01विट्ठल को भोग लगाने वाला बालक
उनका जन्म आज के हिंगोली ज़िले के नरसी गाँव में हुआ और वे पंढरपुर में दर्ज़ियों के परिवार में पले। सबसे प्रिय कथा बताती है कि बालक नामदेव को विट्ठल को भोग लगाने भेजा गया और वे तब तक रोते रहे जब तक विग्रह ने भोग ग्रहण नहीं किया। वे ज्ञानेश्वर के साथ उत्तर की तीर्थयात्रा पर गए, और अपने अभंगों में आळंदी में ज्ञानेश्वर की समाधि का वर्णन किया। वारकरियों का कीर्तन, भगवान के सामने गाना, कथा कहना और नाचना, उन्हीं से आरम्भ होता है।
02घुमान और पंढरपुर की सीढ़ी
जीवन के उत्तरार्ध में वे लगभग बीस वर्ष पंजाब में, गुरदासपुर ज़िले के घुमान में रहे, जहाँ उनके नाम का गुरुद्वारा है। 1604 में गुरु अर्जन ने आदि ग्रंथ का संकलन किया तो उसमें नामदेव के लगभग साठ शबद रखे, पुरानी हिंदी में, जिसमें मराठी और पंजाबी का पुट है। नामदेव ने कहा था कि उन्हें पंढरपुर के विट्ठल मंदिर की पहली सीढ़ी के नीचे रखा जाए, ताकि हर भक्त का चरण उन्हें छुए। वह सीढ़ी ‘नामदेव पायरी’ कहलाती है, और यात्री चढ़ने से पहले उसे प्रणाम करते हैं।


