01षोडशी पूजा
1859 में पाँच वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ, और वे 1872 तक मायके रहीं, जब अठारह की होकर पैदल दक्षिणेश्वर पहुँचीं। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें स्नेह से रखा और गृहस्थी और साधना दोनों सिखाईं। उसी वर्ष फलहारिणी काली पूजा की रात उन्होंने अपने कमरे में उन्हें देवी के आसन पर बैठाकर षोडशी रूप में पूजा और अपनी सारी साधना का फल उनके चरणों में रख दिया। वे नौबतखाने की एक छोटी कोठरी में रहतीं और उनके तथा आने वालों के लिए भोजन बनातीं।
02संघ की माँ
1886 के बाद उन्होंने सैकड़ों संन्यासियों और गृहस्थों को दीक्षा दी, और विवेकानन्द से लेकर हर युवा संन्यासी उनके वचन को अंतिम मानता था। वे जयरामबाटी और कोलकाता के ‘उद्बोधन’ भवन के बीच सादगी से रहीं, जो स्वामी सारदानन्द ने उनके लिए बनवाया था। ब्राह्मण शिष्य हो, उनके यहाँ काम करने वाला डाकू अमजद हो, या आयरलैंड से आई भगिनी निवेदिता, उनके लिए सब एक थे। 20 जुलाई 1920 को उद्बोधन में उनका देहावसान हुआ। जयरामबाटी का मातृमंदिर रोज़ तीर्थयात्रियों से भरा रहता है।

“यदि मन की शान्ति चाहते हो तो दूसरों के दोष मत देखो, अपने दोष देखो। संसार को अपना बनाना सीखो। कोई पराया नहीं है, बेटा; यह सारा संसार तुम्हारा अपना है।”
Sri Sarada Devi, last counsel, July 1920 (Sri Sarada Devi, the Holy Mother, Swami Gambhirananda)
