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स्वतंत्रता सेनानी

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

लोकमान्य, स्वराज की वाणी, गीता रहस्य के लेखक

1856 ई.—1920 ई.

23 जुलाई 1856 – 1 अगस्त 1920

शिक्षक, संपादक, वेद और गीता के विद्वान, और स्वतंत्रता आंदोलन के पहले नेता जिन्हें जनता ने अपना माना। उन्होंने गणेशोत्सव को घरों से निकालकर सार्वजनिक बनाया और मांडले की जेल में गीता रहस्य लिखा।

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा।”Home Rule campaign, 1916 (Marathi original)

01विद्यालय, केसरी और उत्सव

रत्नागिरी में चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मे तिलक ने पुणे के डेक्कन कॉलेज में गणित पढ़ा। 1880 में विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और गोपाल गणेश आगरकर के साथ न्यू इंग्लिश स्कूल खोला, और जनवरी 1881 में दो साप्ताहिक शुरू किए, मराठी में ‘केसरी’ और अंग्रेज़ी में ‘मराठा’। 1884 में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी बनी, जिसने 1885 में फ़र्ग्युसन कॉलेज खोला। तिलक चाहते थे कि केवल अंग्रेज़ी पढ़े लोग नहीं, सारी जनता सार्वजनिक जीवन में आए। 1893 में उन्होंने गणेशोत्सव को मंडपों, मेलों और व्याख्यानों वाला दस दिन का सार्वजनिक पर्व बनाने में अगुवाई की, और 1895 से रायगढ़ पर सभा के साथ शिवाजी उत्सव का नेतृत्व किया।

02राजद्रोह, मांडले और गीता

1897 में रैंड हत्याकांड के बाद केसरी के लेखों पर उन पर राजद्रोह का मुक़दमा चला और अठारह महीने की सज़ा हुई। स्वदेशी के वर्षों में लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के साथ वे कांग्रेस के गरम दल के नेता रहे; बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र ‘लाल-बाल-पाल’ की बात करते थे। 1908 में मुज़फ़्फ़रपुर बम कांड पर केसरी के लेखों के लिए छह वर्ष की सज़ा मिली और 1908 से 1914 तक वे बर्मा के मांडले में रहे। वहीं उन्होंने ‘श्रीमद्भगवद्गीता रहस्य’ लिखा, जो 1915 में छपा और गीता को कर्मयोग, यानी संसार में निष्काम कर्म, का आह्वान बताता है। इससे पहले वे ‘द ओरायन’ (1893) और ‘द आर्कटिक होम इन द वेदाज़’ (1903) लिख चुके थे, जिनमें वैदिक सूक्तों के खगोलीय संकेतों से उनकी अति प्राचीनता का तर्क है।

पुणे
स्थान · मुळा–मुठा के तट का पुराना नगर; 1630 के दशक में शहाजी और जिजाबाई द्वारा फिर बसाया गया; 1730 से पेशवाओं की राजधानीपुणेवह नगर जहाँ जिजाबाई की देखरेख में शिवाजी बड़े हुए, और लगभग एक शताब्दी तक पेशवाओं की गद्दी, जहाँ से मराठा सेनाएँ अटक और बंगाल तक गईं। बाद में यही तिलक, आगरकर और डेक्कन एजुकेशन सोसायटी की कर्मभूमि बना।पढ़ें →

03होम रूल और अंतिम दिन

मांडले से लौटकर अप्रैल 1916 में उन्होंने बेलगाँव में इंडियन होम रूल लीग की स्थापना की और उसी दिसंबर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौते के लिए काम किया। उनका वाक्य ‘स्वराज्य माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच’, यानी ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा’, आंदोलन का नारा बन गया। 1918–19 में मानहानि का मुक़दमा लड़ने और भारत का पक्ष रखने वे इंग्लैंड गए। 1 अगस्त 1920 को बंबई में उनका देहांत हुआ, उसी दिन असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। गांधीजी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा।

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा।”

Home Rule campaign, 1916 (Marathi original)