01लाहौर और मिसलें
रणजीत सिंह सुकरचकिया मिसल के सरदार महा सिंह के पुत्र थे, और बचपन में चेचक से उनकी एक आँख की ज्योति चली गई। 7 जुलाई 1799 को वे लाहौर में दाखिल हुए, और 1801 की बैसाखी पर महाराजा घोषित हुए। 1802 में अमृतसर उनके अधीन आया। एक-एक कर बाकी मिसलें युद्ध, विवाह या ख़रीद से मिला ली गईं, यद्यपि सतलुज के दक्षिण के सरदार अंग्रेज़ी संरक्षण में चले गए; 1809 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से हुई अमृतसर सन्धि ने उसी नदी को उनकी सीमा माना।
02मुल्तान, कश्मीर, पेशावर
1813 में रणजीत सिंह ने निर्वासित अफ़गान शाह शुजा से कोहिनूर लिया। उनकी सेनाओं ने 1818 में मुल्तान और 1819 में कश्मीर जीता, जिससे घाटी में अफ़गान शासन समाप्त हुआ। 1820 के दशक में पेशावर सिख अधिकार में आया और 1834 में सीधे राज्य में मिला लिया गया। सेनापति हरि सिंह नलवा ने सीमा सँभाली और जमरूद का किला बनवाया, जहाँ 1837 में अफ़गान सेना को खदेड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। पहाड़ों में डोगरा सामन्त गुलाब सिंह ने 1834 से ज़ोरावर सिंह को लद्दाख भेजा। सेना का मुख्य भाग, फ़ौज-ए-ख़ास, वेंतुरा और आलार ने यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित किया।

03रणजीत सिंह के बाद दरबार
27 जून 1839 को लाहौर में रणजीत सिंह का देहान्त हुआ। छह वर्ष के भीतर उनके पुत्र खड़क सिंह, पौत्र नौनिहाल सिंह, पुत्र शेर सिंह और डोगरा मन्त्री ध्यान सिंह, सब बीमारी, गिरते फाटक या हत्या से मारे गए, और दरबार पर सेना की पंचायतें हावी हो गईं। बालक दलीप सिंह के नाम पर, उनकी माता जिन्द कौर के संरक्षण में, ख़ालसा सेना ने दिसम्बर 1845 में सतलुज पार की। वह मुदकी, फ़िरोज़शाह, अलीवाल और सोबराँव में हारी, और 1846 की लाहौर सन्धि में जालन्धर दोआब छिन गया; कश्मीर गुलाब सिंह को बेच दिया गया।
041849 का विलय
1848 में मुल्तान का विद्रोह दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध में बदल गया। जनवरी 1849 में चिलियाँवाला में सिखों ने अंग्रेज़ों को रोक दिया, पर फ़रवरी में गुजरात (पंजाब) में हारे, और 29 मार्च 1849 को पंजाब अंग्रेज़ी राज में मिला लिया गया। ग्यारह वर्ष के दलीप सिंह इंग्लैण्ड भेज दिए गए, और कोहिनूर रानी विक्टोरिया के पास गया। लाहौर किले के पास रणजीत सिंह की समाधि, जहाँ उनकी चिता पर चार रानियाँ और सात दासियाँ सती हुईं, 1848 में पूरी हुई।

शासक
- 1रणजीत सिंह1799 में लाहौर; 1801 से महाराजा1801–1839
- 2खड़क सिंह1839–1840
- 3नौनिहाल सिंहगिरते फाटक से मृत्यु1840
- 4चन्द कौर (संरक्षिका)1840–1841
- 5शेर सिंहहत्या हुई1841–1843
- 6दलीप सिंहअन्तिम महाराजा; जिन्द कौर संरक्षिका1843–1849
उनकी विरासत
- अमृतसर का स्वर्णमण्डित हरमन्दिर साहिब
- काशी विश्वनाथ के शिखर पर सोने की परत
- कश्मीर और पेशावर में अफ़गान शासन का अन्त
- लाहौर में रणजीत सिंह की समाधि












