खंडहर

चित्तौड़गढ़

मेवाड़ का पहाड़ी दुर्ग, मैदान से 180 मीटर ऊँचा और लगभग 13 कि.मी. के घेरे में। तीन बार घेरा गया और जीता गया, 1303, 1535 और 1568 में, और हर बार स्त्रियों ने जौहर चुना। विजय स्तम्भ आज भी उसके ऊपर खड़ा है।

निर्माण: 8वीं शताब्दी से गुहिल राजधानी (परम्परा के अनुसार बाप्पा रावल, लगभग 734)स्थान: राजस्थान (चित्तौड़गढ़)24.89° N, 74.65° E
  1. लगभग 734 ई.
  2. 1303 ई.
  3. लगभग 1326 ई.
  4. 1448 ई.
  5. 1535 ई.
  6. 23 फ़रवरी 1568
  7. 2013 ई.
चित्र: Deepank Ranka · CC BY-SA 4.0

011303: अलाउद्दीन ख़िलजी

अलाउद्दीन ख़िलजी ने जनवरी 1303 में चित्तौड़ घेरा और लगभग आठ महीने बाद, अगस्त में, उसे ले लिया। साथ रहे अमीर ख़ुसरो ने ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह में लिखा कि सुल्तान ने एक दिन में हज़ारों हिन्दुओं को मरवाया और दुर्ग का नाम अपने बेटे के नाम पर ख़िज़्राबाद रखा। शासक थे रावल रतन सिंह। रानी पद्मिनी और उनके जौहर का वृत्तान्त मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत (1540) और मेवाड़ की चारण परम्परा से आता है; उस समय के फ़ारसी इतिहास उनका नाम नहीं लेते। लगभग दो दशकों में सिसोदिया शाखा के राणा हम्मीर ने चित्तौड़ वापस जीत लिया।

02कुम्भा का स्तम्भ

राणा कुम्भा ने 1437 में मालवा के महमूद ख़िलजी को हराया और इसकी स्मृति में विजय स्तम्भ बनवाया, 37 मीटर ऊँचा नौ तलों का स्तम्भ, जो 1448 में पूरा हुआ। यह विष्णु को समर्पित है और इसकी भीतरी दीवारें हिन्दू देवताओं की तराशी हुई सूची हैं, हर मूर्ति के पास उसका नाम खुदा है। पास ही पुराना कीर्ति स्तम्भ है, 12वीं शताब्दी का, जिसे एक जैन श्रेष्ठी ने आदिनाथ के लिए बनवाया। दुर्ग पर कालिका माता मन्दिर, कुम्भश्याम मन्दिर और वह छोटा मन्दिर है जहाँ मीराबाई पूजा करती थीं।

031535 और 1568

1535 में गुजरात के बहादुरशाह ने दुर्ग पर धावा बोला; राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती ने दूसरा जौहर किया। अक्टूबर 1567 में अकबर ने घेरा डाला। उदयसिंह द्वितीय पहाड़ों में चले गए और रक्षा मेड़ता के जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया ने सँभाली। 22–23 फ़रवरी 1568 की रात जयमल स्वयं अकबर की बन्दूक़ की गोली से गिरे, जौहर की आग जली और भोर में दुर्ग पर धावा हुआ। अबुल फ़ज़ल का अकबरनामा लिखता है कि उसके बाद के क़त्लेआम में लगभग 30,000 लोग मारे गए। मेवाड़ की राजधानी उदयपुर चली गई और चित्तौड़ फिर कभी गद्दी नहीं बना।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. लगभग 734 ई.मेवाड़ परम्परा के अनुसार बाप्पा रावल ने चित्तौड़ लिया।
  2. 1303 ई.आठ महीने के घेरे के बाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने दुर्ग लिया; पहला जौहर।
  3. लगभग 1326 ई.राणा हम्मीर ने सिसोदियों के लिए चित्तौड़ वापस लिया।
  4. 1448 ई.राणा कुम्भा ने विजय स्तम्भ पूरा किया।
  5. 1535 ई.गुजरात के बहादुरशाह ने दुर्ग लिया; रानी कर्णावती का जौहर।
  6. 23 फ़रवरी 1568जयमल के गिरने के बाद अकबर का धावा; तीसरा जौहर और क़त्लेआम।
  7. 2013 ई.यूनेस्को की राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों की सूची में शामिल।
दर्शन और यात्रा

सड़क सात द्वारों से होकर ऊपर जाती है; पूरा दिन रखिए। शाम को ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम होता है।