01मजिस्ट्रेट और उपन्यासकार
नैहाटी के पास काँठालपाड़ा में जन्मे बंकिमचन्द्र 1858 में नए कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले दो स्नातकों में थे और उसी वर्ष डिप्टी मजिस्ट्रेट के रूप में सरकारी सेवा में आए, जहाँ से 1891 में ही सेवानिवृत्त हुए। उनका पहला बांग्ला उपन्यास ‘दुर्गेशनन्दिनी’ 1865 में छपा, फिर ‘कपालकुण्डला’, ‘विषवृक्ष’ और बहुत से। 1872 में उन्होंने मासिक ‘बंगदर्शन’ शुरू किया, जिसने बांग्ला गद्य को इतिहास, विज्ञान और तर्क के योग्य बनाया। ‘कृष्णचरित्र’ (1886) में उन्होंने महाभारत के श्रीकृष्ण को आदर्श पुरुष के रूप में दिखाया।
02वन्दे मातरम्
उन्होंने संस्कृत और बांग्ला में ‘वन्दे मातरम्’ 1870 के दशक में लिखा और उसे ‘आनन्दमठ’ में रखा, जो ‘बंगदर्शन’ में धारावाहिक छपकर 1882 में पुस्तक बना। उपन्यास 1770 के बंगाल के अकाल की पृष्ठभूमि में उन संन्यासियों की कथा है जो देश के शासकों के विरुद्ध उठते हैं और मातृभूमि को देवी मानकर पूजते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया, और 1905 के बंग-भंग के बाद यह स्वदेशी आन्दोलन का नारा बन गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में ‘जन गण मन’ के बराबर सम्मान दिया।
“वन्दे मातरम्। सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्॥”
Bankim Chandra Chattopadhyay, Vande Mataram, in Anandamath (1882)