01कटक, आईसीएस और कांग्रेस
उनका जन्म कटक में वकील जानकीनाथ बोस की नौवीं संतान के रूप में हुआ। बचपन में उन्होंने विवेकानंद और रामकृष्ण को पढ़ा, और एक बार गुरु की खोज में हिमालय चले गए। 1920 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में चौथे स्थान पर आए और अप्रैल 1921 में यह लिखकर त्यागपत्र दे दिया कि कोई दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। चित्तरंजन दास के साथ बंगाल में कांग्रेस का काम किया, 1925–27 मांडले जेल में रहे, और 1930 में कलकत्ता के महापौर बने। 1938 में हरिपुरा में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए और 1939 में त्रिपुरी में पट्टाभि सीतारमैया को हराकर फिर चुने गए। गांधीजी और कार्यसमिति के विरोध के कारण अप्रैल 1939 में उन्होंने त्यागपत्र दिया और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया।
02निष्क्रमण और आज़ाद हिंद
कलकत्ता में नज़रबंद रहते हुए 16–17 जनवरी 1941 की रात वे पठान बीमा एजेंट मोहम्मद ज़ियाउद्दीन के वेश में निकल गए और पेशावर, काबुल और मॉस्को होते हुए बर्लिन पहुँचे। 1943 में जर्मन और जापानी पनडुब्बियों से पूर्वी एशिया गए। सिंगापुर में 4 जुलाई 1943 को उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना की कमान सँभाली और 21 अक्टूबर को आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार की घोषणा की। 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया। 1944 में आज़ाद हिंद फ़ौज जापानियों के साथ इंफाल और कोहिमा में लड़ी। 4 जुलाई 1944 को रंगून में उन्होंने पूर्वी एशिया के भारतीयों से स्वतंत्रता के बदले ख़ून माँगा। ‘जय हिंद’ उनकी सेना का अभिवादन बना।

03ताइहोकू और जाँचें
जापान के समर्पण के बाद वे सैगॉन से उड़े। शाहनवाज़ समिति (1956) और खोसला आयोग (1974) ने निष्कर्ष दिया कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताइहोकू में उनका विमान गिरा और उसी रात जलने से उनका देहांत हुआ; उनकी कही जाने वाली अस्थियाँ टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी हैं। न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग ने 2005 में कहा कि उस दुर्घटना में उनकी मृत्यु नहीं हुई; सरकार ने यह निष्कर्ष स्वीकार नहीं किया। 1945–46 में लाल क़िले में आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों पर चले मुक़दमों ने पूरे देश और सेनाओं को झकझोर दिया। 2021 से उनका जन्मदिन, 23 जनवरी, पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है।
“तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा!”
Speech to Indians in Rangoon, 4 July 1944

