01बारभाई
नाना का जन्म 12 फ़रवरी 1742 को सातारा में भानु घराने में हुआ, जो पेशवा के हिसाब रखने वाले वंशानुगत फडणीस थे। 1761 में वे पानीपत में थे और बच निकले। माधवराव प्रथम के अधीन उन्होंने पेशवा के अपने दफ़्तर में राजकाज सीखा। 30 अगस्त 1773 को शनिवारवाड़ा में युवा पेशवा नारायणराव की हत्या हुई, और उनके चाचा रघुनाथराव ने पेशवाई ली। नाना और सखाराम बापू ने मंत्रियों और सरदारों की एक मंडली बनाई, जो बारभाई, यानी बारह भाई, के नाम से याद की जाती है। 18 अप्रैल 1774 को नारायणराव की विधवा गंगाबाई ने पुत्र को जन्म दिया, तो उन्होंने शिशु को सवाई माधवराव के नाम से पेशवा घोषित किया।
02कंपनी के विरुद्ध
रघुनाथराव बंबई में अंग्रेज़ों के पास गए, और पहला आंग्ल-मराठा युद्ध छिड़ा। नाना ने सरदारों को एक रखा, लड़ाई महादजी शिंदे ने लड़ी; जनवरी 1779 में बंबई की सेना ने वडगाँव में हथियार डाले। नाना ने निज़ाम, हैदर अली और नागपुर के भोसलों को कंपनी के विरुद्ध एक गुट में जोड़ा। 1782 की सालबाई संधि से मराठा राज्य अखंड रहा और रघुनाथराव पेंशन पर भेजे गए। मार्च 1795 में संयुक्त मराठा सरदारों ने खर्डा में निज़ाम को हराया, यह अंतिम बड़ा मैदान था जहाँ मराठे साथ लड़े। उसी अक्टूबर सवाई माधवराव शनिवारवाड़ा के छज्जे से गिरे और चल बसे।

03अंतिम वर्ष
रघुनाथराव के पुत्र बाजीराव द्वितीय पेशवा बने, और वृद्ध मंत्री व नए स्वामी कभी एक-दूसरे पर भरोसा न कर सके। 1797 में दौलतराव शिंदे ने नाना को पकड़वाकर अहमदनगर के दुर्ग में रखा; अगले वर्ष वे छूटे और फिर शासन सँभाला। 13 मार्च 1800 को पुणे में उनका देहांत हुआ। पुणे के अंग्रेज़ रेज़िडेंट कर्नल विलियम पामर ने लिखा कि उनके साथ मराठा शासन की सारी बुद्धिमत्ता और संयम चला गया। तीन वर्ष के भीतर बाजीराव द्वितीय ने बसई की संधि पर हस्ताक्षर किए और कंपनी की सेना पुणे में आ बैठी। नाना का वाड़ा आज भी पुणे में है, और वाई के पास कृष्णा तट पर मेणवली में उनका घाट और मंदिर।








