01दो लिंग, एक गर्भगृह
मंदिर की अपनी कथा हर तीर्थयात्री को पहले पड़ाव पर ही सुनाई जाती है। श्रीराम इस तट पर महादेव की पूजा करना चाहते थे और उन्होंने हनुमान जी को कैलास से लिंग लाने भेजा। हनुमान जी को देर हुई, शुभ मुहूर्त निकल रहा था, तब माता सीता ने अपने हाथों से बालू का लिंग बनाया। गर्भगृह में वही रामलिंगम है। हनुमान जी विश्वलिंगम लेकर लौटे तो श्रीराम ने उसे पहले लिंग के पास स्थापित कराया और आदेश दिया कि पूजा पहले इसी की हो। पुजारी आज भी यही नियम निभाते हैं। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में पुष्पक विमान से लौटते हुए श्रीराम सीता जी को सेतु दिखाकर कहते हैं कि यहीं महादेव ने उन पर कृपा की थी।
02कुएँ, गलियारे और काशी का जल
परकोटे के भीतर बाईस तीर्थ हैं, कुएँ और कुण्ड। अग्नि तीर्थम में समुद्र-स्नान के बाद तीर्थयात्री दर्शन से पहले एक-एक कर सभी कुओं के जल से स्नान करते हैं। गर्भगृह को घेरने वाले गलियारे, जिनके खंभों पर नक्काशी और छतों पर चित्रकारी है, भारत के किसी भी मंदिर के गलियारों से लंबे हैं। यह अधिकांश पत्थर का काम 17वीं-18वीं शताब्दी में रामनाथपुरम के सेतुपति राजाओं ने कराया, जो पीढ़ियों से सेतु के रक्षक थे। पुरानी परंपरा उत्तर और दक्षिण को जोड़ती है: काशी से गंगाजल लाकर रामनाथ पर चढ़ाओ, फिर रामेश्वरम की बालू गंगा में ले जाकर अर्पित करो।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 12वीं शताब्दीपत्थर का गर्भगृह बना, बाद में पाण्ड्य और जाफना के शासकों ने इसमें जोड़ा।
- 17वीं–18वीं शताब्दीरामनाथपुरम के सेतुपतियों ने खंभों वाले विशाल गलियारे बनवाए।
दर्शन से पहले अग्नि तीर्थम और फिर मंदिर के 22 कुओं में स्नान करें। सेतु का आरंभ-स्थल धनुषकोडि लगभग 20 किमी दूर है।






