01नामग्याल महल
लेह सिंधु की एक उपघाटी में लगभग 3,500 मीटर की ऊँचाई पर बसा है, जहाँ कश्मीर, तिब्बत, यारकंद और कुल्लू के व्यापार-मार्ग मिलते थे। राजा सेंगे नामग्याल ने 17वीं शताब्दी में नगर के ऊपर की धार पर कच्ची ईंटों का बड़ा महल बनवाया, और पास ही नदी के किनारे हेमिस, थिकसे और शे के मठ बढ़े। 1834 से 1840 के बीच ज़ोरावर सिंह के डोगरा अभियानों ने लद्दाख को जम्मू के राजा गुलाब सिंह के अधीन किया, और लेह में डोगरा हाकिम बैठा। मई 1841 में ज़ोरावर लेह से ऊपरी सिंधु के साथ मानसरोवर की ओर बढ़े; दिसंबर में तोयो में वे वीरगति को प्राप्त हुए, और फिर लेह को घेरने आए तिब्बती हराए गए, जिसके बाद 1842 की चुशूल संधि ने पुरानी सीमा तय की।
021948 और उसके बाद
1948 में गिलगित और स्कर्दू से आए हमलावर सिंधु के साथ लेह की ओर बढ़े। 24 मई 1948 को एयर कमोडोर मेहर सिंह ने लेह की एक कच्ची पट्टी पर डकोटा उतारा, ऐसी ऊँचाई पर जहाँ पहले किसी मालवाहक विमान ने प्रयास नहीं किया था, और सैनिक तथा शस्त्र हवाई मार्ग से पहुँचे; नवंबर में टैंकों ने ज़ोजिला पार किया और लेह का मार्ग खुला। 1997 से हर जून लेह के पास शे में सिंधु के तट पर सिंधु दर्शन उत्सव होता है, जहाँ पूरे भारत से आए श्रद्धालु नदी की पूजा करते हैं। 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश बना, और लेह उसकी राजधानी।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1834–40ज़ोरावर सिंह के अभियान लद्दाख को जम्मू के अधीन करते हैं।
- मई 1841ज़ोरावर सिंह लेह से पश्चिमी तिब्बत की ओर कूच करते हैं।
- 1842चुशूल संधि लद्दाख–तिब्बत सीमा तय करती है।
- 24 मई 1948पहला विमान सहायता लेकर लेह उतरता है।
- 31 अक्टूबर 2019लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश बनता है, लेह राजधानी।
कहीं और ऊपर जाने से पहले लेह में पूरा एक दिन विश्राम करें; ऊँचाई का असर गंभीर होता है।





