01कारतूस और परेड भूमि
उनका जन्म बलिया ज़िले के नगवा गाँव में हुआ और युवावस्था में वे कंपनी की बंगाल सेना में भर्ती हुए। 1857 के आरंभ में हर छावनी में नए एनफ़ील्ड कारतूस की चर्चा थी, जिसके काग़ज़ पर गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की बात फैली थी और जिसे दाँत से काटकर खोलना पड़ता था। ब्राह्मण सिपाही के लिए इसका अर्थ धर्म भ्रष्ट होना था। 29 मार्च 1857 की दोपहर कलकत्ता के पास बैरकपुर में मंगल पांडे बंदूक लेकर निकले, साथियों को उठ खड़े होने को पुकारा और एडजुटेंट लेफ़्टिनेंट बॉ तथा सार्जेंट-मेजर को घायल कर दिया। पहरे के सिपाहियों ने उन्हें नहीं पकड़ा। अंत में घिर जाने पर उन्होंने स्वयं पर गोली चलाई, पर बच गए।
02कोर्ट-मार्शल और उसके बाद
कोर्ट-मार्शल ने उन्हें मृत्युदंड दिया और 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर में उन्हें फाँसी दी गई। पहरे के प्रमुख जमादार ईश्वरी प्रसाद ने उन्हें गिरफ़्तार करने से मना किया था; उन्हें 21 अप्रैल को फाँसी हुई। मई में 34वीं रेजिमेंट भंग कर दी गई। अंग्रेज़ हर विद्रोही सिपाही को ‘पांडी’ कहने लगे और पूरे युद्ध भर यही नाम चलता रहा। आज बैरकपुर का एक उद्यान और मेरठ का शहीद स्मारक उनकी प्रतिमा रखते हैं, और 1984 में भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट जारी किया।



