वीर: महान योद्धा और नायक
हर वीर किस कर्म के लिए याद किया जाता है, वर्ष और स्थान के साथ। युग-दर-युग, इतिहास-ग्रंथों से कारगिल तक।
01 · वैदिक ऋषि और इतिहाससत्य, त्रेता और द्वापर युग, 3102 ई.पू. तक (पारम्परिक गणना)
3138 ई.पू.अर्जुन
पारंपरिक गणना से 3138 ई.पू. में कुरुक्षेत्र में उन्होंने रथ पर श्रीकृष्ण से गीता सुनी और फिर अठारह दिन का वह युद्ध लड़ा जो पांडवों की विजय पर समाप्त हुआ।
3138 ई.पू.भीष्म
हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा की प्रतिज्ञा से बँधे वे कुरुक्षेत्र में पहले दस दिन कौरव सेना के सेनापति रहे, फिर उत्तरायण की प्रतीक्षा में शरशय्या पर लेटे रहे।
3138 ई.पू.अभिमन्यु
कुरुक्षेत्र के तेरहवें दिन अर्जुन का किशोर पुत्र अकेले द्रोण के चक्रव्यूह में घुसा और भीतर सात महारथियों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।

श्रीराम
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार त्रेतायुग में उन्होंने समुद्र पर सेतु बाँधा, लंका के युद्ध में रावण का वध किया और सीता को अयोध्या लौटा लाए।
03 · जनपद और मगध का उदयलगभग 1300–321 ई.पू.
326 ई.पू.राजा पुरु (पोरस)
326 ई.पू. में उन्होंने झेलम (वितस्ता) के तट पर हाथियों की सेना के साथ सिकंदर का सामना किया; एरियन के अनुसार वे घायल होकर भी लड़ते रहे, और सिकंदर ने उनका राज्य उन्हीं के पास रहने दिया।
04 · मौर्य साम्राज्य321–185 ई.पू.
05 · शुंग, सातवाहन, खारवेल और संगम राज्य185 ई.पू. – 320 ई.
100 ई.पू.खारवेल
उदयगिरि का हाथीगुम्फा शिलालेख बताता है कि अपने राज्य के बारहवें वर्ष में उन्होंने मगध पर चढ़ाई की, वहाँ के राजा को झुकाया और नंदराज द्वारा ले जाई गई कलिंग जिन प्रतिमा वापस ले आए।
124 ई.गौतमीपुत्र सातकर्णि
लगभग 124 ई. में उन्होंने पश्चिमी दक्कन में नहपान की क्षहरात सत्ता नष्ट की और नहपान के ही चाँदी के सिक्कों पर अपना नाम दोबारा अंकित कराया; उनकी माता का नासिक शिलालेख यह विजय दर्ज करता है।
06 · गुप्त युग320–550 ई.
335 ई.समुद्रगुप्त
लगभग 335 ई. से उन्होंने गंगा के मैदान से दक्षिण में कांची तक अभियान किए; प्रयाग स्तंभ पर हरिषेण की प्रशस्ति उन राजाओं की सूची देती है जिन्हें उन्होंने उखाड़ा और जिन्हें पुनः राज्य लौटाया।
455 ई.स्कन्दगुप्त
लगभग 455 ई. में उन्होंने भारत पर हूणों का पहला आक्रमण विफल किया; यह विजय उनके भितरी स्तंभ लेख और जूनागढ़ शिलालेख में स्मरण की गई है।
528 ई.यशोधर्मन
लगभग 528 ई. में दशपुर के इस राजा ने हूण मिहिरकुल को हराया; मंदसौर के पास सोंदनी के उनके विजय स्तंभ कहते हैं कि मिहिरकुल ने उनके चरणों में सिर झुकाया।
07 · महान राज्यों का युगलगभग 550–1000 ई.
618 ई.पुलकेशिन द्वितीय
लगभग 618 ई. में उन्होंने नर्मदा पर हर्ष की सेना को रोक दिया; रविकीर्ति का ऐहोल शिलालेख (634 ई.) इस विजय का गुणगान करता है।
642 ई.नरसिंहवर्मन प्रथम
642 ई. में इस पल्लव राजा ने चालुक्य राजधानी वातापी (बादामी) पर चढ़ाई कर उसे जीत लिया; इसी युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु हुई।
733 ई.ललितादित्य मुक्तापीड
कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार 730 के दशक में इस कार्कोट राजा ने कान्यकुब्ज के यशोवर्मन को हराया और कश्मीर से बहुत दूर तक अपनी सेना पहुँचाई; मार्तंड सूर्य मंदिर उन्हीं का बनवाया है।
738 ई.नागभट प्रथम
लगभग 738 ई. में प्रतिहार वंश के इस संस्थापक ने सिंध से पूर्व की ओर बढ़ती अरब सेनाओं को कुचल दिया; उनके वंशज मिहिर भोज का ग्वालियर शिलालेख कहता है कि उन्होंने म्लेच्छ राजा की सेना का नाश किया।
08 · चोल और दक्षिण के समुद्रलगभग 850–1310 ई.
