01धन, ऋण और शून्य
वे स्वयं बताते हैं कि उन्होंने यह ग्रन्थ शक 550 (628 ई.) में, तीस वर्ष की आयु में, चाप वंश के राजा व्याघ्रमुख के राज्य में लिखा। अठारहवें अध्याय में धन (धनात्मक संख्या), ऋण (ऋणात्मक संख्या) और शून्य का गणित है। ऋण में से शून्य घटाओ तो ऋण; धन में से शून्य घटाओ तो धन; शून्य में से शून्य घटाओ तो शून्य। शून्य का ऋण या धन से गुणनफल शून्य है, और दो ऋणों का गुणनफल धन है। शून्य को शून्य से भाग देने पर उन्होंने उत्तर शून्य बताया, जिसे बाद के गणितज्ञों ने सुधारा; पर शून्य को गणना की वस्तु बनाने का जो कदम उन्होंने उठाया, उसी पर आज का सारा अंकगणित खड़ा है।
02चतुर्भुज, समीकरण और बग़दाद
ब्रह्मगुप्त ने चक्रीय चतुर्भुज का क्षेत्रफल उसकी चार भुजाओं से निकालने का सूत्र दिया, जो आज भी उनके नाम से पढ़ाया जाता है। उन्होंने द्विघात समीकरण हल किए और Nx² + 1 = y² के ज्ञात हलों से नए हल बनाने की भावना-विधि दी, जिसे बाद में भास्कर द्वितीय ने पूरा किया। 665 ई. में, 67 वर्ष की आयु में, उन्होंने पंचांग बनाने वालों के लिए खण्डखाद्यक लिखा। लगभग 771 ई. में एक भारतीय ज्योतिषी उनका सिद्धान्त बग़दाद में ख़लीफ़ा अल-मंसूर के दरबार ले गए, जहाँ उसका अरबी अनुवाद सिन्दहिन्द नाम से हुआ, और उसके साथ भारतीय अंक और विधियाँ पश्चिम पहुँचीं। भास्कर द्वितीय ने उन्हें गणकचक्रचूड़ामणि कहा।


