01सात कृतियाँ
तीन नाटक: मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् और अभिज्ञानशाकुन्तलम्। दो महाकाव्य: रघुवंशम्, जिसके उन्नीस सर्गों में श्रीराम के वंश के राजा हैं, और कुमारसम्भवम्, पार्वती के तप और शिव से विवाह पर। दो छोटे काव्य: छह ऋतुओं पर ऋतुसंहारम् और मेघदूतम्, जिसमें रामगिरि में निर्वासित यक्ष वर्षा के मेघ से उत्तर में अलका तक अपना सन्देश ले जाने को कहता है, और रास्ते के हर पर्वत, नदी और नगर का, सबसे बढ़कर उज्जैन का, वर्णन करता है। भारतीय परंपरा कहती है ‘उपमा कालिदासस्य’, उपमा में कालिदास।
02यूरोप में शकुन्तला
उनका समय निश्चित नहीं है। परंपरा उन्हें उज्जैन के विक्रमादित्य से जोड़ती है, और अनेक विद्वान गुप्त राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय से, जिन्होंने यह उपाधि ली थी। अन्तिम सीमा निश्चित है: पुलकेशिन द्वितीय का 634 ई. का ऐहोले शिलालेख कहता है कि उसके कवि रविकीर्ति ने कालिदास और भारवि जैसी कीर्ति पाई। 1789 में विलियम जोन्स ने कलकत्ता में शकुन्तला का अंग्रेज़ी अनुवाद छापा। 1791 में गेओर्ग फ़ोर्स्टर ने उसका जर्मन अनुवाद किया, और गेटे ने उसकी प्रशंसा में चार पंक्तियाँ लिखीं; उनके फ़ाउस्ट की प्रस्तावना कालिदास की प्रस्तावना के ढंग पर है।