1025 ई.राजेन्द्र चोल प्रथम
1025 ई. में उन्होंने चोल नौसेना को बंगाल की खाड़ी के पार भेजकर कडारम और श्रीविजय के बंदरगाहों पर प्रहार किया; इससे पहले लगभग 1021 में उनकी सेना गंगा तक पहुँच चुकी थी।
1262 ई.रुद्रमा देवी
लगभग 1262 से उन्होंने ओरुगल्लु (वारंगल) से अपने नाम पर काकतीय राज्य चलाया, सेउण यादव राजा महादेव को पीछे खदेड़ा और विद्रोही सामंतों को झुकाया।
09 · लम्बा प्रतिरोध: सिन्ध से तराइन तक636–1206 ई.
712 ई.राजा दाहिर
712 ई. में उन्होंने सिंधु तट पर रावर में मुहम्मद बिन क़ासिम की अरब सेना का सामना किया और चचनामा के अनुसार हाथी पर से लड़ते हुए वीरगति पाई।
1033 ई.महाराजा सुहेलदेव
1033 ई. में, सत्रहवीं शताब्दी के ग्रंथ मिरात-ए-मसूदी में सुरक्षित परंपरा के अनुसार, उन्होंने स्थानीय राजाओं का संघ बनाकर बहराइच में सालार मसूद की सेना का नाश किया।
1178 ई.नायिका देवी
1178 में अपने बालक पुत्र मूलराज द्वितीय की संरक्षिका के रूप में गुजरात चलाते हुए उन्होंने चौलुक्य सेना का नेतृत्व किया, जिसने आबू पर्वत के नीचे कासह्रद में मुहम्मद ग़ोरी को बुरी तरह हराया।
1191 ई.पृथ्वीराज चौहान
1191 में थानेसर के पास तराइन में उन्होंने मुहम्मद ग़ोरी को हराकर उसकी सेना को रणभूमि से खदेड़ दिया; अगले वर्ष उसी भूमि पर वे पराजित हुए।
10 · सल्तनतें, विजयनगर और वे राज्य जो खड़े रहे1206–1526 ई.
1301 ई.हम्मीरदेव चौहान
1301 में उन्होंने अलाउद्दीन खलजी की घेराबंदी के सामने महीनों रणथंभौर थामे रखा, शरण में आए मंगोल सरदारों को सौंपने से इनकार किया और दुर्ग गिरने पर वीरगति पाई।
1336 ई.मुसुनूरि कापय नायक
लगभग 1336 में उन्होंने आंध्र के नायक सरदारों को एकजुट किया, तुग़लक़ सूबेदार को वारंगल से निकाला और तेलुगु प्रदेश में हिंदू राज पुनः स्थापित किया।
1371 ई.कुमार कम्पण
लगभग 1371 में बुक्क प्रथम के पुत्र इस विजयनगर राजकुमार ने मदुरै सल्तनत का अंत किया और श्रीरंगम तथा मदुरै के मंदिर फिर खुलवाए; उनकी रानी गंगादेवी ने ‘मधुराविजयम्’ में यह कथा लिखी है।
1437 ई.राणा कुम्भा
1437 में सारंगपुर में उन्होंने मालवा के महमूद खलजी को हराया और इस विजय की स्मृति में चित्तौड़गढ़ में विजय स्तंभ बनवाया।
1518 ई.राणा सांगा
1518 में खातोली में उन्होंने दिल्ली के इब्राहीम लोदी को हराया और 1527 में खानवा में बाबर के विरुद्ध राजपूत संघ का नेतृत्व किया।
1520 ई.कृष्णदेवराय
मई 1520 में उन्होंने रायचूर में बीजापुर के इस्माइल आदिल शाह को परास्त किया और वह दुर्ग जीता जिसके लिए डेढ़ सौ वर्ष से युद्ध चल रहा था।
11 · मुग़ल काल और प्रतिरोध1526–1707 ई.
