आधे दिन में इब्राहीम लोदी मारा गया और उसकी सेना नष्ट हो गई; बाबर ने दिल्ली और आगरा लेकर मुग़ल शासन की नींव डाली।
01गाड़ियाँ, तोपें और बगल से वार
बाबर अपनी ही गिनती में लगभग 12,000 योद्धाओं के साथ आया। उसने पानीपत नगर को दाहिनी ओर रखा, बाईं ओर खाइयाँ खोदीं और पेड़ डाले, और बीच में लगभग 700 गाड़ियों को कच्चे चमड़े की रस्सियों से बाँध दिया, घुड़सवारों के लिए बीच-बीच में रास्ते छोड़कर। उनके पीछे उसके बंदूकची और उस्ताद अली कुली व मुस्तफ़ा की तोपें थीं। इब्राहीम की सेना, जिसे बाबर ने 1,00,000 सैनिक और 1,000 हाथी आँका, इसी संकरे मोर्चे पर टूट पड़ी। तुलुग़मा, अर्थात् घुड़सवार तीरंदाज़ों की टुकड़ियाँ, दोनों पंखों से घूमकर पीछे से भीड़ पर बाण बरसाने लगीं। दोपहर तक सब समाप्त हो गया।
02ग्वालियर का तोमर
इब्राहीम के पक्ष में मरने वालों में ग्वालियर के राजा विक्रमादित्य तोमर भी थे, जिनका परिवार ग्वालियर के पतन के बाद लोदी सेवा में रहने को विवश था। जब बाबर का पुत्र हुमायूँ आगरा पहुँचा तो उनका परिवार वहीं था, और बाबरनामा कहता है कि उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए उसे रत्न भेंट किए। कुछ ही दिनों में बाबर ने दिल्ली और आगरा ले लिए। हिन्दुस्तान के लिए असली संघर्ष अगले वर्ष हुआ, जब मेवाड़ के राणा सांगा ने राजपूत संघ का नेतृत्व करते हुए खानवा में उसका सामना किया।
पानीपत के प्रथम युद्ध ने दिल्ली सल्तनत की तीन शताब्दियों का अंत किया और उत्तर भारत के मैदानों में तोपख़ाने को उतारा।
