01मेड़ता और चित्तौड़
वे मेड़ता के संस्थापक राव दूदा की पौत्री थीं और वहीं पलीं; परिवार की परम्परा कहती है कि बचपन में मिली कृष्ण की एक मूर्ति उनके मन में पति बन गई। लगभग 1516 में उनका विवाह मेवाड़ के राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ। भोजराज का कम आयु में देहांत हो गया, और सती होने से तथा साधुओं के बीच कृष्ण के सामने गाना-नाचना छोड़ने से इनकार करने पर दरबार उनका विरोधी हो गया। उनके अपने पद राणा के भेजे विष के प्याले की बात करते हैं, जिसे उन्होंने चरणामृत मानकर पी लिया।
02वृन्दावन और द्वारका
वे मेवाड़ छोड़कर वृन्दावन और बाद में द्वारका गईं। परम्परा संत रैदास को उनका गुरु मानती है, और उनके कई पद यही कहते हैं। कहते हैं, विपत्तियाँ आने पर मेवाड़ के दरबार ने उन्हें लौटा लाने के लिए ब्राह्मण भेजे; उन्होंने अंतिम बार रणछोड़जी के दर्शन की अनुमति माँगी, और द्वारका की परम्परा कहती है कि विग्रह पर केवल उनकी साड़ी मिली। उनके पद ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ और ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ गुजरात से बंगाल तक मंदिरों और घरों में गाए जाते हैं।

“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।”
Pad of Meerabai (Mirabai ki Padavali, ed. Parashuram Chaturvedi)


