01कैम्ब्रिज और कॉस्मिक किरणें
30 अक्टूबर 1909 को बम्बई के एक पारसी परिवार में जन्मे भाभा इंजीनियरिंग पढ़ने कैम्ब्रिज भेजे गए, पर सैद्धान्तिक भौतिकी की ओर मुड़ गए। 1935 में उन्होंने पॉज़िट्रॉन द्वारा इलेक्ट्रॉन के प्रकीर्णन की गणना की, जिसे भौतिकविद् आज भी भाभा प्रकीर्णन कहते हैं। 1937 में वाल्टर हाइटलर के साथ उन्होंने समझाया कि वायुमण्डल से टकराता कॉस्मिक-किरण कण कैसे इलेक्ट्रॉनों, पॉज़िट्रॉनों और फ़ोटॉनों की झड़ी शुरू करता है। 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा तब वे भारत में छुट्टी पर थे; वे यहीं रुक गए और बंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान में सी. वी. रमन के साथ जुड़े। 1941 में वे एफ़.आर.एस. चुने गए।
02टीआईएफ़आर, ट्रॉम्बे और तीन चरण
1944 में उन्होंने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को मूलभूत भौतिकी के संस्थान का प्रस्ताव भेजा; 1 जून 1945 को टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान खुला। 1948 में वे परमाणु ऊर्जा आयोग के पहले अध्यक्ष बने। 1954 में उन्होंने ट्रॉम्बे में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान बनाया, जहाँ एशिया का पहला परमाणु रिएक्टर अप्सरा 4 अगस्त 1956 को क्रान्तिक हुआ। यह जानते हुए कि भारत में यूरेनियम कम पर केरल की मोनाज़ाइट रेत में थोरियम का बड़ा भण्डार है, उन्होंने थोरियम आधारित बिजली तक पहुँचने की तीन-चरणीय योजना बनाई। 1955 में जिनेवा में परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता की। 24 जनवरी 1966 को एयर इण्डिया की उड़ान 101 मॉण्ट ब्लां से टकराई और उनका देहान्त हुआ। 1967 में ट्रॉम्बे का नाम भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र रखा गया।
