01खातोली और गागरोन
भाइयों से कठिन संघर्ष के बाद 1508 में सांगा मेवाड़ की गद्दी पर बैठे; इसी संघर्ष में उनकी एक आँख गई। 1517 में हाड़ौती सीमा के पास खातोली में उन्होंने इब्राहीम लोदी को हराया; इस युद्ध में उनका एक हाथ कटा और एक पैर लँगड़ा हो गया। 1519 में गागरोन में उन्होंने मालवा के महमूद खलजी द्वितीय को हराकर बंदी बनाया और फिर पुरानी राजपूत रीति से उसका राज्य लौटा दिया। 1520 के दशक तक उनकी सत्ता आगरा के छोर से मालवा और गुजरात तक चलती थी।
02खानवा, 17 मार्च 1527
अप्रैल 1526 में पानीपत जीतकर बाबर ने दिल्ली ली। सांगा ने राजपूताने के सरदारों को जोड़ा, जिनमें मारवाड़, आमेर, चंदेरी के मेदिनी राय और हसन खाँ मेवाती थे, और आगरा की ओर बढ़े। फतेहपुर सीकरी के पश्चिम में खानवा में दोनों सेनाएँ भिड़ीं। बाबर ने ज़ंजीरों से बँधी गाड़ियों के पीछे तोड़ेदार बंदूकें और तोपें लगाईं और घुड़सवारों से राजपूत पार्श्वों पर वार किया। सांगा घायल होकर मूर्छित अवस्था में रणभूमि से ले जाए गए। बाबर अपने संस्मरणों में विजयनगर के राय के साथ उन्हें हिंदुस्तान के दो सबसे बड़े हिंदू शासकों में गिनता है। सांगा ने प्रण किया कि विजय के बिना चित्तौड़ नहीं लौटेंगे, और नए अभियान की तैयारी में ही 30 जनवरी 1528 को कालपी में उनकी मृत्यु हुई; परंपरा कहती है कि उनके अपने सरदारों ने विष दिया।








