01रानी का दान
मेरुतुंग के प्रबन्धचिन्तामणि (1304) में लिखा है कि भीमदेव प्रथम की रानी उदयमती ने अणहिलपाटक में वाव बनवाई। इसका काल 1060 का दशक माना जाता है, राजा के देहान्त के बाद। वाव यानी बावड़ी: सीढ़ियों की एक के बाद एक पंक्ति उतरते जाइए, स्तम्भों वाले मण्डपों से होकर, उस जल तक जो गुजरात की गर्मी में भी ठण्डा रहता है। यहाँ उतार लगभग 27 मीटर है और हर दीवार पर नक़्क़ाशी है। पाँच सौ से अधिक मुख्य मूर्तियाँ बची हैं, बीच में विष्णु के अवतार: भूदेवी को उठाते वराह, वामन, नृसिंह, राम, कल्कि। उनके बीच केश सँवारती अप्सराएँ, योगिनियाँ और सप्तमातृकाएँ।
02नदी ने ढक लिया
सरस्वती ने धारा बदली और वाव में बाढ़ भर गई। गाद लगभग ऊपर तक भर गई, और इसी से मूर्तियाँ इतनी साफ़ बची रहीं। 1950 के दशक के अन्त में जब भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने सफ़ाई शुरू की, तब केवल कुएँ का ऊपरी भाग दिखता था। खुदाई और जीर्णोद्धार 1980 के दशक तक चले। 2014 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर सूची में रखा और 2018 में यह ₹100 के नए नोट के पीछे छपी।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 1063 ई.रानी उदयमती द्वारा अणहिलपाटक में निर्माण।
- 1304 ई.मेरुतुंग के प्रबन्धचिन्तामणि में रानी की वाव का उल्लेख।
- 2014 ई.यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित।
- 2018 ई.₹100 के नोट पर चित्रित।
पाटन नगर के किनारे, अहमदाबाद से लगभग 125 कि.मी.; भा.पु.स. का टिकट। 35 कि.मी. दूर मोढेरा के साथ देखिए।