1555 ई.रानी अब्बक्का चौटा
पुर्तगाली अभिलेखों के अनुसार 1555 में उन्होंने उल्लाल में डोम अल्वारो दा सिल्वेरा के बेड़े को खदेड़ा और दशकों तक पुर्तगाली गोवा को चुनौती देती रहीं।
1556 ई.हेमू विक्रमादित्य
7 अक्टूबर 1556 को उन्होंने तुग़लक़ाबाद में मुग़ल सूबेदार तरदी बेग को हराया, दिल्ली में प्रवेश किया और विक्रमादित्य की उपाधि से राज्याभिषेक कराया; इसके एक मास बाद पानीपत का युद्ध हुआ।
1563 ई.चिलाराय
1563 में नरनारायण के भाई इस कोच सेनापति ने ब्रह्मपुत्र पार कर अहोम राजधानी गढ़गाँव जीत ली; उनकी कूच इतनी तेज़ थी कि लोग उन्हें चील कहने लगे।
1564 ई.रानी दुर्गावती
24 जून 1564 को नर्रई के पास, तीरों से घायल और आसफ़ ख़ाँ की मुग़ल सेना के हाथ पकड़े जाने की स्थिति में, उन्होंने आत्मसमर्पण के बदले रणभूमि में ही प्राण त्याग दिए।
1576 ई.महाराणा प्रताप
18 जून 1576 को हल्दीघाटी में उन्होंने मानसिंह की मुग़ल सेना पर धावा बोला और अकबर की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की; 1582 में दिवेर से उन्होंने मेवाड़ वापस जीतना आरंभ किया।
1659 ई.छत्रपति शिवाजी महाराज
10 नवंबर 1659 को प्रतापगढ़ के नीचे भेंट में उन्होंने अफ़ज़ल ख़ाँ का वध किया और उसी दिन उनके सैनिकों ने जंगल में बीजापुर की सेना को तितर-बितर कर दिया।
1660 ई.बाजी प्रभु देशपांडे
13 जुलाई 1660 को उन्होंने कुछ सौ बांदल मावलों के साथ घोड़खिंड का दर्रा सिद्दी मसूद की सेना के सामने तब तक थामे रखा जब तक विशालगढ़ की तोपों ने शिवाजी महाराज के सुरक्षित पहुँचने का संकेत नहीं दिया; तभी उन्होंने प्राण छोड़े।
1670 ई.तानाजी मालुसरे
4 फ़रवरी 1670 की रात वे अपने मावलों के साथ कोंढाणा की खड़ी चट्टानें चढ़े, उदयभान राठौड़ से किला छीना और उसी लड़ाई में वीरगति पाई; शिवाजी महाराज ने उसका नाम सिंहगढ़ रखा।
1671 ई.लाचित बड़फुकन
मार्च 1671 में ज्वर से पीड़ित होते हुए भी उन्होंने गुवाहाटी के पास सराईघाट में ब्रह्मपुत्र पर अहोम नौकाओं का नेतृत्व किया और राम सिंह के मुग़ल बेड़े का नाश किया।
1679 ई.दुर्गादास राठौड़
जुलाई 1679 में वे शिशु अजीत सिंह को लेकर तलवार के बल पर दिल्ली से निकल आए, मारवाड़ के उत्तराधिकारी को औरंगज़ेब से बचाया और लगभग तीस वर्ष लड़ते रहे, जब तक अजीत सिंह जोधपुर की गद्दी पर नहीं बैठे।
1689 ई.केलदी चेन्नम्मा
1689 में उन्होंने जिंजी जाते हुए छत्रपति राजाराम को शरण दी और उनके पीछे भेजी गई औरंगज़ेब की सेना को रोके रखा।
1700 ई.महारानी ताराबाई
1700 में छत्रपति राजाराम के निधन के बाद उन्होंने स्वयं दक्कन में औरंगज़ेब की सेनाओं के विरुद्ध मराठा युद्ध का नेतृत्व किया, 1707 में उसकी मृत्यु तक।
1704 ई.गुरु गोबिंद सिंह
दिसंबर 1704 में चमकौर की कच्ची गढ़ी में वे मुट्ठी भर सिखों के साथ मुग़ल सेना के सामने डटे; उनके दोनों बड़े साहिबज़ादे अजीत सिंह और जुझार सिंह वहीं शहीद हुए।
12 · मराठा उत्कर्ष और सिख साम्राज्य1707–1818 ई.
