खंडहर

शनिवारवाडा, पुणे

पेशवाओं का महल-किला, जहाँ से लगभग नब्बे वर्ष मराठा संघ चलाया गया। 1828 की आग के बाद केवल दीवारें और दरवाज़े बचे।

निर्माण: 1730–1732, पेशवा बाजीराव प्रथमस्थान: महाराष्ट्र18.52° N, 73.86° E
  1. 10 जनवरी 1730
  2. 30 अगस्त 1773
  3. 17 नवंबर 1817
  4. फ़रवरी 1828
चित्र: Kshitij Charania · CC BY-SA 4.0

01पेशवाओं का केन्द्र

बाजीराव प्रथम ने शनिवार, 10 जनवरी 1730 को इसकी नींव रखी, इसीसे इसका नाम पड़ा, और 1732 में यहाँ रहने आए। इसका मुख्य द्वार, दिल्ली दरवाज़ा, उत्तर में मुगल राजधानी की ओर है, और हाथियों से बचाव के लिए इसके किवाड़ों पर लोहे के नुकीले कीले हैं। यहीं से बाजीराव, नानासाहेब और माधवराव ने वह राज्य चलाया जिसकी सेनाएँ अटक, बंगाल और तंजावुर तक पहुँचीं। भीतर सात मंज़िला महल, शीशे और रंगी लकड़ी के दालान, और हज़ारी कारंजे, हज़ार धाराओं वाला फव्वारा, थे।

02हत्या, समर्पण, आग

30 अगस्त 1773 को युवा पेशवा नारायणराव की महल के भीतर पहरेदारों ने हत्या कर दी, एक षड्यंत्र में जिसका संबंध उनके चाचा रघुनाथराव से जोड़ा जाता है। खडकी की लड़ाई के बाद 17 नवंबर 1817 को अंग्रेज़ों ने वाडे पर अपना झंडा फहराया, और अगले वर्ष पेशवाई समाप्त हुई। फ़रवरी 1828 में आग लगी और लगभग एक सप्ताह जलती रही, जिससे भीतर का महल नष्ट हो गया। आज केवल किलेबंद दीवारें, पाँच दरवाज़े और दालानों के पत्थर के चबूतरे खड़े हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 10 जनवरी 1730बाजीराव प्रथम ने नींव रखी।
  2. 30 अगस्त 1773महल के भीतर पेशवा नारायणराव की हत्या।
  3. 17 नवंबर 1817वाडे पर अंग्रेज़ी झंडा फहराया गया।
  4. फ़रवरी 1828सप्ताह भर चली आग ने महल के भवन नष्ट कर दिए।
दर्शन और यात्रा

पुणे के पुराने नगर में कसबा पेठ के पास। संध्या को ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम होता है।