आज भी खड़ा

लिंगराज मन्दिर, भुवनेश्वर

एकाम्र क्षेत्र का महान मन्दिर, जिसके नाम त्रिभुवनेश्वर से भुवनेश्वर नगर का नाम पड़ा। यहाँ स्वयम्भू लिंग की पूजा हरिहर रूप में होती है, शिव और विष्णु एक साथ, इसलिए बिल्व और तुलसी दोनों चढ़ते हैं।

निर्माण: 11वीं शताब्दी ई., सोमवंशी राजा; मण्डप पूर्वी गंग काल में जोड़े गएस्थान: ओडिशादेवता: हरिहर रूप में भगवान शिव (त्रिभुवनेश्वर)20.24° N, 85.83° E
  1. 11वीं शताब्दी
  2. 12वीं शताब्दी
चित्र: Bernard Gagnon · CC BY-SA 3.0

01एकाम्र क्षेत्र

एकाम्र पुराण इस भूमि का नाम उस एक आम्र वृक्ष से बताता है जिसके नीचे भगवान शिव रहते थे, और कथा कहता है कि माता पार्वती ने यहाँ आकर कीर्ति और वास नामक असुरों का वध किया, और शिव ने धरती पर प्रहार कर सब तीर्थों के जल से बिन्दुसागर सरोवर बनाया। तीर्थयात्री आज भी दर्शन से पहले बिन्दुसागर में स्नान करते हैं। यहाँ का लिंग प्राकृतिक शिला है, लगभग आठ इंच ऊँचा, ग्रेनाइट की पीठिका में, और प्रतिदिन जल, दूध और भाँग से उसका अभिषेक होता है।

02कलिंग शैली का शिखर

रेखा देउल लगभग 55 मीटर ऊँचा है, जिसका घुमावदार शिखर छोटे-छोटे शिखरों की पंक्तियों से सजा है। उसके सामने एक पंक्ति में जगमोहन, नाट मन्दिर और भोग मण्डप हैं; अन्तिम दो गंग काल में जुड़े। ऊँची लैटेराइट प्राचीर के भीतर सौ से अधिक छोटे मन्दिर हैं। वैष्णव गंग राजाओं ने देवता को हरिहर रूप में पूजा, और तब से यही व्यवस्था चली आती है। हर वसन्त अशोकाष्टमी को देवता रुकुण रथ पर सवार होकर रामेश्वर मन्दिर जाते हैं।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 11वीं शताब्दीसोमवंशी राजाओं के समय मुख्य देउल और जगमोहन बनते हैं।
  2. 12वीं शताब्दीगंग काल में नाट मन्दिर और भोग मण्डप जोड़े जाते हैं।
दर्शन और यात्रा

प्रवेश केवल हिन्दुओं को है; उत्तरी प्राचीर के पास बने मंच से अन्य लोग शिखर देख सकते हैं। सबसे अधिक भीड़ महाशिवरात्रि पर होती है।

ओडिशा की जमी हुई स्वर-लहरीPrasar Bharati Archives · YouTube से चलता है