पानी और रसद से कटा निज़ाम बिना बड़ी लड़ाई के समझौते पर आ गया।
01दौड़
1727 में निज़ाम ने छत्रपति शाहू के विरुद्ध एक प्रतिद्वंद्वी दावे का साथ दिया और पुणे की ओर बढ़ा। बाजीराव ने सामने खड़े होने के बजाय अपनी हल्की घुड़सवार सेना उत्तर में ख़ानदेश और गुजरात की ओर ले गए, निज़ाम के अपने इलाक़ों को धमकाते हुए, और निज़ाम को तोपों और सामान के साथ पीछे मुड़ना पड़ा। बाजीराव पहुँच से ज़रा बाहर रहे, सेना को थकाया, फिर उसे पालखेड के पास निर्जल भूमि में खींचकर रास्ते बंद कर दिए।
02मुंगी शेवगाँव
मार्च 1728 की मुंगी शेवगाँव संधि से निज़ाम ने शाहू को एकमात्र छत्रपति माना और दक्कन में चौथ और सरदेशमुखी पर मराठों का अधिकार स्वीकार किया। फ़ील्ड मार्शल मॉन्टगोमरी ने अपनी पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ वॉरफ़ेयर’ में इस अभियान को सामरिक गतिशीलता का आदर्श उदाहरण बताया।

पालखेड ने पेशवा को दक्कन का स्वामी बनाया और मराठों को उत्तर की ओर बढ़ने के लिए मुक्त किया।