1710 ई.बंदा सिंह बहादुर
मई 1710 में उन्होंने छप्पड़ चिड़ी में वज़ीर ख़ाँ को हराया और वह सरहिंद जीता जहाँ गुरु के छोटे साहिबज़ादों को मारा गया था; उन्होंने गुरुओं के नाम पर सिक्के चलाए।
1728 ई.पेशवा बाजीराव प्रथम
फ़रवरी 1728 में पालखेड़ में उन्होंने तेज़ कूच से निज़ाम की सेना को घेरा, उसका पानी और रसद काट दी और बिना बड़े युद्ध के निज़ाम को संधि पर विवश किया।
1729 ई.महाराजा छत्रसाल
मुग़लों से बुंदेलखंड को स्वतंत्र करने वाले वृद्ध महाराजा को 1729 में मुहम्मद ख़ाँ बंगश ने जैतपुर में घेरा; उन्होंने बाजीराव प्रथम को बुलाया, जिन्होंने आकर घेरा तोड़ा।
1741 ई.मार्तंड वर्मा
अगस्त 1741 में कोलाचेल में त्रावणकोर के इस राजा ने डच ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को हराया और उसके सेनापति यूस्टेकियस डी लैनॉय को अपनी ही सेवा में रख लिया।
1755 ई.पुली तेवर
1755 से तिरुनेलवेली में नेरकट्टुमसेवल के अपने किले से उन्होंने अर्काट के नवाब और कंपनी को कर देने से इनकार किया और दस वर्ष से अधिक उनकी सेनाओं से लड़ते रहे।
1780 ई.अहिल्याबाई होलकर
महेश्वर से मालवा पर राज करते हुए उन्होंने 1780 में वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया और सोमनाथ से गया तक मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का जीर्णोद्धार कराया।
1799 ई.महाराजा रणजीत सिंह
7 जुलाई 1799 को उन्होंने लाहौर में प्रवेश किया; यह उस सिख साम्राज्य की पहली सीढ़ी थी जो ख़ैबर से लद्दाख तक फैला।
1834 ई.जनरल ज़ोरावर सिंह
1834 से इस डोगरा सेनापति ने ऊँचे दर्रों को पार कर लद्दाख को जम्मू के अधीन किया और फिर पश्चिमी तिब्बत में बढ़े, जहाँ दिसंबर 1841 में युद्ध में वीरगति पाई।
1837 ई.हरि सिंह नलवा
पेशावर और ख़ैबर के मुहाने को थामने वाले इस सिख सेनापति ने 30 अप्रैल 1837 को अफ़गान सेना से जमरूद की रक्षा करते हुए प्राण दिए, और दुर्ग नहीं गिरा।
13 · कम्पनी राज और 1857 का युद्ध1757–1858 ई.
1780 ई.रानी वेलु नाचियार
1780 में, पति के मारे जाने के आठ वर्ष बाद, वे अपनी सेना और हैदर अली की सहायता से लौटीं और नवाब तथा कंपनी से शिवगंगा वापस छीन लिया।
1799 ई.वीरपांडिय कट्टबोम्मन
पांचालंकुरिचि के इस पालैयक्कारर ने कंपनी को कर देने से इनकार किया, 1799 में उसकी सेना से लड़े और 16 अक्टूबर 1799 को कयत्तार में फाँसी पर चढ़ाए गए।
1824 ई.कित्तूर रानी चेन्नम्मा
अक्टूबर 1824 में जब कंपनी ने उनके दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर कित्तूर हड़पना चाहा, तो उनके सैनिकों ने हमला विफल किया और कलेक्टर थैकरे मारा गया।
1829 ई.उ तिरोत सिंग
अप्रैल 1829 में नोंगख्लाव के सियेम ने खासी पहाड़ियों से निकाली जा रही अंग्रेज़ी सड़क के विरोध में विद्रोह किया और चार वर्ष तक उनसे लड़ते रहे।
1857 ई.मंगल पांडे
29 मार्च 1857 को बैरकपुर में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फ़ैंट्री के इस सिपाही ने अपने अंग्रेज़ अफ़सरों पर हमला किया और 8 अप्रैल को फाँसी पर चढ़ाए गए।
1858 ई.बाबू वीर कुँवर सिंह
लगभग अस्सी वर्ष की आयु में उन्होंने 1857 में शाहाबाद के विद्रोह का नेतृत्व किया और 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर में अंग्रेज़ी टुकड़ी को हराया; तीन दिन बाद घावों से उनका देहांत हुआ।
1858 ई.रानी लक्ष्मीबाई
मार्च–अप्रैल 1858 में उन्होंने सर ह्यू रोज़ से झाँसी की रक्षा की, घेरा तोड़कर निकलीं और 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में लड़ते हुए वीरगति पाई।
1858 ई.तात्या टोपे
जून 1858 में उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के साथ ग्वालियर जीता और रानी की मृत्यु के बाद दस महीने मध्य भारत में छापामार युद्ध चलाते रहे, जब तक विश्वासघात से पकड़े जाकर अप्रैल 1859 में शिवपुरी में फाँसी नहीं दी गई।
14 · पुनर्जागरण और स्वराज का संघर्ष1858–1947 ई.
