01दर्रों के पार लेह तक
गुलाब सिंह की सेवा में वे किश्तवाड़ के सूबेदार के रूप में उभरे। 1834 में वे डोगरा सेना को किश्तवाड़ से दर्रे पार कराकर ज़ांस्कर और लद्दाख ले गए, ऐसे देश में लड़ते हुए जहाँ आधे वर्ष बर्फ़ रास्ते बंद रखती है। 1840 तक के कई अभियानों में लद्दाख जम्मू के अधीन आया और लेह में डोगरा सूबेदार बैठा। 1840 में वे बल्तिस्तान में उतरे और स्कर्दू लिया। इन्हीं विजयों से लद्दाख जम्मू-कश्मीर राज्य का अंग बना, और उसके साथ भारत का।
02तिब्बत में, 1841
मई 1841 में वे कुछ हज़ार डोगरा और लद्दाखी सैनिकों के साथ पूर्व में पश्चिमी तिब्बत की ओर बढ़े, रुदोक और गरतोक लिए और मानसरोवर तथा कैलास के पास तकलाकोट पहुँचे। वे वहीं थे कि 4,000 मीटर से कहीं ऊपर सर्दी उतर आई। चिंग समर्थन वाली तिब्बती सेना ठिठुरते, भूखे शिविर पर टूटी। 12 दिसंबर 1841 को तोयो में वे युद्ध में मारे गए, और उनकी अधिकांश सेना बर्फ़ में मरी या बंदी हुई। 1842 की चुशूल संधि ने बाद में लद्दाख और तिब्बत की पुरानी सीमा फिर मान ली।







