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संत

परमहंस योगानन्द

पश्चिम में क्रियायोग के आचार्य

1893 ई.—1952 ई.

5 जनवरी 1893 – 7 मार्च 1952

गोरखपुर के मुकुन्दलाल घोष, स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि के शिष्य, 1920 में अमेरिका गए और तीस वर्ष वहाँ क्रियायोग सिखाया। उनकी ‘योगी कथामृत’ (ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ अ योगी, 1946) ने लाहिड़ी महाशय और महावतार बाबाजी के नाम करोड़ों पाठकों तक पहुँचाए।

01श्रीरामपुर

5 जनवरी 1893 को गोरखपुर के एक बंगाली परिवार में उनका जन्म हुआ; माता-पिता काशी के लाहिड़ी महाशय के शिष्य थे, जिन्हें महावतार बाबाजी से क्रियायोग मिला था। बचपन में वे कई बार हिमालय की ओर भाग निकले। 1910 में वाराणसी में उनकी भेंट स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि से हुई और दस वर्ष उन्होंने श्रीरामपुर के आश्रम में साधना की, साथ ही 1915 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से उपाधि ली। उसी वर्ष दशनामी सम्प्रदाय की गिरि शाखा में संन्यास लेकर वे स्वामी योगानन्द बने। 1917 में उन्होंने बालकों का एक विद्यालय खोला जो 1918 में राँची गया, और यहीं से योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया शुरू हुई।

02अमेरिका में तीस वर्ष

1920 में वे धार्मिक उदारवादियों की अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में भारत के प्रतिनिधि बनकर बोस्टन गए और वहीं रह गए; उसी वर्ष सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की स्थापना की और 1925 में लॉस एंजेलिस के माउंट वॉशिंगटन पर उसका मुख्यालय बनाया। पूरे अमेरिका में भरे सभागारों में उन्होंने व्याख्यान दिए और हज़ारों को क्रियायोग सिखाया। 1935–36 में भारत आने पर वर्धा में गांधीजी से मिले, और गुरु श्री युक्तेश्वर ने उन्हें ‘परमहंस’ की उपाधि दी। ‘योगी कथामृत’ 1946 में छपी। 7 मार्च 1952 को लॉस एंजेलिस में भारत के राजदूत के सम्मान में भोज पर बोलने के तुरन्त बाद उन्होंने देह त्यागी।

श्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरी
स्थान · 12वीं शताब्दी ई., पूर्वी गंग वंश के अनन्तवर्मन चोडगंग देव (शासन 1078–1147) के समय आरम्भश्री जगन्नाथ मन्दिर, पुरीपुरुषोत्तम क्षेत्र, चार धामों में पूर्व का धाम, जहाँ भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ दारु (काष्ठ) विग्रहों में विराजते हैं, जिनका नवकलेवर होता है। वर्तमान मन्दिर पूर्वी गंग राजाओं ने बनवाया, और अनेक आक्रमणों में यह इसलिए बचा कि सेवक विग्रहों को उठाकर छिपा देते और फिर लौटा लाते।पढ़ें →