1899 ई.बिरसा मुंडा
1899–1900 में उन्होंने राँची के आसपास अंग्रेज़ों और ज़मींदारों के विरुद्ध मुंडाओं के महान विद्रोह ‘उलगुलान’ का नेतृत्व किया और 9 जून 1900 को राँची जेल में देह त्यागी।
1922 ई.अल्लूरि सीताराम राजू
अगस्त 1922 से उन्होंने गोदावरी के पहाड़ी क्षेत्र में रम्पा विद्रोह का नेतृत्व किया, हथियारों के लिए थानों पर धावे बोले, जब तक मई 1924 में पकड़कर उन्हें गोली नहीं मार दी गई।
1929 ई.शहीद भगत सिंह
8 अप्रैल 1929 को उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में ऐसे बम फेंके जिनसे किसी की जान न जाए, और स्वयं गिरफ़्तारी दी; 23 मार्च 1931 को लाहौर में उन्हें फाँसी दी गई।
1931 ई.चन्द्रशेखर आज़ाद
27 फ़रवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में पुलिस से घिरकर वे अकेले लड़े और कभी जीवित न पकड़े जाने का अपना प्रण निभाया।
1932 ई.रानी गाइदिन्ल्यू
सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेज़ी राज के विरुद्ध ज़ेलियांग्रोंग नागा प्रतिरोध का नेतृत्व किया और अक्टूबर 1932 में पकड़ी गईं; चौदह वर्ष कारावास में रहीं, और नेहरू ने उन्हें ‘रानी’ कहा।
1944 ई.नेताजी सुभाषचंद्र बोस
1944 में उन्होंने जापानी सेना के साथ कोहिमा और इम्फाल के मोर्चे पर आज़ाद हिंद फ़ौज को भारत की धरती तक पहुँचाया, और 14 अप्रैल 1944 को मणिपुर के मोइरांग में उसका तिरंगा फहराया गया।
15 · स्वतन्त्र भारत1947 ई.–आज
1947 ई.मेजर सोमनाथ शर्मा, परमवीर चक्र
3 नवंबर 1947 को बडगाम में, हाथ पर प्लास्टर चढ़ा होने पर भी, उन्होंने श्रीनगर हवाई अड्डे के बाहर अपनी कंपनी से कई गुना बड़े कबायली दल को सहायता आने तक रोके रखा और मोर्टार के गोले से वीरगति पाई।
1962 ई.मेजर शैतान सिंह, परमवीर चक्र
18 नवंबर 1962 को लद्दाख के रेज़ांग ला में उन्होंने 13 कुमाऊँ की चार्ली कंपनी के साथ चीनी आक्रमण के सामने अंतिम व्यक्ति तक युद्ध किया और अपने लगभग सभी जवानों के साथ वीरगति पाई।
1965 ई.सीक्यूएमएच अब्दुल हमीद, परमवीर चक्र
10 सितंबर 1965 को खेमकरण क्षेत्र के असल उत्तर में उन्होंने जीप पर लगी रिकॉयललेस तोप से एक के बाद एक पाकिस्तानी पैटन टैंक नष्ट किए और अपने मोर्चे पर वीरगति पाई।
1971 ई.सेकंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, परमवीर चक्र
16 दिसंबर 1971 को शकरगढ़ क्षेत्र के बसंतर में पूना हॉर्स के इस 21 वर्षीय अफ़सर ने जलते सेंचुरियन टैंक से लड़ना जारी रखा, कई पाकिस्तानी टैंक नष्ट किए और पीछे हटने से इनकार कर दिया।
1999 ई.कैप्टन विक्रम बत्रा, परमवीर चक्र
20 जून 1999 को उन्होंने 13 जम्मू-कश्मीर राइफ़ल्स के साथ द्रास क्षेत्र में प्वाइंट 5140 जीता और संदेश भेजा ‘ये दिल माँगे मोर’; 7 जुलाई 1999 को प्वाइंट 4875 पर एक घायल अफ़सर को बचाते हुए वीरगति पाई।
