चित्तौड़गढ़ का तीसरा साका

पक्षमेवाड़ की दुर्ग सेनामेड़ता के जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया (पत्ता चूँडावत)
1568 ई.बनाम
विजेतामुग़ल सेनाअकबर

राणा उदयसिंह पहाड़ों में चले गए और चित्तौड़ जयमल और पत्ता को सौंप दिया। अकबर ने स्वयं चार महीने तक सुरंगों और ढकी हुई खाइयों से घेरा डाला।

तिथि: अक्टूबर 1567 – 23 फ़रवरी 1568 ई.स्थान: चित्तौड़गढ़, राजस्थानप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Abul Fazl V&A Museum · Public domain
परिणाम

जौहर के बाद 23 फ़रवरी 1568 को दुर्ग गिरा; अकबर ने भीतर शरण लिए लोगों के कत्लेआम का आदेश दिया।

01सुरंगें और बन्दूक की गोली

अकबर के कारीगरों ने प्राचीरों के नीचे सुरंगें खोदीं। जब दो सुरंगें उड़ाई गईं, तो दरार की ओर दौड़े अनेक मुग़ल ही धमाके में मारे गए। ‘साबात’ नामक ढकी हुई खाइयाँ दीवारों तक बढ़ाई गईं। 22 फ़रवरी की रात अकबर ने एक दरार पर मरम्मत करवाते सेनानायक को देखा और अपनी बन्दूक ‘संग्राम’ से गोली मारी। वह जयमल थे। रात भर दुर्ग में जौहर की ज्वालाएँ उठती रहीं, और भोर में दुर्ग सेना लड़ने निकली। पत्ता उन्हीं में वीरगति को प्राप्त हुए।

02कत्लेआम और फ़तहनामा

अबुल फ़ज़ल लिखता है कि आठ हज़ार राजपूत योद्धाओं के अतिरिक्त लगभग चालीस हज़ार किसान भी दुर्ग में आकर रक्षा में लगे थे, और अकबर के आम कत्लेआम के आदेश पर लगभग तीस हज़ार मारे गए। मार्च 1568 में जारी अकबर का चित्तौड़ फ़तहनामा इस विजय को काफ़िरों के विरुद्ध युद्ध कहता है। बाद में उसने अपने दुर्ग के एक द्वार पर हाथियों पर बैठे जयमल और पत्ता की पत्थर की मूर्तियाँ लगवाईं, शत्रुओं के साहस के सम्मान में।

मेवाड़ के गुहिल और सिसोदिया
राजवंश · लगभग छठी शताब्दी–1949 ई.मेवाड़ के गुहिल और सिसोदियाबप्पा रावल से महाराणा प्रताप तक मेवाड़ के घराने ने दिल्ली से आई हर शक्ति के सामने अपनी पहाड़ियाँ थामे रखीं। यह संसार के सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले राजवंशों में है।पढ़ें →
महत्त्व

चित्तौड़ का तीसरा और अन्तिम साका; मेवाड़ की राजधानी सदा के लिए उदयपुर चली गई, और महाराणा प्रताप ने दुर्ग वापस पाने के संघर्ष में जीवन लगा दिया।