01जहाँ ब्रह्मा ने यज्ञ किया
प्रयाग का अर्थ है यज्ञ का स्थान: पुराण कहते हैं कि सृष्टि के बाद भगवान ब्रह्मा ने अपना पहला यज्ञ यहीं किया। मत्स्य पुराण का प्रयाग माहात्म्य इसे तीर्थराज कहता है और बताता है कि माघ में संगम-स्नान से जन्मों के पाप धुल जाते हैं। मटमैली गंगा और हरी-नीली यमुना को साथ-साथ मिलते देखा जा सकता है; सरस्वती नीचे से आकर मिलती हैं। रामायण में वन जाते हुए राम, सीता और लक्ष्मण यहाँ भरद्वाज के आश्रम में ठहरे। अमर वटवृक्ष अक्षयवट क़िले के भीतर पातालपुरी मन्दिर में है।
02हर्ष का दान, अकबर का क़िला
643 में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने संगम की रेती पर राजा हर्ष की महासभा देखी, जहाँ वे हर पाँच वर्ष पर अपना सारा कोष, अपने वस्त्र तक, भिक्षुओं, ब्राह्मणों और निर्धनों को दान कर देते थे। 1583 में अकबर ने संगम पर क़िला बनवाया और नगर का नाम इलाहाबास रखा; अक्षयवट उसकी दीवारों के भीतर आ गया, और समुद्रगुप्त की प्रशस्ति वाला अशोक स्तम्भ भी भीतर खड़ा किया गया। कुम्भ सदियों से लगता आया है। यूनेस्को ने 2017 में कुम्भ मेले को अमूर्त धरोहर सूची में रखा, और अक्टूबर 2018 में नगर का पुराना नाम प्रयागराज लौटाया गया। पातालपुरी मन्दिर और अक्षयवट जनवरी 2019 में यात्रियों के लिए खोले गए।
03कल्पवास और महाकुम्भ
हर वर्ष माघ में माघ मेला पूरे कछार को भर देता है, और कल्पवासी महीने भर रेती पर तम्बुओं में रहते हैं, दिन में तीन बार स्नान और एक बार भोजन करते हैं। हर बारह वर्ष पर कुम्भ आता है, और छठे वर्ष अर्धकुम्भ। अमृत स्नान की शोभायात्राओं में साधुओं के अखाड़े आगे चलते हैं, सबसे पहले नागा संन्यासी। 13 जनवरी से 26 फ़रवरी 2025 के महाकुम्भ में, उत्तर प्रदेश सरकार की गिनती के अनुसार, 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालु आए।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 643ह्वेनसांग संगम पर हर्ष की दान-महासभा देखते हैं।
- 1583अकबर संगम पर क़िला बनवाता है; नगर का नाम इलाहाबास होता है।
- दिसम्बर 2017यूनेस्को कुम्भ मेले को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित करता है।
- अक्टूबर 2018प्रयागराज नाम लौटाया जाता है।
- 13 जनवरी–26 फ़रवरी 2025महाकुम्भ का आयोजन।
क़िले के नीचे के घाटों से नाव लेकर संगम के स्नान-स्थल तक जाएँ। लेटे हुए हनुमान जी वाला बड़े हनुमान मन्दिर क़िले के पास है।








