01नोंगख्लाव से होकर सड़क
पहले आंग्ल-बर्मा युद्ध के बाद कंपनी ब्रह्मपुत्र घाटी से खासी पहाड़ियों के पार सिलहट तक सड़क चाहती थी। कंपनी के एजेंट डेविड स्कॉट ने 1827 में तिरोत सिंग की सहमति ले ली और नोंगख्लाव से होकर काम शुरू हुआ। खासियों ने जल्द ही देखा कि सैनिक और अफ़सर वहाँ बसने लगे हैं, और सुना कि और सेना लाई जा रही है। अप्रैल 1829 में तिरोत सिंग के लोगों ने नोंगख्लाव की अंग्रेज़ चौकी पर हमला किया और दो अफ़सर मारे गए। यहीं से आंग्ल-खासी युद्ध शुरू हुआ।
02पहाड़ों में चार वर्ष
तलवार, धनुष और गिनी-चुनी बंदूकों से खासी जंगलों और चोटियों से लड़ते रहे, छापा मारते और गुफ़ाओं में लौट जाते। कंपनी ने गाँव जलाए और और सेना बुलाई। जनवरी 1833 में घायल तिरोत सिंग पकड़े गए और ढाका भेज दिए गए। 17 जुलाई 1835 को वहीं उनका देहांत हुआ। मेघालय 17 जुलाई को ‘उ तिरोत सिंग दिवस’ मनाता है और नोंगख्लाव में उनकी प्रतिमा है। 1988 में भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट जारी किया।

