भोपाल का युद्ध

विजेतामराठेपेशवा बाजीराव प्रथम
1737 ई.बनाम
पक्षमुग़ल साम्राज्य और हैदराबादनिज़ाम-उल-मुल्क आसफ़जाह प्रथम

बादशाह ने बाजीराव को समाप्त करने के लिए निज़ाम को बड़ी सेना और तोपख़ाने के साथ उत्तर भेजा। बाजीराव ने उल्टे उसे भोपाल में घेर लिया।

तिथि: दिसंबर 1737 – जनवरी 1738 ई.स्थान: भोपाल, मध्य प्रदेशप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain
परिणाम

भोपाल में घिरे निज़ाम ने दोराहा की संधि पर हस्ताक्षर कर मालवा मराठों को दे दिया।

01घेरे में

निज़ाम ने अपनी तोपों के भरोसे भोपाल में झील के पीछे मज़बूत मोर्चा लिया। बाजीराव की घुड़सवार सेना ने उसे चारों ओर से घेरा, उसकी रसद टोलियाँ काटीं और दक्कन से आते कारवाँ रोक दिए, जबकि दूसरी मराठा सेनाओं ने उत्तर से आती मुग़ल कुमक को थामे रखा। कुछ ही सप्ताह में शिविर में अन्न और चारा घट गया, और निज़ाम ने लगातार हमलों के बीच धीरे-धीरे पीछे हटने की कोशिश की।

02दोराहा

जनवरी 1738 में सिरोंज के पास दोराहा सराय में निज़ाम ने शर्तें मानीं। उसने पेशवा को पूरा मालवा और नर्मदा से चंबल तक का क्षेत्र दिलाने, और ख़र्च के लिए पचास लाख रुपये देने का वचन दिया। एक वर्ष बाद नादिरशाह के आक्रमण ने इस संधि को पीछे छोड़ दिया, पर मालवा मराठों के पास ही रहा।

मल्हारराव होलकर
व्यक्तित्व · 16 मार्च 1693 – 20 मई 1766मल्हारराव होलकरजेजुरी के पास होळ गाँव के धनगर चरवाहे बालक मल्हारराव पेशवा बाजीराव प्रथम के अधीन मालवा के बड़े मराठा सेनापति बने और इंदौर के होलकर राज्य की नींव रखी। पालखेड से अटक और पानीपत तक, चालीस वर्ष तक हर बड़े मराठा अभियान में वे साथ रहे।पढ़ें →
महत्त्व

भोपाल ने मालवा में मराठा शासन पक्का किया, जहाँ होलकर और सिंधिया अपने राज्य बनाने वाले थे।