01नांदेड़ से सरहिंद तक
माधोदास का आश्रम नांदेड़ में गोदावरी के तट पर था। 1708 में गुरु गोबिंद सिंह वहाँ पहुँचे और वैरागी ने खालसा की दीक्षा लेकर बंदा सिंह नाम पाया। गुरु ने उन्हें पाँच तीर, पाँच सिखों की परिषद और पंजाब के खालसा के नाम हुकमनामे दिए। 1709 में वे मुट्ठी भर साथियों के साथ पंजाब पहुँचे। किसान हज़ारों की संख्या में जुड़ते गए। नवंबर 1709 में समाना गिरा, फिर साढौरा। मई 1710 में चप्पड़ चिड़ी के मैदान में उनकी सेना सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर ख़ान से भिड़ी, जिसने गुरु के दोनों छोटे साहिबज़ादों को दीवार में चिनवाया था। वज़ीर ख़ान मारा गया और सरहिंद जीत लिया गया।
02जोतने वाले को ज़मीन
उन्होंने मुख़लिसगढ़ के पहाड़ी किले को अपना केंद्र बनाया और उसका नाम लोहगढ़ रखा। सिक्के और मुहर अपने नाम से नहीं, गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंह के नाम से ढाले गए। बड़ी ज़मींदारियाँ तोड़ी गईं और खेत जोतने वाले किसान ही उनके स्वामी माने गए। सदियों बाद पहली बार पंजाब के बड़े हिस्से का लगान खालसा राज ने वसूला।

03गुरदास नंगल और दिल्ली
बादशाह फ़र्रुख़सियर ने अब्दुस समद ख़ान को उनके विरुद्ध भेजा। 1715 में गुरदासपुर के पास गुरदास नंगल के एक घेरे हुए अहाते में बंदा सिंह और उनके साथी महीनों तक भूखे रखे गए, जब तक वे खड़े होने लायक भी न रहे। उन्हें लगभग 700 साथियों के साथ ज़ंजीरों में दिल्ली लाया गया, नगर में जुलूस निकाला गया और किले में रखा गया। सिखों के सिर टोलियों में काटे गए, और किसी ने धर्म बदलकर प्राण बचाने का प्रस्ताव नहीं माना। जून 1716 में महरौली में क़ुतुब मीनार के पास बंदा सिंह को यातनाएँ देकर मारा गया; उससे पहले उनके छोटे पुत्र को उनकी आँखों के सामने मारा गया।








