हाथियों के साथ डटे थे, और कई दिनों तक सिकन्दर पार न उतर सका। एरियन लिखता है कि अन्त में वह आँधी-तूफ़ान की एक रात ऊपर की ओर से नदी पार कर गया और एक टुकड़ी पुरु के शिविर के सामने छोड़ गया। पुरु का पुत्र रथ लेकर निकला और कीचड़ में मारा गया। मुख्य युद्ध में हाथियों ने मकदूनियाई पंक्तियाँ रौंद डालीं, फिर पीछे धकेले गए। घायल पुरु अन्त तक हाथी से लड़ते रहे और सिकन्दर के सामने लाए गए। पूछा गया कि उनसे कैसा व्यवहार हो, तो बोले: जैसा राजा से होता है। एरियन ने यह उत्तर दर्ज किया है।
02व्यास पर ठहराव
सिकन्दर ने पुरु को उनका राज्य लौटाया और उसमें और भूमि जोड़ी। वह आगे हाइफ़ेसिस, यानी व्यास नदी, तक गया, और वहाँ उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। प्लूटार्क लिखता है कि पुरु से युद्ध ने उनका साहस तोड़ दिया था, और आगे गंगरिडाई और प्रासियों, अर्थात मगध के नन्द राज्य, की विशाल सेनाओं की खबर ने बाकी कसर पूरी कर दी। कुछ ही वर्षों में चन्द्रगुप्त मौर्य ने पंजाब से यूनानी चौकियाँ उखाड़ दीं।

भारत में सिकन्दर का यह सबसे कठिन युद्ध था, और इसके कुछ महीने बाद उसका पूर्व की ओर अभियान थम गया।
