01तोनले साप के मैदान में मेरु
सूर्यवर्मन द्वितीय लगभग 1113 में सिंहासन पर बैठे और अपने शासन का अधिकांश समय इसी मन्दिर के निर्माण में लगाया। इसका नक्शा पुराणों के ब्रह्माण्ड का चित्र है। लगभग 190 मीटर चौड़ी खाई समुद्र है, ऊपर उठती तीन वीथिकाएँ पर्वतमालाएँ हैं, और बीच का लगभग 65 मीटर ऊँचा शिखर मेरु है, देवताओं का आसन।
मन्दिर का मुख पश्चिम की ओर है, जो ख्मेर स्थापत्य में असाधारण है। ख्मेर परम्परा में पश्चिम विष्णु की दिशा है और दिवंगतों की भी, इसलिए बहुत से विद्वान इसे राजा का समाधि-मन्दिर भी मानते हैं। मृत्यु के बाद उन्हें परमविष्णुलोक नाम से स्मरण किया गया, अर्थात् जो विष्णु के परम धाम को चले गए।
02पत्थर पर लिखा इतिहास
सबसे नीचे की वीथिका में लगभग 800 मीटर लम्बी नक्काशी है, जो संसार की सबसे लम्बी शिल्प-पट्टियों में गिनी जाती है। पूर्वी दीवार पर समुद्र मन्थन है: देव और असुर मन्दराचल के चारों ओर वासुकि को खींच रहे हैं और नीचे कूर्म रूप में भगवान विष्णु हैं। पश्चिमी दीवार पर कुरुक्षेत्र की सेनाएँ भिड़ती हैं, भीष्म शरशय्या पर हैं और पाण्डव आगे बढ़ रहे हैं। एक और पट्टी में लंका का युद्ध है, जहाँ श्रीराम हनुमान के कन्धों पर खड़े हैं। स्वयं राजा भी दरबार में और सेना के आगे हाथी पर दिखते हैं।
03कभी सूना नहीं हुआ
आगे की शताब्दियों में कम्बोडिया थेरवाद बौद्ध धर्म की ओर मुड़ा और अंकोरवाट बौद्ध तीर्थ बन गया। इसी कारण यह अन्य ख्मेर मन्दिरों की तरह जंगल के हवाले नहीं हुआ और आज भी इसके परिसर में भिक्षु रहते हैं। फ्रांसीसी प्रकृतिविद् आँरी मूओ ने 1860 की अपनी यात्रा के बाद इसके बारे में लिखा, जिससे यह यूरोप में प्रसिद्ध हुआ। युद्धों के अन्तराल छोड़कर बीसवीं शताब्दी भर इसका जीर्णोद्धार चला, और 1986 से 1993 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दल ने भी यहाँ काम किया।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 1113सूर्यवर्मन द्वितीय राजा बने और विष्णु के लिए मन्दिर का निर्माण आरम्भ हुआ।
- 1860आँरी मूओ यहाँ आए; उनके प्रकाशित विवरण से मन्दिर यूरोप में चर्चित हुआ।
- 1986–1993भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मन्दिर में संरक्षण कार्य किया।
- 1992अंकोर को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में स्थान मिला।
सिएम रीप से जाएँ; अंकोर पास लेना होता है। पश्चिमी पथ से सूर्योदय देखें, फिर पश्चिमी द्वार से वीथिका की नक्काशी देखते हुए आगे बढ़ें।




