01बिठूर की मनु
उनका जन्म काशी में मोरोपंत तांबे और भागीरथी बाई के घर हुआ और घाट के नाम पर उनका नाम मणिकर्णिका रखा गया। घर में सब उन्हें मनु कहते थे। पिता बिठूर में निर्वासित पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेवा में थे, सो वे वहीं पेशवा के परिवार के बीच पलीं और घुड़सवारी तथा तलवार चलाना सीखा। 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से विवाह हुआ और वे लक्ष्मीबाई कहलाईं। उनका पुत्र शैशव में ही चल बसा। नवंबर 1853 में राजा के देहांत से एक दिन पहले दोनों ने दामोदर राव को गोद लिया। लॉर्ड डलहौज़ी ने यह गोद स्वीकार नहीं किया और ‘व्यपगत सिद्धांत’ के अंतर्गत मार्च 1854 में झाँसी का विलय कर लिया। रानी को पेंशन देकर किला छोड़ने को कहा गया।
02झाँसी का घेरा और अंतिम युद्ध
जून 1857 में झाँसी के सिपाहियों के उठने पर रानी ने राज्य की बागडोर सँभाली। सर ह्यू रोज़ की सेना ने 23 मार्च 1858 से झाँसी को घेर लिया। तात्या टोपे सहायता को आए, पर 1 अप्रैल को बेतवा पर हार गए, और 3–4 अप्रैल को नगर पर धावा हुआ। रानी रात में दामोदर राव को साथ लेकर घेरा तोड़ निकलीं और कालपी पहुँचीं। फिर तात्या टोपे और राव साहब के साथ उन्होंने 1 जून 1858 को ग्वालियर ले लिया। रोज़ पीछे आया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में घुड़सवार वेश में लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं और वहीं उनका दाह हुआ; उनकी समाधि आज भी ग्वालियर में है।

03भारत की स्मृति में
विष्णुभट गोडसे नामक मराठी पुरोहित घेरे के समय झाँसी में थे; उन्होंने ‘माझा प्रवास’ में आँखों देखा वृत्तांत लिखा। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘झाँसी की रानी’, जिसकी टेक है ‘ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’, पीढ़ियों से विद्यालयों में कंठस्थ कराई जाती है। 1943 में सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला टुकड़ी का नाम ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ रखा।



