01876 का शून्य
दुर्ग पर पूर्वी मार्ग में चट्टान काटकर बना छोटा विष्णु मन्दिर है, चतुर्भुज। इसका शिलालेख, प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासन में विक्रम संवत् 933 (876 ई.) का, बताता है कि दुर्गपाल अल्ल ने मन्दिर बनवाया और नगर ने देवता के लिए 270 गुणा 187 हाथ का उद्यान और प्रतिदिन 50 पुष्पमालाएँ दीं। 270 और 50 में शून्य एक छोटे वृत्त के रूप में लिखा है, उसी स्थानीय-मान पद्धति में जो आज हम उपयोग करते हैं। भारत में यह ऐसा सबसे पुराना शून्य है जिसकी तिथि निश्चित है।
02तेली का मन्दिर और सास-बहू
दुर्ग की सबसे ऊँची इमारत तेली का मन्दिर है, लगभग 30 मीटर ऊँचा, 8वीं–9वीं शताब्दी का। इसकी छत वलभी प्रकार की ढोलाकार है, जो उत्तर में दुर्लभ है, और द्वार के ऊपर गरुड़ तराशे हैं। पूर्वी किनारे पर दो सास-बहू मन्दिर हैं, ठीक नाम सहस्रबाहु, विष्णु के। बड़े मन्दिर का शिलालेख बताता है कि कच्छपघात राजा महीपाल ने इसे 1093 में पूरा किया। इसका शिखर नहीं रहा, पर भीतर से तीन तल ऊँचा स्तम्भयुक्त मण्डप आज भी खड़ा है।
03अनेक स्वामी
कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1196 में दुर्ग लिया और इल्तुतमिश ने लम्बे घेरे के बाद 1232 में फिर लिया। 1398 में तोमरों ने इसे जीता और राजा मानसिंह तोमर (शासन 1486–1516) ने नीली-पीली टाइलों वाला मान मन्दिर महल बनवाया। 1518 में इब्राहीम लोदी की सेना ने इसे लिया। 1528 में यहाँ आए बाबर ने अपने संस्मरण में लिखा कि उसने उरवाही घाटी की चट्टानों में तराशी जैन विशाल प्रतिमाओं को नष्ट करने का आदेश दिया; उनके मुख तोड़े गए। मुग़लों के समय यह राजकीय कारागार था और गुरु हरगोबिन्द यहाँ बन्दी रहे; 52 राजाओं के साथ उनकी मुक्ति को सिख बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाते हैं। 18वीं शताब्दी में मराठों के पास रहा, और जून 1858 में पास ही रानी लक्ष्मीबाई के युद्ध में बलिदान के कुछ दिन बाद अंग्रेज़ों ने इसे लिया।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 876 ई.मिहिर भोज के समय शून्य वाला चतुर्भुज मन्दिर शिलालेख।
- 1093 ई.कच्छपघात महीपाल ने सहस्रबाहु मन्दिर पूरा किया।
- 1196 ई.कुतुबुद्दीन ऐबक ने लिया।
- 1232 ई.लम्बे घेरे के बाद इल्तुतमिश ने फिर लिया।
- 1398 ई.तोमरों ने दुर्ग लिया।
- 1486–1516 ई.मानसिंह तोमर ने मान मन्दिर बनवाया।
- 1518 ई.इब्राहीम लोदी की सेना ने लिया।
- 1528 ई.बाबर ने उरवाही की जैन प्रतिमाओं को नष्ट करने का आदेश दिया।
- जून 1858पास ही रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के बाद अंग्रेज़ों ने लिया।
उरवाही मार्ग से प्रवेश कीजिए ताकि जैन शैल प्रतिमाएँ दिखें, और ग्वालियर द्वार के रास्ते चतुर्भुज मन्दिर देखते हुए उतरिए। शाम को मान मन्दिर में ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम होता है।










