01डमरू से चौदह सूत्र
व्याकरण चौदह छोटी ध्वनि-पंक्तियों से आरम्भ होता है, ‘अइउण्, ऋऌक्…’, जो माहेश्वर सूत्र कहलाते हैं। नन्दिकेश्वर काशिका में लिखी परंपरा कहती है कि ताण्डव के अन्त में महादेव ने चौदह बार डमरू बजाया और ये ध्वनियाँ निकलीं; तप कर रहे पाणिनि ने इन्हें सुना और इन पर अपना व्याकरण खड़ा किया। हर पंक्ति का अन्तिम अक्षर संकेत है, जिससे एक ध्वनि और एक संकेत मिलकर पूरे वर्ग का नाम बन जाते हैं: ‘अच्’ सब स्वर, ‘हल्’ सब व्यंजन। ऐसे उपायों से आठ अध्यायों में लौकिक और वैदिक दोनों भाषाएँ आ जाती हैं।
02यन्त्र जैसा व्याकरण
पाणिनि के नियम क्रम से चलते हैं, और परिभाषा-सूत्र तय करते हैं कि दो नियम एक साथ लगें तो कौन जीतेगा। भाषाविद इस पद्धति की तुलना कम्प्यूटिंग की औपचारिक व्याकरण से करते हैं; प्रोग्रामिंग भाषाओं के बैकस–नौर संकेतन को इसी कारण पाणिनि–बैकस रूप भी कहा गया। अष्टाध्यायी में उनके समय के जनपदों, नदियों, सिक्कों और गोत्रों के नाम भी सुरक्षित हैं। कात्यायन ने उस पर वार्तिक जोड़े और पतंजलि ने दोनों पर महाभाष्य लिखा। तीनों को मुनित्रय कहकर साथ पूजा जाता है।

