चित्र: Anant Shivaji Desai, Ravi Varma Press · Public domain
संत

संत तुकाराम

देहू के वारकरी संत-कवि

1608 ई.—1650 ई.

1608–1650 ई.

पुणे के पास देहू के अनाज व्यापारी तुकाराम ने वे अभंग रचे जो मराठी गाँव आज भी पंढरपुर की राह पर गाते हैं। वारकरी मानते हैं कि 1650 में वे सदेह वैकुण्ठ गए, और उस दिन को तुकाराम बीज के रूप में मनाते हैं।

“वृक्षवल्ली आम्हां सोयरीं वनचरें। पक्षीही सुस्वरें आळविती॥ (वृक्ष और लताएँ हमारे सगे हैं, वन के जीव भी; पक्षी भी मधुर स्वर में हमें पुकारते हैं।)”Tukaram Gatha, abhang “Vrikshavalli amha soyari”

01अकाल और पहाड़ी

इंद्रायणी तट पर देहू में उनके परिवार की दुकान थी, और कई पीढ़ियों से वे विट्ठल के भक्त थे। 1630–31 के अकाल में उनकी पहली पत्नी और एक पुत्र चल बसे, और व्यापार डूब गया। वे गाँव के ऊपर भंडारा पहाड़ी पर चढ़ गए, वहाँ बैठकर ज्ञानेश्वरी और एकनाथी भागवत पढ़ी, और गाने लगे। उनके अभंग छोटे, सीधे और गाँव से भरे हैं: कर्ज़, मवेशी, झगड़ालू पत्नी, कठोर पुरोहित, और सदा कमर पर हाथ रखे पंढरपुर की ईंट पर खड़े विट्ठल।

02नदी में पोथियाँ

क्षेत्र के एक विद्वान, रामेश्वर भट्ट, ने आपत्ति की कि एक दुकानदार को वेदों का अर्थ मराठी में कहने का अधिकार नहीं, और उनकी पोथियाँ इंद्रायणी में डुबवा दीं। तुकाराम उपवास करते हुए तट पर बैठ गए। वारकरी कथा कहती है कि तेरहवें दिन पोथियाँ सूखी ऊपर आ गईं। रामेश्वर भट्ट उनके अनुयायी बन गए। परम्परा यह भी बताती है कि छत्रपति शिवाजी उनका कीर्तन सुनने आए और तुकाराम ने उनके भेजे उपहार लौटा दिए। 1650 की फाल्गुन वद्य द्वितीया को वे फिर नहीं दिखे।

विट्ठल–रुक्मिणी मंदिर, पंढरपुर
स्थान · मंदिर कम-से-कम 12वीं–13वीं शताब्दी से बढ़ता गया; बाद में मराठा काल में विस्तारविट्ठल–रुक्मिणी मंदिर, पंढरपुरचन्द्रभागा के तट पर विठोबा का धाम, आषाढ़ी एकादशी पर वारकरी वारी का लक्ष्य। आठ सौ वर्षों से महाराष्ट्र के संत गाते हुए यहाँ पैदल आते रहे हैं।पढ़ें →

“वृक्षवल्ली आम्हां सोयरीं वनचरें। पक्षीही सुस्वरें आळविती॥ (वृक्ष और लताएँ हमारे सगे हैं, वन के जीव भी; पक्षी भी मधुर स्वर में हमें पुकारते हैं।)”

Tukaram Gatha, abhang “Vrikshavalli amha soyari”