01पश्चिम के द्वारपाल
मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति इस घराने को लक्ष्मण से जोड़ती है, जो श्रीराम के प्रतिहार अर्थात द्वारपाल बने थे, और यह नाम इन पर ठीक बैठा। 712 ई. में अरबों के सिन्ध लेने के बाद उनके सूबेदार राजस्थान, गुजरात और मालवा पर धावे भेजने लगे। प्रशस्ति कहती है कि नागभट प्रथम ने म्लेच्छों की बड़ी सेनाओं को कुचल दिया। 730 के दशक के आसपास पश्चिम के राजाओं ने इन धावों को तोड़ा: नागभट, लाट के चालुक्य पुलकेशी, जिनके 739 ई. के नवसारी ताम्रपत्र में उनकी विजय दर्ज है, और मेवाड़ के गुहिल। प्रतिहारों की पहली राजधानी भीनमाल थी या उज्जैन, इस पर आज भी मतभेद है।
02मिहिर भोज और कन्नौज
पालों और राष्ट्रकूटों से लम्बे त्रिपक्षीय संघर्ष के बाद नागभट द्वितीय ने लगभग 816 ई. में कन्नौज ले लिया। उनके पौत्र मिहिर भोज ने लगभग पचास वर्ष राज किया, और सतलुज से बंगाल की सीमा तक तथा नीचे सौराष्ट्र तक उनका शासन था। उनके चाँदी के सिक्कों पर भगवान विष्णु का वराह रूप और श्रीमद् आदिवराह नाम अंकित है। 851 ई. में लिखने वाले अरब व्यापारी सुलैमान ने कहा कि जुज़्र के राजा के पास भारत के सब राजाओं में सबसे अच्छी घुड़सेना है और वह अरबों का सबसे बड़ा शत्रु है। उनके पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम ने कवि राजशेखर को अपना गुरु माना, और उनके नाटक तथा काव्यमीमांसा कन्नौज में ही लिखे गए।

03पतन और महमूद
लगभग 916 ई. में राष्ट्रकूट इन्द्र तृतीय ने कन्नौज को लूटा, और तब से सामन्त, चन्देल, परमार, चौलुक्य और कलचुरि, स्वयं राजा बन बैठे। 1018 ई. की सर्दियों में जब गज़नी का महमूद कन्नौज पहुँचा, तो राज्यपाल बिना लड़े नगर छोड़ गए। इससे क्रुद्ध होकर चन्देल विद्याधर ने उन्हें मरवा दिया। त्रिलोचनपाल और यशःपाल के समय यह वंश कन्नौज और कड़ा के आसपास टिका रहा; यशःपाल अन्तिम ज्ञात राजा हैं, 1036 ई. के एक अभिलेख से। उनके मन्दिर आज भी खड़े हैं: मुरैना के पास बटेश्वर समूह, ओसियाँ के हरिहर मन्दिर, और ग्वालियर दुर्ग का तेली का मन्दिर।
शासक
- 1नागभट प्रथमअरब धावों को लौटायाc. 730–760
- 2कक्कुस्थ और देवराजc. 760–775
- 3वत्सराजराष्ट्रकूट ध्रुव से पराजितc. 775–805
- 4नागभट द्वितीयकन्नौज जीताc. 805–833
- 5रामभद्रc. 833–836
- 6मिहिर भोजआदिवराह; साम्राज्य का शिखरc. 836–885
- 7महेन्द्रपाल प्रथमराजशेखर के शिष्य और आश्रयदाताc. 885–910
- 8महीपाल प्रथमइन्द्र तृतीय ने कन्नौज लूटाc. 912–944
- 9महेन्द्रपाल द्वितीयc. 944–948
- 10विजयपालc. 954–990
- 11राज्यपाल1018 ई. में कन्नौज महमूद के लिए छोड़ाc. 990–1019
- 12त्रिलोचनपालc. 1019–1027
- 13यशःपालज्ञात अन्तिम राजाc. 1036
उनकी विरासत
- मुरैना के बटेश्वर मन्दिर समूह
- ओसियाँ के आरम्भिक मन्दिर
- मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति
- राजशेखर की काव्यमीमांसा और कर्पूरमंजरी














