01प्रभास में सोम का तीर्थ
शिव पुराण बताता है कि दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को शाप दिया, क्योंकि वे अपनी सत्ताईस पत्नियों में केवल रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे। शाप से चन्द्रमा क्षीण होने लगे। प्रभास में उन्होंने महादेव की आराधना की और शिव ने शाप को हल्का कर दिया: चन्द्रमा बारी-बारी से घटेंगे और बढ़ेंगे। चन्द्रमा का एक नाम सोम है, और जिस लिंग की उन्होंने पूजा की वह सोमनाथ कहलाया। महाभारत प्रभास को महातीर्थ कहता है, और मन्दिर से थोड़ी ही दूर भालका और देहोत्सर्ग में पुराण श्रीकृष्ण के देहत्याग का स्थान बताते हैं।
02ग़ज़नी, 1026
जनवरी 1026 में महमूद ग़ज़नवी मुल्तान से रेगिस्तान पार कर आया, नगर पर अधिकार किया, मन्दिर की रक्षा में खड़े योद्धाओं को मारा और लिंग को तोड़ दिया। महमूद के दरबार में रहे अल-बिरूनी ने लिखा है कि उसके टुकड़े ग़ज़नी ले जाए गए और जामा मस्जिद की सीढ़ियों में जड़ दिए गए, ताकि वे पैरों तले रौंदे जाएँ। इब्न अल-असीर मरने वालों की संख्या पचास हज़ार से अधिक बताता है। कुछ ही दशकों में मन्दिर फिर खड़ा हो गया। 1169 में चौलुक्य राजा कुमारपाल ने इसे पत्थर से फिर बनवाया; उनके शैव गुरु भाव बृहस्पति का प्रभास पाटन अभिलेख इसका साक्षी है।
03छह बार और गिरा
1299 में अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति उलुग़ ख़ाँ और नुसरत ख़ाँ ने गुजरात को लूटा, और अमीर ख़ुसरो ने ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह में गर्व से लिखा कि सोमनाथ की मूर्ति दिल्ली ले जाई गई। जूनागढ़ के चूड़ासमा राजा महीपाल ने मन्दिर फिर बनवाया और उनके पुत्र खेंगार ने नया लिंग स्थापित किया। गुजरात के पहले सुल्तान ज़फ़र ख़ाँ ने 1394 में इस पर आक्रमण किया, और महमूद बेगड़ा ने 1469 में फिर इसे अपवित्र किया। पूजा हर बार लौट आई। औरंगज़ेब ने 1665 में मन्दिर तोड़ने का आदेश दिया, और 1706 में यह सुनकर कि हिन्दू फिर पूजा करने लगे हैं, आदेश दिया कि उसे ऐसा गिराया जाए कि कुछ शेष न रहे। मिरात-ए-अहमदी में यह आदेश दर्ज है।
04अहिल्याबाई, पटेल और 1951
1783 में इन्दौर की अहिल्याबाई होलकर ने खण्डहरों के पास नया सोमनाथ मन्दिर बनवाया, जिसका लिंग भूमि-तल से नीचे गर्भगृह में है। वहाँ आज भी पूजा होती है। जूनागढ़ के भारत में मिलने के बाद 13 नवम्बर 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने इन खण्डहरों में खड़े होकर संकल्प लिया कि महामन्दिर फिर उठेगा। पटेल के निधन के बाद क. मा. मुंशी ने यह काम आगे बढ़ाया। 11 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने प्रभाशंकर सोमपुरा द्वारा चौलुक्य शैली में रचे नए मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा की। समुद्र-दीवार पर खड़ा बाण-स्तम्भ बताता है कि इस तट और दक्षिणी ध्रुव के बीच कोई भूमि नहीं है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- जनवरी 1026महमूद ग़ज़नवी मन्दिर लूटता है और लिंग तोड़ता है।
- 1169चौलुक्य कुमारपाल पत्थर का मन्दिर फिर बनवाते हैं (भाव बृहस्पति का अभिलेख)।
- 1299उलुग़ ख़ाँ के नेतृत्व में अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना सोमनाथ लूटती है।
- 14वीं शताब्दी का आरम्भचूड़ासमा राजा महीपाल पुनर्निर्माण करते हैं; उनके पुत्र खेंगार नया लिंग स्थापित करते हैं।
- 1394गुजरात का सूबेदार और बाद में पहला सुल्तान ज़फ़र ख़ाँ मन्दिर पर आक्रमण करता है।
- 1469महमूद बेगड़ा मन्दिर को अपवित्र करता है।
- 1665औरंगज़ेब मन्दिर तोड़ने का आदेश देता है।
- 1706पूजा फिर शुरू होने पर औरंगज़ेब उसे दोबारा गिराने का आदेश देता है।
- 1783अहिल्याबाई होलकर खण्डहरों के पास नया सोमनाथ मन्दिर बनवाती हैं।
- 13 नवम्बर 1947सरदार पटेल मन्दिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लेते हैं।
- 11 मई 1951राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद नए मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं।
सुबह से रात तक खुला; तीन आरतियाँ (प्रातः 7, मध्याह्न 12, सायं 7 बजे)। सायं आरती के बाद ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम होता है। भालका तीर्थ और त्रिवेणी संगम पास ही हैं।












