सराईघाट का युद्ध

विजेताअहोम राज्यलाचित बड़फुकन; स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह
1671 ई.बनाम
पक्षमुग़ल साम्राज्यराजा रामसिंह प्रथम; नौसेनापति मुनव्वर ख़ान

रामसिंह के आक्रमण की अंतिम और निर्णायक लड़ाई गुवाहाटी में नदी पर लड़ी गई। गंभीर रूप से बीमार लाचित बड़फुकन ने स्वयं को नाव पर ले जाने को कहा और पलटवार का नेतृत्व किया।

तिथि: मार्च 1671 ई.स्थान: सराईघाट, गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र, असमप्रकार: नौसैनिक
चित्र: Ishanjyotibora · CC BY 4.0
परिणाम

अहोम नावों ने सँकरी धारा में मुग़ल बेड़े को तोड़ दिया; मुनव्वर ख़ान मारा गया और रामसिंह असम से लौट गया।

01जहाँ नदी सिकुड़ती है

गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र एक तट पर कामाख्या और इटाखुली की पहाड़ियों और दूसरे तट पर अश्वक्रांता के बीच सिकुड़ जाती है। लाचित ने दोनों तटों पर मिट्टी की प्राचीरें बनवाई थीं, ताकि मुग़ल सेना केवल पानी से ही आ सके। असमिया परंपरा कहती है कि प्राचीर के काम में ढिलाई पर उन्होंने अपने मामा का सिर कटवा दिया और कहा कि देश से बड़ा मामा नहीं। मार्च 1671 में मुग़ल बेड़ा नदी में ऊपर बढ़ा और पहले अहोम पंक्ति पीछे हटी।

02पानी पर लाचित

लाचित ज्वर में थे और खड़े भी मुश्किल से हो पाते थे। उन्होंने अपनी नाव आगे खिंचवाई और पीछे हटना रुक गया। छोटी, फुर्तीली अहोम नावें सँकरी धारा में भारी मुग़ल नावों के बीच घुस गईं, और मुग़ल नौसेनापति मुनव्वर ख़ान गोली से मारा गया। बेड़ा बिखर गया। रामसिंह रंगामाटी लौटा और शीघ्र ही असम छोड़ गया। लगभग एक वर्ष बाद कलियाबर में लाचित का देहांत हुआ। जोरहाट के पास होलोंगापार में उनका मैदाम है, और 24 नवंबर को पूरा असम लाचित दिवस मनाता है।

सुकाफा
व्यक्तित्व · शासन 1228–1268 ई.सुकाफासुकाफा 1228 में पटकाई पहाड़ियाँ पार करके ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी में आए और अहोम राज्य की नींव रखी, जिसने लगभग छह सौ वर्ष असम पर राज किया और न दिल्ली सल्तनत के आगे झुका, न मुग़लों के।पढ़ें →
महत्त्व

सराईघाट ने असम पर मुग़लों का अंतिम बड़ा प्रयास समाप्त किया; अहोम राज्य 1810 के दशक के बर्मी आक्रमणों तक स्वतंत्र रहा।