तराइन का दूसरा युद्ध

पक्षचाहमान और सहयोगी राजपूत राजापृथ्वीराज चौहान तृतीय, दिल्ली के गोविन्दराज के साथ
1192 ई.बनाम
विजेताग़ोरीमुहम्मद ग़ोरी

पराजय के एक वर्ष बाद मुहम्मद ग़ोरी घुड़सवार तीरन्दाज़ों की नई सेना लेकर उसी मैदान में लौटा। उसने दिन भर छापामार हमलों से राजपूत सेना को थकाया और साँझ को तोड़ दिया।

तिथि: 1192 ई.स्थान: तराइन (तरावड़ी), थानेसर के पास, हरियाणाप्रकार: युद्ध
चित्र: Anamdas · CC BY-SA 3.0
परिणाम

पृथ्वीराज हारे, पकड़े गए और उन्हें मार दिया गया; गोविन्दराज रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।

01छल का एक दिन

मिन्हाज-उस-सिराज कहता है कि मुहम्मद एक लाख बीस हज़ार घुड़सवार लेकर आया। उसने अपनी हल्की घुड़सेना को चार टुकड़ियों में बाँटा, जो राजपूत सेना के बाज़ुओं और पीछे पर टूटतीं, तीर बरसातीं, और हाथियों तथा भारी घुड़सवारों के बढ़ते ही पीछे हट जातीं, फिर लौट आतीं। फ़िरिश्ता कहता है कि हमला भोर में हुआ, जब हिन्दू शिविर तैयार न था। तीसरे पहर तक राजपूत सेना थककर बिखर चुकी थी। तब मुहम्मद ने रोककर रखे बारह हज़ार ताज़ा कवचधारी घुड़सवार झोंक दिए, और पंक्ति टूट गई।

02अजमेर और दिल्ली का पतन

पृथ्वीराज रणभूमि से निकले और मिन्हाज के अनुसार सरस्वती के पास पकड़े गए और मार दिए गए। गोविन्दराज लड़ते हुए मरे; मिन्हाज कहता है कि पिछले वर्ष के टूटे दाँतों से उन्हें पहचाना गया। अजमेर लिया गया, उसके मन्दिर तोड़े गए, और एक संस्कृत विद्यालय के स्थान पर मस्जिद बनाई जाने लगी, जो आज अढ़ाई दिन का झोंपड़ा कहलाती है और जिसमें अब भी मन्दिरों के स्तम्भ दिखते हैं। कुछ समय तक पृथ्वीराज का पुत्र अजमेर में सामन्त बनाकर छोड़ा गया। 1193 में क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली ले ली।

शाकम्भरी और अजमेर के चाहमान (चौहान)
राजवंश · लगभग सातवीं शताब्दी–1192 ई. (रणथम्भौर शाखा 1301 तक)शाकम्भरी और अजमेर के चाहमान (चौहान)चाहमान साँभर झील के आसपास के सरदारों से बढ़कर अजमेर और दिल्ली के राजा बने। पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 में तराइन में मुहम्मद गोरी को हराया और 1192 में वहीं उससे हारे।पढ़ें →
महत्त्व

तराइन के दूसरे युद्ध ने गंगा का मैदान ग़ोरियों के लिए खोल दिया और 1206 में दिल्ली सल्तनत का मार्ग बना।