चित्र: Dr.jayan.d · CC BY-SA 3.0
वैज्ञानिक

आचार्य सुश्रुत

शल्य चिकित्सा के जनक, सुश्रुत संहिता के रचयिता

काशी, ईसा पूर्व (समय पर मतभेद)

सुश्रुत ने काशी में दिवोदास धन्वन्तरि से शल्य-विद्या सीखी और उसे सुश्रुत संहिता में लिखा। इस ग्रन्थ में जीवित त्वचा के टुकड़े से नाक बनाने, मोतियाबिन्द की शल्यक्रिया और सौ से अधिक शल्य-यन्त्रों का वर्णन है।

01नई नाक

पुराने भारत में नाक काटना एक दण्ड था, और सुश्रुत (सूत्रस्थान 16) बताते हैं कि उसे कैसे जोड़ें। कटे भाग जितना एक पत्ता लें, गाल से उसी नाप का त्वचा का टुकड़ा काटें पर एक सिरा जुड़ा रहने दें ताकि रक्त पहुँचता रहे, उसे घाव पर पलटकर सिलें, और साँस का मार्ग खुला रखने के लिए दो छोटी नलियाँ लगाएँ। भारत के वैद्यों ने यह कला जीवित रखी। अक्टूबर 1794 में लन्दन की जेंटलमैन्स मैगज़ीन ने पुणे के पास कावसजी नाम के व्यक्ति की माथे की त्वचा से नाक बनाए जाने का विवरण छापा, और यूरोपीय सर्जनों ने वहीं से यह ‘भारतीय पद्धति’ सीखी। आज के प्लास्टिक सर्जन सुश्रुत को अपनी विद्या का संस्थापक मानते हैं।

02शल्य-वैद्य की शिक्षा

सुश्रुत अभ्यास से पहले शिष्य को रोगी छूने नहीं देते थे। उसे लौकी और ककड़ी पर चीरा लगाना, चमड़े पर खुरचना, मृत पशुओं की शिराओं में छेद करना और कपड़े के पुतलों पर पट्टी बाँधना सीखना होता था। उन्होंने शरीर को विच्छेदन से समझने पर ज़ोर दिया, शव को बहते जल में गलाकर परत-दर-परत देखने की विधि बताई। संहिता में 101 यन्त्र (कुंद उपकरण) और 20 शस्त्र (धारदार उपकरण), मूत्राशय की पथरी निकालना, टूटी हड्डी जोड़ना और मुड़ी सुई से मोतियाबिन्द हटाना वर्णित है। इसके छह भागों में 186 अध्याय हैं, अन्त में उत्तर तन्त्र जुड़ा है।

बावर पाण्डुलिपि
प्रमाण · लगभग छठी शताब्दी ई.; 1890 में प्राप्तबावर पाण्डुलिपिगुप्तकालीन ब्राह्मी में भोजपत्र के पन्ने, जिनमें सात ग्रन्थ हैं, उनमें तीन चिकित्सा पर, नावनीतक सहित।पढ़ें →