पुनर्निर्मित

मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर, मदुरै

मीन-नयनी देवी का मंदिर, जिन्होंने पाण्ड्य राजकुमारी के रूप में मदुरै पर राज किया और शिव से विवाह किया। 1311 में लूटा गया, फिर नायकों ने इसे चौदह गोपुरों वाले उस नगर-सा मंदिर बना दिया जो आज खड़ा है।

निर्माण: प्राचीन मंदिर; वर्तमान परिसर मुख्यतः नायकों ने 16वीं–17वीं शताब्दी में फिर बनायास्थान: तमिलनाडुदेवता: माता मीनाक्षी और भगवान शिव, सुन्दरेश्वर रूप में9.92° N, 78.12° E
  1. 1311
  2. 1370 का दशक
  3. 1569
  4. 1623–1659
चित्र: user:deadrat · CC BY-SA 3.0

01राजकुमारी और विवाह

तिरुविलैयाडल पुराणम् बताता है कि मीनाक्षी पाण्ड्य राजा मलयध्वज के यज्ञ-कुण्ड से तीन स्तनों के साथ प्रकट हुईं, और भविष्यवाणी हुई कि अपने स्वामी से मिलते ही एक स्तन लुप्त हो जाएगा। उन्होंने दिशाओं को जीता और कैलास पर शिव को देखा; तीसरा स्तन लुप्त हो गया। शिव सुन्दरेश्वर बनकर मदुरै आए और उनसे विवाह किया, कन्यादान स्वयं विष्णु ने किया। हर वर्ष चैत्र-वैशाख में चित्तिरै उत्सव में यह विवाह फिर मनाया जाता है, और कल्लळगर अपनी पहाड़ी से उतरकर इसमें आते हैं।

02लूट और पुनर्निर्माण

1311 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफ़ूर ने मदुरै पर धावा बोला और मंदिर लूट लिया गया। 1335 से मदुरै सल्तनत ने नगर पर राज किया, जब तक 1370 के दशक में विजयनगर के कुमार कम्पण ने उसे उखाड़ नहीं फेंका। उनकी रानी गंगादेवी ने अपने संस्कृत काव्य ‘मधुरा विजयम्’ में यह अभियान लिखा, मंदिर की दुर्दशा और उसके पुनरुद्धार सहित। फिर मदुरै के नायकों ने, विशेषकर विश्वनाथ नायक और तिरुमलै नायक (1623–1659) ने, विशाल पैमाने पर पुनर्निर्माण किया: गोपुर, स्वर्ण-कमल सरोवर, और सहस्र-स्तम्भ मण्डप, जिसे 1569 में मंत्री अरियनाथ मुदलियार ने बनवाया।

03चौदह गोपुर

परिसर लगभग 14 एकड़ में फैला है और इसमें चौदह गोपुर हैं; दक्षिणी गोपुर, लगभग 52 मीटर ऊँचा, सबसे ऊँचा है, हज़ारों रंगी मूर्तियों से भरा, जिन्हें हर कुम्भाभिषेक पर नया किया जाता है। पहले मीनाक्षी के दर्शन होते हैं, फिर सुन्दरेश्वर के। हर रात शिव की उत्सव-मूर्ति पालकी में मीनाक्षी के शयन-कक्ष, पळ्ळियरै, ले जाई जाती है और भोर में लौटाई जाती है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1311मलिक काफ़ूर का मदुरै पर आक्रमण; मंदिर लूटा गया।
  2. 1370 का दशकविजयनगर के कुमार कम्पण ने मदुरै सल्तनत का अंत कर पूजा फिर आरंभ कराई।
  3. 1569अरियनाथ मुदलियार ने सहस्र-स्तम्भ मण्डप बनवाया।
  4. 1623–1659तिरुमलै नायक के शासन में मण्डप जुड़े और उत्सव भव्य हुए।
दर्शन और यात्रा

भीतर मोबाइल ले जाना मना है। रात लगभग 9 बजे की पळ्ळियरै शोभायात्रा के लिए रुकना सार्थक है।

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